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बनारसी साड़ी का बिखरता ताना-बाना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सदियों से भारत में बनारसी साड़ियाँ का एक अलग रुतबा रहा है. शादी हो तो बहू के लिए बनारसी साड़ी एक परंपरा की तरह ख़रीदी जाती थी. लेकिन अब बनारसी साड़ी की चमक कम हो रही है और बनारसी साड़ी उद्योग संकट में है. साथ ही संकट में हैं बुनकर. हज़ारों की तादाद में बुनकर बेरोज़गार हो चुके हैं. हुनरमंद हाथों में अब हथकरघे का हत्था नहीं रिक्शा, फावड़ा या फिर भीख का कटोरा है. बुनकर मानते हैं कि इसके लिए सरकार की निर्यात नीतियाँ और पॉवरलूम ज़िम्मेदार हैं. बनारस में छह लाख बुनकर हैं जिनमें से 85 प्रतिशत बुनकर हैंडलूम यानी हथकरघे के कारीगर हैं. बुनकर शाहिद अंसारी बताते हैं, "पिछले छह सालों में बुनकारों की हालत बहुत ज्यादा ख़राब हुई है. हमारे पास काम नहीं हैं, बाज़ार में पड़ा माल वापस आ रहा है, छोटे-व्यापारी और कारीगरों को बहुत घाटा हुआ है और अब तो लोग ग़रीबी के चलते आत्महत्या कर रहे हैं." इसकी वजह पूछने पर उन्होंने बताया, "पिछली सरकारों की निर्यात नीतियाँ बहुत ग़लत थीं, ऊपर से पॉवरलूम ने हैंडलूम के बुनकरों की कमर तोड़ दी है." हैंडलूम पर जहाँ काम करने में ज़्यादा वक्त लगता है और ज़्यादा लागत आती है, वहीं पॉवरलूम पर काम जल्दी हो जाता है और लागत कम आती है. यही वजह है कि तमाम बड़े व्यापारियों ने बुनकरों से पल्ला-झाड़ कर पॉवरलूम को गले लगा लिया है. हाँ, पावरलूम के काम में वो सफ़ाई और सुंदरता नहीं होती, जो कि हाथ के काम में होती है. पर इससे व्यापारियों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि आम उपभोक्ता के लिए इस फ़र्क का अंदाज़ा लगा पाना कठिन होता है. वजहें बदहाली की वजह सिर्फ़ हैंडलूम बनाम पॉवरलूम ही नहीं है.
बिजली की कटौती, सूरत में बनारसी साड़ी की नकल करता कपड़ा उद्योग, पिछली सरकारों की 15 सालों की आर्थिक नीतियाँ, बुनकरों को किसी भी तरह की आर्थिक सुरक्षा का उपलब्ध न कराया जाना और बाढ़-सूख के चलते ठंडे पड़े बाज़ार भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं. पूर्वांचल पॉवरलूम एसोसिएशन के सचिव अनवारुल हक अंसारी कहते हैं, "बदहाली की वजह पिछली सरकारों की आर्थिक नीतियाँ हैं. पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने दक्षिण से आने वाले रेशम को बढ़ावा देने के लिए चीन से आने वाले रेशम की आमद में अड़चनें पैदा कीं." वे कहते हैं, "सबसे ज़्यादा नुक़सान पिछली एनडीए सरकार के दौरान हुआ जब बनारसी साड़ी के निर्यात में मुश्किलें पैदा की गईं." पिछले दिनों बुनकरों का एक प्रतिनिधिमंडल केंद्रीय कपड़ा मंत्री शंकर सिंह वाघेला से भी मिला. कपड़ा मंत्री वाघेला की तरफ से इस ओर आवश्यक कदम उठाने का आश्वासन भी दिया पर मदनपुरा, लमही, बड़ी बाजार, पहड़िया, खेड़ी तालाब में बसे तमाम बुनकर इसे भूखे के हाथ में झुनझुना भर मानते हैं. विकल्प नहीं बुनकर आफ़ताब आलम सरकार से मदद की आस अब नहीं रखते. सो हथकरधा छोड़ अब आफ़ताब बिस्कुट का डिब्बा साइकिल पर लेकर गली-गली बिस्कुट बेच रहे हैं.
आफ़ताब बताते हैं, "पिछले पाँच महीनों से कोई काम नहीं मिला है, 20 रूपए की भी नहीं कमाई हो रही. मज़दूरी भी नहीं मिलती क्योंकि आस-पास के ज़िलों से बाढ़ और सूखा झेल रहे हजारों लोग इस शहर में पड़े हुए हैं." हालाँकि बनारस उत्तरी शहर के विधायक मोहम्मद कलाम कहते हैं कि बुनकरों को समय के साथ अपने को बदलना होगा. पर बुनकरों का कहना है कि मशीनों से न तो इस बुनकर बिरादरी को काम मिलेगा और न ही इसके लिए उनके पास पैसा ही है. ज़ाहिर है, अगर समय रहते सरकार अपनी आँखें नहीं खोलती है तो हाथ के काम वाली असली बनारसी साड़ी सिर्फ संग्रहालयों में होगी या घरों की दादी माँ के पास. |
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