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रिकॉर्ड में छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री 'फ़रार' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन के खिलाफ़ ग़ैर जमानती वारंट के बाद देश के कई हिस्सों में ऐसे मुक़दमे सामने आने लगे हैं, जिसमें राजनीतिज्ञ फ़रार बताए जा रहे हैं. लेकिन छत्तीसगढ़ में तो इस मामले में नया मोड़ ही आ गया है क्योंकि वहाँ पुलिस के रिकॉर्ड में उनके अपने ही गृहमंत्री बृजमोहन अग्रवाल फ़रार हैं. इस घटना से विपक्ष को बैठे-बिठाए एक मुद्दा मिल गया है और वह अब गृहमंत्री का इस्तीफ़ा माँग रहा है. हालांकि गृहमंत्री बृजमोहन अग्रवाल का कहना है कि उनकी जानकारी में उनके ख़िलाफ़ कोई वारंट नहीं है और जिस मामले की बात की जा रही है वह राजनीतिक मामला है कोई आपराधिक मामला नहीं. पुलिस इस मामले में कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे रही है. उल्लेखनीय है कि पुलिस विभाग गृहमंत्रालय के अधीन ही आता है. यह मामला खुला बुधवार की शाम को जब जल्दबाज़ी में बुलाई गई एक प्रेस कांफ़्रेंस में नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा ने आरोप लगाए कि राज्य के गृहमंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी फ़रार हैं और उनकी गिरफ़्तारी के लिए मार्च 2001 से ही वारंट जारी किया हुआ है. पुलिस का दावा बीबीसी हिंदी से बात करते हुए रायपुर के पुलिस महानिरीक्षक डीएम अवस्थी ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष कर्मा ने जिस मामले का ज़िक्र किया है उस मामले में 2002 के बाद से कोई वारंट जारी नहीं हुआ है. यह पूछे जाने पर कि क्या गृहमंत्री अग्रवाल के ख़िलाफ़ इस समय कोई वारंट ही नहीं है या वे पुलिस रिकॉर्ड में फ़रार नहीं हैं, उन्होंने कहा कि अभी विभाग इस बारे में जाँच कर रहा है. रायपुर के एसपी वीके चौबे ने कई बार फ़ोन करने पर हर बार यह कहकर बात करने में असमर्थता जताई कि वे मीटिंग में हैं. दूसरी ओर कांग्रेस नेता और अधिवक्ता किरणमयी नायक ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मेरे पास अदालत द्वारा जारी वारंट की प्रमाणित प्रति है और इसके अनुसार आख़िरी बार 19 मार्च 2004 को इस मामले में गृहमंत्री के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट जारी हुआ है." उनका आरोप है कि चूंकि पुलिस विभाग सीधे गृहमंत्रालय के अंतर्गत आता है इसलिए पुलिस इस मामले में सही जानकारी देने में डर रही है. दस्तावेज़ छत्तीसगढ़ से पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल के अनुसार महेंद्र कर्मा ने गृहमंत्री के ख़िलाफ ज़ारी वारंट से संबंधित जो दस्तावेज़ पत्रकारों को उपलब्ध करवाए, उनके अनुसार 17 अक्टूबर 2001 को प्रथम श्रणी न्यायिक दंडाधिकारी ने गृहमंत्री अग्रवाल के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 299 के तहत कार्रवाई के आदेश दिए थे.
दस्तावेज़ों के अनुसार 27 जनवरी 2001 को जब राज्य भर के व्यापारी विधानसभा के बाहर तत्कालीन कांग्रेस सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे, तब पुलिस ने उनके भाई योगेश अग्रवाल को गिरफ़्तार किया था. आरोप है कि बृजमोहन अग्रवाल ने पुलिस हिरासत से अपने भाई को जबरन छुड़ा लिया और फ़रार हो गए. इस मामले में एक स्थानीय सहायक उपनिरीक्षक ने भारतीय दंड संहिता की धारा 224-225 के तहत मामले को अदालत में पेश किया. जहां पेशी पर पेशी पड़ती गयी और 8 पेशियों के बाद भी बृजमोहन अग्रवाल अदालत में नहीं आए. इसके बाद न्यायालय ने 17 अक्टूबर 2001 को बृजमोहन अग्रवाल की ग़िरफ़्तारी का आदेश जारी किया. 2001 से बृजमोहन अग्रवाल के ख़िलाफ़ वारंट जारी होते रहे और बृजमोहन अग्रवाल फरार घोषित किए जाते रहे. विपक्ष की माँग इन दस्तावेज़ों से ज़ाहिर है कि गृहमंत्री बनने के बाद भी उनके खिलाफ वारंट जारी हुए और उन्होंने अपनी ज़मानत नहीं ली. विधानसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस के उम्मीदवार ने बृजमोहन अग्रवाल के नामांकन को लेकर आपत्ति की थी लेकिन उनकी आपत्ति खारिज कर दी गई. नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा कहते हैं- "जब केंद्र में शिबू सोरेन दागी मंत्री होने के कारण इस्तीफा दे सकते हैं तो बृजमोहन अग्रवाल क्यों नहीं और भाजपा इस मुद्दे पर कैसे ढील बरत सकती है? यह एक संवैधानिक प्रश्न है और गृहमंत्री को तत्काल इस्तीफ़ा दे देना चाहिए." कर्मा ने कहा कि अगर बृजमोहन अग्रवाल ने इस्तीफा नहीं दिया तो कांग्रेस राज्यपाल से मिल कर उनके इस्तीफे की मांग करेगी. लेकिन नेता प्रतिपक्ष कर्मा की इस बात से गृहमंत्री इत्तफ़ाक नहीं रखते. बृजमोहन अग्रवाल के अनुसार उन पर कई राजनीतिक मुकदमे हैं और जो भी मामला उनके संज्ञान में आया है, उन्होंने अदालत से ज़मानत ले ली है. विपक्ष के इस्तीफ़े की मांग को लेकर वे कहते हैं-"यह विपक्ष का अधिकार है और इस्तीफ़े की उनकी इस मांग को मैं गंभीरता से नहीं लेता." फ़िलहाल इस मामले ने छत्तीसगढ़ में राजनीतिक गहमागहमी तो बढ़ा ही दी है. |
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