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मित्र बनाने और आजीवन निभाने की परंपरा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में फ़्रेंडशिप डे मनाने की प्रथा भले आज चलन में आई हो, छत्तीसगढ़ में मित्र बनाने और मित्रता निभाने की एक लंबी सांस्कृतिक परम्परा रही है. पहली अगस्त को मनाया जाने वाला फ़्रेंडशिप डे तो एक दिन का मामला है लेकिन छत्तीसगढ़ की यह परंपरागत मित्रता ऐसी होती है कि इसके आगे ख़ून के रिश्ते फीके पड़ जाएँ. मित्र बनाने की इस परम्परा में ना उम्र का बंधन है, ना ही जाति या वर्ण का. एक बार मित्र बन गए तो जीवन भर उस मित्रता का निर्वाह सगे रिश्ते-नातों से कहीं बढ़कर किया जाता है. मितान बदना मित्र बनाने की इस परम्परा को छत्तीसगढ़ में मितान या मितानिन 'बदना' कहते हैं. इस 'बदना' का मतलब है एक तरह से अनुबंध की औपचारिकता. दो पुरुष या दो महिलाएँ आपस में एक दूसरे को मितान बनाने के लिए एक दिन नियत करते हैं और मितान बद लेते हैं. कहीं फूलों का आदान-प्रदान किया और मित्र बन गए, तो कहीं गंगा जल या तुलसी के पत्तों का आदान-प्रदान हुआ. एक छोटे-से आयोजन में गौरी-गणेश और कलश की पूजा के बाद एक दूसरे को कोई पवित्र चीज़ देकर मितान 'बदा' जाता है. कहीं-कहीं एक दूसरे का नाम अपने हाथों पर गुदवा कर (यानी उसका नाम अपने हाथ में स्थाई टैटू की तरह लिखवाकर) मितान बनने की भी परम्परा है. हालांकि स्वाभाविक सामाजिक परिवेश की वजह से इस परंपरा का विस्तार दो विपरीत लिंग वाले लोगों के बीच नहीं हो सका. यानी कोई पुरुष किसी महिला के साथ मितान नहीं बद सकता. पीढ़ियों का साथ इस मित्रता के कई नाम हैं, हालांकि व्यावहारिक रुप से सब एक से ही हैं. मितान बनाने के लिए आदान प्रदान की जाने वाली चीज़ के आधार पर इनके नाम भी हैं- भोजली मितान, दौनापान, गंगाजल, सखी, महाप्रसाद, गोदना, गजामूंग. दो पुरुष आपस मे मितान होते हैं और दो महिलाएँ मितानिन. श्रावण मास की सप्तमी को धान के बीज बो कर उसे पूजने की परम्परा यहां रही है, जिसे भोजली कहा जाता है. रक्षाबंधन के दूसरे दिन इस भोजली को विसर्जित किया जाता है. छत्तीसगढ़ में एक दूसरे को इसी भोजली को कानों में लगा कर भोजली मितान बनाने की प्रथा चलन में ज़्यादा है. एक बार आपस में मित्र बन गए तो यह मित्रता आजीवन बरक़रार रहती है और आने वाली पीढ़ियों में भी उस मित्रता का निर्वाह किया जाता है. मितान यानी हर सुख-दुख का साथी. किसी के यहां ब्याह हो या मृत्युपरांत मुंडन, मितान हर क़दम पर एक दूसरे के साथ होंगे. याराना बिलासपुर के गतौरी गांव में रहने वाले रामझूल साहू ने 55 साल पहले भेलऊराम यादव को अपना मितान बनाया था. आज 70 की उम्र में आकर एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि उनके जीवन में भेलऊ का महत्व सगे भाई से कम है.
