BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शनिवार, 17 जुलाई, 2004 को 13:07 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
'पानी बाबू' बन गए हैं बलराम

बलराम चक्रवर्ती
बलराम प्यास बुझाने के काम को मिशन बना चुके हैं
भारत में पहले रेलवे स्टेशनों पर एक पद होता था– “पानी पांडे”. उसका काम प्यासे यात्रियों को पानी पिलाना.

अब वो पद तो ख़त्म हो गया लेकिन पश्चिम बंगाल में उत्तर 24 परगना ज़िले के गोपालनगर के बलराम चक्रवर्ती बिना किसी पद और स्वार्थ के पिछले पाँच सालों से इलाके के लोगों की प्यास बुझाने में लगे हुए हैं.

अपनी टूटी-फूटी साइकिल पर विभिन्न आकार की बोतलों में पानी भर कर वे दिन भर गांव–शहरों और हाट-बाज़ारों में घूमते रहते हैं.

पसीने से तरबतर किसी व्यक्ति को देखते ही वे साइकिल रोककर कहते हैं, “थोड़ा पानी पी लीजिए. आराम महसूस होगा.”

जो लोग उनको पहचानते हैं वे उन्हें देखते ही कहते हैं, “पानी बाबू थोड़ा पानी पिला दीजिये.” लोगों को पानी पिलाते-पिलाते बलराम चक्रवर्ती का नाम ही पानी बाबू हो गया है.

उनकी साइकिल पर लटके एक कपड़े पर लिखा है- “ जलदान केंद्र.”

समाज सेवा

उन्होंने पुण्य कमाने के लिये नहीं बल्कि समाज के लिये कुछ करने के मक़सद से ये काम चुना है.

 जल बाबू ने साबित कर दिया है कि संसाधन नहीं होने के बावजूद अगर आदमी में लगन हो तो बहुत कुछ किया जा सकता है
देवज्योति भट्टाचार्य

उनकी इस नि:स्वार्थ सेवा के चलते ही उत्तर 24 परगना के अलावा पास के दक्षिण 24 परगना और नदिया ज़िले के लोग उन्हें दोनों हाथ जोड़कर अपनी श्रद्धा जताते हैं.

पानी बाबू के काम की जानकारी प्रशासन को भी है. बनगांव के सब डिविज़नल अधिकारी देवज्योति भट्टाटार्य कहते हैं कि जल बाबू ने साबित कर दिया है कि संसाधन नहीं होने के बावजूद अगर आदमी में लगन हो तो बहुत कुछ किया जा सकता है.

गरमी का मौसम हो या बरसात और जाड़े का, बलराम इलाके में कहीं न कहीं पानी पिलाते नज़र आ जाएंगे. साइकिल पर आगे पीछे दर्जनों बोतलें झूलती रहती हैं. सुबह घर से निकलने के बाद वे देर रात तक ही घर लौट पाते हैं.

आख़िर उनके मन में ये खयाल कैसे आया? इसके जवाब में बलराम बताते हैं कि एक बार इलाके में कीर्तन के दौरान उन्हें सबको पानी पिलाने का जिम्मा मिला था. लोगों को पानी पिलाकर उन्हें काफ़ी आत्म संतुष्टि मिली. उसके बाद लोगों ने नाम ही जल बाबू रख दिया. अब तो ये हाल है कि किसी दिन लोगों को पानी नहीं पिलाएं तो अच्छा ही नहीं लगता.

ग़रीबी

गोपालनगर स्टेशन के पास काली मंदिर के बगल में ही बलराम का मकान है. बांस के बाड़े और टिन से बने एक कमरे के इस घर से ग़रीबी झांकती है. वे अपनी पत्नी और एक बेटी के साथ इसी घर में रहते हैं. बड़ी बेटी की शादी हो चुकी है जबकि छोटी मधुमिता आठवीं कक्षा में पढ़ती है.

News image
भारत में गर्मियों में जल संकट आम बात है

आख़िर उनके घर का ख़र्च कैसे चलता है? वे बताते हैं कि पत्नी मूंगफली के छिलके साफ़ करती है. इसके अलावा मौक़ा मिलने पर वे कभी-कभार लॉटरी के टिकट बेच लेते हैं.

लोगों को मुफ्त पानी पिलाने के इस काम का क्या घर के लोग विरोध नहीं करते? बलराम बताते हैं कि वे लोग उनकी मदद ही करते हैं. सब मिलकर जो कुछ कमा लेते हैं उसी से गृहस्थी चल जाती है.

पत्नी अनीता कहती हैं कि उनके पति बहुत ही सरल दिल के आदमी हैं, अगर संसाधन होता तो वे शायद समाज के लिये और कुछ कर पाते.

वे कहती हैं कि पानी पिलाने के चक्कर में शुरु-शुरु में कई बार जल बाबू को अंजान लोगों से अपमानित भी होना पड़ा. कई बार लोगों ने उनको कोई ठग समझ लिया.

पानी पिलाने के बीच मौक़ा मिलने पर वे अपने लिखे गीत भी गाते हैं.

अब उनकी उम्र बढ़ रही है इसलिए वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि कब तक साइकिल से घूमकर लोगों को पानी पिलाते रहेंगे. वे चाहते हैं कि एक तिपहिया ख़रीदकर उसी पर घूमते हुये लोगों को पानी पिलायें.

जल बाबू कहते हैं कि जब तक सांस चलेगी लोगों को पानी पिलाते रहेंगे. मरने से पहले वे अपनी आंखें और शरीर दान करना चाहते हैं ताकि किसी के काम आ सकें.

सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>