|
दिल्ली मेट्रो में दुनिया की दिलचस्पी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली के लोगों के लिए एक आधुनिक और तकनीकी रूप से विशिष्ट मैट्रो रेलों का ख्वाब देखने का वक्त अब खत्म हुआ, अब बारी इन पर इतराने की है. दुनिया की आधुनिकतम और सर्वश्रेष्ठ मेट्रो रेल परिवहन व्यवस्था अब भारत की राजधानी दिल्ली में है. इस 48 किलोमीटर के खुले और 13 किलोमीटर के भूमिगत रेल परिपथ और 59 स्टेशनों वाली महत्वाकांक्षी दिल्ली मैट्रो रेल परियोजना पर कुल 10,571 करोड़ रूपए का खर्च आ रहा है. अनुमानित ख़र्च का 64 प्रतिशत जापान सरकार, 28 प्रतिशत केन्द्र व राज्य सरकार और शेष परियोजना को ऋण द्वारा उपलब्ध कराया गया है. योजना के पहले चरण में दिल्ली के शाहादरा से रिठाला तक के लगभग 23 किलोमीटर लम्बे रूट पर मार्च 2004 से ही मैट्रो रेल दौड़ रही है जबकि दिल्ली विश्वविद्यालय से कश्मीरी गेट तक के रूट पर मैट्रो परिवहन इस साल के अंत तक शुरू हो जाएगा. सितंबर, 2005 तक यह रूट केन्द्रीय सचिवालय तक के लिए चालू हो जाएगा और इस तरह दिल्ली मैट्रो 2005 के आखिर तक अपने मास्टर प्लान के इस 65 किलोमीटर लम्बे रूट पर दौड़ रही होगी. साथ ही दौड़ने लगेगी कम से कम पाँच लाख लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी जो आज अपना ज़्यादातर वक्त ट्रैफ़िक जामों और बसों के इंतजार में ही बिता देती है. दुनिया की नज़र कई देशों के प्रतिनिधिमंडल अब तक इस मैट्रो रेल की तकनीक और स्थापत्य को देखने-समझने के लिए आ चुके हैं.
पिछले दिनों एक ऐसा ही प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान से भी आया. पाकिस्तान का यह प्रतिनिधिमंडल आया तो था भारतीय रेल को देखने समझने पर लौटा दिल्ली मैट्रो की वाह-वाह करते हुए. श्रीलंका सबसे ज़्यादा उत्साहित है और दिल्ली की मैट्रो को कोलंबो ले जाने के लिए तत्पर भी. दिल्ली मैट्रो-रेल कॉर्पोरेशन के जनसंपर्क अधिकारी अनुज दयाल कहते हैं, "हमारे विकल्प खुले हैं और जो भी देश या शहर हम से सहयोग चाहते हैं, हम उनकी सहायता करेंगे." दुनिया के इन तमाम देशों के अलावा खुद भारत में भी तमाम महानगर इसे अपने यहाँ ले जाना चाहते हैं. इस दिशा में चेन्नई, बैंगलौर, मुंबई, हैदराबाद, अहमदाबाद और यहाँ तक की कोलकाता भी दिल्ली की मैट्रो को अपनाने के लिए तत्पर है. हैदराबाद और बैंगलोर ने तो इसकी प्राथमिक तैयारियाँ भी पूरी कर ली हैं. महानगरों की घटती सीमाएँ, छोटी होती सड़कें और तेजी से बढ़ती गाड़ियों की संख्या में जाम अब आम समस्या है. ज़ाहिर है, मैट्रो इससे निजात पाने का एक बेहतर विकल्प है और इसी लिए तमाम महानगर इसे लेकर उत्साहित है और तत्पर भी. कार्यशैली कोलकाता में भारत की सबसे पहली मैट्रो रेल शुरू हुई लेकिन यह अपनी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी और जिस सफलता की उम्मीद थी, वैसा संभव नहीं हो सका.
