| भारत में छपता है एक चीनी अख़बार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत का एकमात्र चीनी भाषी अख़बार इन दिनों अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. सिअंग पाउ या ओवरसीज़ चाइनीज़ कॉमर्स ऑफ़ इंडिया नामक यह दैनिक कोलकाता से 1969 से ही छप रहा है. यह चाइनीज़ टेनरी एसोसिएशन के बीस सदस्यों के अनुदान और स्थानीय चीनी व्यवसायियों के कुछ विज्ञापनों के सहारे चल रहा है. कोलकाता के चाइना टाउन के टेंगरा रोड से प्रकाशित सिअंग पाउ का अधिकांश भाग हाथ से लिख कर तैयार किया जाता है. कंप्यूटरों से आंशिक मदद ही ली जाती है. पिछले पाँच वर्षों से 80 वर्षीय सीजे चेन इस अख़बार का संपादन कर रहे हैं. उन्होंने कहा, "अख़बार का एक ही उद्देश्य है- भारत में रह रहे चीनी लोगों के सुख-दुख का साथी बनना." अख़बार में प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय ख़बरों में भारत, ताइवान, चीन, हांगकांग आदि को प्रमुखता दी जाती है. धार्मिक उत्सवों, मून फ़ेस्टिवल और चाइनीज़ न्यू ईयर मेला की विशेष कवरेज़ की जाती है. चेन ने कहा, "ख़बरें हम इंटरनेट के अलावा विभिन्न देशों के रेडियो, टीवी और अख़बारों से लेते हैं." उन्होंने बताया कि चार पेजों के अख़बार सिअंग पाउ की प्रसार संख्या मात्र 350 रह गई है. पहले ये 800 के क़रीब थी. इसकी एक प्रति का मूल्य ढाई रुपये है. कोलकाता में इसे ग्राहकों तक हॉकर पहुँचाते हैं जबकि भारत के विभिन्न हिस्सों और बांग्लादेश में इसे डाक से भेजा जाता है. संकट चेन स्वीकार करते हैं कि उनका अख़बार अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है.
उन्होंने बताया कि चीनी चमड़ा व्यवसायी कोलकाता छोड़कर अमरीका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसी जगहों पर जा रहे हैं. अपना शहर कोएंग तंगमसियान छोड़कर 24 वर्ष की आयु में 1949 में कोलकाता आए चेन ने कहा, "भारत-चीन युद्ध से पूर्व कोलकाता में चीनियों की आबादी अच्छी-ख़ासी थी. लेकिन अब बहुत कम चीनी इस शहर में रह गए हैं." जो कोलकाता में रह गए हैं उनके अनुदान पर दिए विज्ञापन से ही अख़बार चल रहा है. चाइना टाउन के चीनी विद्यालय की प्रधानाध्यापिका हशियोंग कहती हैं, "सिअंग पाउ कोलकाता के चीनियों के लिए भारतीय समाज को जानने का एक विश्वसनीय ज़रिया है." बहरहाल, चीनियों की घटती आबादी और विज्ञापन की कमी से सिअंग पाउ का हश्र चाइनीज़ जर्नल ऑफ़ इंडिया जैसा हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं. उल्लेखनीय है कि कोलकाता से लगातार 60 वर्षों तक प्रकाशित होने के बाद आर्थिक कारणों से यह चीनी अख़बार को दो वर्ष पूर्व बंद कर दिया गया. |
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