रामझूल कहते हैं- "अब तो उम्र के आख़री पड़ाव में आ गए हैं लेकिन मुझको याद नहीं कि कभी हम दोनों के बीच किसी बात को लेकर, किसी भी तरह का कोई मनमुटाव हुआ हो. हर सुख-दुख में बिना आवाज़ दिए ही मैंने मितान को अपने साथ खड़ा पाया है." क्या जाति भेद इस मित्रता के आड़े नहीं आया, इसका जवाब भेलऊराम ने दिया- "कैसी जाति? कहां कि जाति? मितान बन गए तो फिर तो दोनों की एक ही जाति हो गयी, मितान की जाति! " छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारे में भी रिश्तों को मज़बूती प्रदान करने के लिए मितान बनाने की परम्परा रही है. सरगुजा राजपरिवार के यू एस सिंहदेव और सरगुजा के राज्यसभा सदस्य रहे प्रवीण प्रजापति ने भी एक दूसरे को सखी बनाया था. प्रवीण प्रजापति नहीं रहे लेकिन सिंहदेव परिवार और प्रजापति परिवार के बीच आज भी रिश्ते बरकरार हैं. इसी तरह राज्य में भाजपा के बुजुर्ग विधायक बद्रीधर दीवान और केदारनाथ वाजपेयी की मित्रता की मिसाल दी जाती है, जिन्होंने अपनी उम्र के शुरुवाती दौर में एक-दूसरे को मितान बनाया था. एक बार मितान या मितानिन बन जाने के बाद मित्र को नाम ले कर संबोधित करने की परंपरा नहीं है. जब भी मित्र को संबोधित करना होगा तो केवल मितान कह कर या जिस परम्परा के तहत मितान बदा गया है, उसे ही संबोधन के लिए इस्तेमाल किया जाता है. किसी ने आपस में प्रसाद का आदान-प्रदान कर एक दूसरे को मित्र बनाया है तो दोनों आजीवन एक दूसरे को महाप्रसाद के नाम से संबोधित करेंगे. इसी तरह किसी महिला ने अगर मोगरे का फूल देकर मितानीन बनाया है तो वे एक-दूसरे को लिए फूलमोंगरा या मोंगराफूल के संबोधन का इस्तेमाल करेंगी. देवता स्वरुप कई बार तो आपस में झगड़े करने वाले बच्चों को भी मितान बना दिया जाता है. ज़ाहिर है, इसके बाद तो आजीवन झगड़े का प्रश्न ही नहीं उठता. शादी के बाद पड़ोसन से रोज़-रोज़ की कलह से बचने के लिए रायगढ़ की अराधना शुक्ला और सतवंतिन ने आपस में मितानिन बनना तय किया. अराधना हंसती हुई कहती हैं- "13 साल हो गए, लेकिन मितानिन बनने के बाद तो कभी एक बार भी एक दूसरे के प्रति इर्ष्या या बैर भाव मन में नहीं आया. वरना इससे पहले तो हमारी सुबह की शुरुआत ही ..." वे अपनी बात को अधूरा ही छोड़ जाती हैं. गोया पुरानी बातों को याद करना भी उनके लिए पाप हो. लेकिन क्या मितान के संदर्भ में कोई नकारात्मक विचार लाना सचमुच पाप है ? इसका जवाब दिया बिलासपुर के रामनारायण प्रधान ने- "पाप नहीं, महापाप है. मितान बनाया यानी आपने उसे देवता का दर्जा दे दिया और भला देवता के बारे में कोई भला-बुरा सोच सकता है!" 15 वर्ष पहले बने उनके मितान आनंदराम साहू अपने इस मितान को गले लगाते हुए कहते हैं- "मुझको तो मेरे मितान ने सच में देवता की तरह देखा है." नई पीढ़ी नयी पीढ़ी में मितान बनाने का चलन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है लेकिन गांवों में अब भी यह परम्परा कायम है.
फ़्रेंडशिप डे के शोर-शराबे से दूर बिलासपुर शहर से लगे हुए सेंदरी गांव की 10 साल की निशा और नीतू पटेल ने एक दूसरे को हाल ही में मितानिन बनाया है. नीतू को फ़्रेंडशिप डे की जानकारी नहीं है लेकिन मितान बनाने के बारे में कोई बात हो तो उसे इससे संबंधित सारे प्रसंग और रीति रिवाज कंठस्थ हैं. हालांकि कई बार आपस में झगड़े का मूड होता है लेकिन मितान की संस्कृति इस मूड पर लगाम लगा देती है. नीतू कहती हैं- "हम तो अब ऐसी सहेलियां हो गई हैं, जो मरने के बाद भी एक-दूसरे की सहेलियां रहेंगी." |
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