जानकार मानते हैं कि कोलकाता में मैट्रो के परिपथ निर्माण और उसे चालू करने में बहुत ज्यादा वक़्त लगा और कोलकाता के लोगों को इसके चलते बहुत परेशानी भी उठानी पड़ी. इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव ये पड़ा कि मैट्रो पटरियों पर तो चढ़ी लेकिन लोगों के दिल से उतर गई. पर मानना पड़ेगा दिल्ली मैट्रो के निर्माण की कार्यशैली को. लोगों को ख़बर भी नहीं होती कि काम कब कहाँ पहुँचा और कब ख़त्म हो गया. सब कुछ बड़े-बड़े परदों और टीन की चादरों से घिरा हुआ. मज़ा ये कि जमीन के नीचे काम और जमीन पर दिल्ली का ट्रैफिक, दोनों ही बेरोक-टोक चल रहे हैं. जहाँ पर सड़क कम चौड़ी हैं वहाँ लोहे की मजबूत चादरों से "डेकिंग" की गई हैं और उस पर गाड़ियाँ चल रही हैं, नीचे सुरंग तैयार हो रही हैं. तकनीकी का आधुनिकतम प्रयोग और विशिष्ट समय प्रबंधन के साथ चल रहे इस काम को कॉर्पोरेशन महज सात सालों में पूरा करने जा रहा है जबकि इसके लिए 10 साल की समय सीमा तय की गई थी. दयाल बताते हैं, "हमारे लिए एक-एक दिन बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक दिन के विलम्ब का यदि अनुमान लगाएँ तो प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभावों की गणना के बाद हमें दो करोड़ रूपए का नुकसान होगा, ऐसे में समयबद्धता हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है." तकनीकी पक्ष पूरे काम को अंजाम देने के लिए दुनिया की आधुनिकतम तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. दिल्ली विश्वविद्यालय से केन्द्रीय सचिवालय तक 11 किलोमीटर का भूमिगत परिपथ विकसित किया जा रहा है जो ग्यारह स्टेशनों से गुज़रेगा. इस रूट पर रोजाना साढ़े चार लाख यात्री आ-जा सकेंगे. इस रूट की सुरंग बनाने के लिए टीबीएम (टनल बोरिंग मशीन) का इस्तेमाल किया गया है.
इसके अलावा जिन बड़े-बड़े पुलों पर मैट्रो दौड़ रही हैं, उन पुलों के निर्माण में "कैन्टीलेवर निर्माण पद्धति" का इस्तेमाल किया जा रहा है. पुल और सुरंग निर्माण की ये दुनिया में आधुनिकतम तकनीक हैं. लेकिन इन सबसे ख़ास है टिकट चेकिंग सिस्टम, जो न लंदन के पास है और न हाँगकाँग में. सभी स्टेशनों पर आने-जाने के लिए कॉन्टैक्ट-लेस टोकन सिस्टम है. यह पूरी तरह से स्वचालित तकनीकी पर आधारित है. इसमें यात्री पर्स के अंदर से ही अपना टोकन दिखाकर आ-जा सकता है. लेकिन ख़बरदार, बिना टोकन के न गेट खुलेगा और न यात्रा कर सकेंगे. इतना ही नहीं, ट्रेनों के आवागमन के लिए केन्द्रीय स्वचालित तकनीकी विकसित की गई है. यानी ट्रेन का चलना, रूकना, यहाँ तक की उसकी गति भी इसी तकनीकी द्वारा स्वतः नियंत्रित होगी और ड्राइवर का काम महज गेट खोलने और बंद करने का ही होगा. आपदा प्रबँधन की दृष्टि से भी मैट्रो परिवहन में खास तरह की तैयारियाँ और व्यवस्थाएँ की गई हैं. ये सभी व्यवस्थाएँ आपदा प्रबँधन में दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित संस्था, नेशनल फॉयर प्रिवेंशन एसोसिएशन (एनएफपीए) के आदर्श पैमानों के मुताबिक हैं. अनुशासन परियोजना की इन तमाम विशिष्टताओं के ऊपर भी एक चीज़ है और वे हैं परियोजना के प्रबंध निदेशक ई.श्रीधरन. 72 वर्षीय श्रीधरन हर एक अधिकारी से नियुक्ति से पहले व्यक्तिगत रूप से मिलते हैं और उनके लिए अवसर तय करते हैं. सभी कर्मियों के लिए रोज़ काम के साथ-साथ योग और ध्यान अनिवार्य है. परियोजना में दिल्ली मैट्रो रेल कॉर्पोरेशन के 2000 से अधिक कर्मचारी काम कर रहे हैं. लेकिन इनमें न तो कोई चपरासी हैं और न ही क्लर्क. सभी को अपनी अन्य सेवाएँ खुद प्राप्त करनी हैं. इसके अलावा सभी को काम पर लगने से पहले ट्रेनिंग स्कूल में प्रशिक्षण लेना भी अनिवार्य हैं. हाँगकाँग की तरह यहाँ भी एक प्रशिक्षण स्कूल खोला गया है जहाँ कर्मचारियों को काम, उसकी बारीकियों आदि से परिचित कराया जाता है. परियोजना पर कॉर्पोरेशन के अलावा तकरीबन 100 ठेकेदार और 15 हज़ार कर्मचारी काम कर रहे हैं. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||