| सदभाव का उत्सव 'फूल वालों की सैर' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सद्भाव का उत्सव 'फूल वालों की सैर' एक अनूठे मेले के रूप में चर्चित रहा है जिसका आयोजन अंजुमन-सैर-ए-गुल फरोशाँ सन् 1961 से लगातार करती आ रही है. इस समारोह का आकर्षण हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक रंग-बिरंगा पंखा जो इस साल उपराज्यपाल बनवारी लाल और उनकी पत्नी संतोष जोशी को पेश किया गया. फूलवालों का काफिला लाल किले से इत्र और फूलों की सुगंध बिखेरता हुआ 32 किलोमीटर की दूरी तय करके महरौली स्थित कुतुब मीनार के करीब ख्वाज़ा बख़्तियार काकी की मज़ार पर फूलों की चादर चढ़ाने हर साल आता है. दूसरे दिन परंपरागत ढंग से इसी मज़ार के समीप योगमाया महालक्ष्मी मंदिर में फूलों का छत्र चढ़ाया जाता है. इस मेले का समापन शनिवार को 'जहाज़ महल' में एक भव्य समारोह के साथ हुआ. इस मौक़े पर रात भर कव्वाली और नृत्य के बीच जश्न का माहौल रहा. पहले दिन ख़्वाजा जी के मज़ार पर चादर चढ़ाई गई, दूसरे दिन योगमाया मंदिर में फूलों का छत्र चढ़ाया गया, आख़िरी दिन कथक नृत्य और कव्वाली का आयोजन हुआ. पुरानी दिल्ली के निवासी मोहम्मद शम्सी कहते हैं कि "समय के साथ इस मेले की रौनक कम हो गई है. बस रस्म ही रह गई है. मैं यहाँ हर साल आता हूँ पर अब पहले वाला आनंद नहीं मिलता है." कहानी 'फूलवालों की सैर' की शुरूआत अकबर शाह द्वितीय (1806-1837) के शासन काल में हुई. बादशाह अपने छोटे पुत्र मिर्ज़ा जहाँगीर को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे.
ब्रिटिश रेजीडेंट सर सीटन ने इस बात को मंजूर नहीं किया. मिर्ज़ा जहाँगीर ने खुले दरबार में उनका अपमान किया. एक दिन जब शाहज़ादा लालकिले में नौबतखाने पर मौज मना रहे थे वहाँ से सीटन हाथी पर गुज़रा. मिर्ज़ा जहाँगीर ने उस पर गोली चलाई. रेजीडेंट तो बच गया, लेकिन उसका सेवक मारा गया. इसी जुर्म में शाहज़ादे को इलाहाबाद के लिए निर्वासित कर दिया गया. उनकी माँ ने उसी समय अपने बेटे के बरी होने पर ख़्वाजा बख्तियार काकी के मज़ार पर फूलों की चादर चढ़ाने की मन्नत मानी और फिर अपने बेटे की रिहाई पर फूलों की चादर चढ़ा कर अपनी मन्नत पूरी की. दिल्ली के हिंदुओं ने योगमाया मंदिर में भेंट चढ़ाकर अपनी भागीदारी निभाई. यह तीन दिनों का समारोह इतना शानदार रहा कि बादशाह ने इसे हर साल मनाने का ऐलान किया. 1942 में अँग्रेजों ने इसे बंद कर दिया लेकिन 1961 में अंजुमन सैरे-गुलफ़रोशाँ की कोशिश से यह दोबारा शुरू हुआ और तब से आज तक यह सिलसिला जारी है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||