BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
बुधवार, 23 जून, 2004 को 07:02 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
शरीर में हुक डालकर शिव भक्ति

रोजनी फोड़ा की रस्म
शिव भक्ति का एक रूप
झारखंड का आदिवासी समाज विकास की राह पर चलने के बावजूद तमाम अजीबोग़रीब परंपराओं को छोड़ने को तैयार नहीं है.

ऐसी परंपराओं में से एक है चड़क पूजा. इसे स्थानीय भाषा में 'गाजन' या 'शिवेर' के नाम से जाना जाता है.

शिव की उपासना के इस पर्व में भक्तगण अपने शरीर में हुक डालकर उससे बैलगाड़ी, रिक्शा आदि खींचते हैं और शरीर के विभिन्न हिस्सों से रस्सी आरपार करते हैं.

कई इलाक़ों में तो इस दौरान आग पर चलने की भी परंपरा है.

ऐसी मान्यता है कि 'चकरी' या 'चक्र' शब्द से चड़क नाम की उत्पत्ति हुई.

आमतौर पर चैत माह की संक्रांति को दिन भर के उपवास के बाद भक्तगण इसे धूमधाम से मनाते हैं.

एक मेले का आयोजन किया जाता है जहाँ भक्तगण अपनी सहनशक्ति का प्रदर्शन करते हैं.

प्राचीन परंपरा

चड़क पूजा की उत्पत्ति के बारे में कई मान्यताएँ हैं.

News image
शरीर में लगे हुक से रिक्शा खींचते हुए जंगल सरदार

सबसे ज़्यादा प्रचलित मान्यता के अनुसार चैत मास की संक्रांति को ही शिव के परम भक्त राजा वाण ने भगवान को प्रसन्न करने के लिए रक्त बहा कर कठिन तपस्या की थी.

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि प्राचीन काल में राजाओं द्वारा सैनिकों की सहनशक्ति की परीक्षा इसी तरह ली जाती थी.

चाहे जो भी हो, भक्तों द्वारा पीठ में लोहे के हुक से शरीर को छेदकर इस तरह कारनामा दिखाना दर्शकों में रोमांच भर देता है.

लोहे के मोटे-मोटे हुक से चमड़े को छेदने के स्थान पर बहते ख़ून को रोकने के लिए भक्तगण शरीर के उस स्थान पर मात्र सिंदूर का प्रयोग करते हैं.

उन्हें डॉक्टरों के पास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती.

रोजनी फोड़ा

झारखंड राज्य में सरायकेला के आदित्यपुर दिंदली बस्ती में पिछले दिनों चड़क पूजा पारंपरिक हर्षोल्लास से मनाया गया.

दो दिनों के इस आयोजन के अंत में रोजनी फोड़ा का कार्यक्रम रखा गया.

उस दौरान शिव भक्तों ने पीठ में लोहे का हुक चुभाकर आधा किलोमीटर तक बैलगाड़ी और रिक्शे खींचे.

अनेक भक्तों ने अपनी बाँहों को छेदकर रस्सी आरपार किया. दरअसल इसे ही रोजनी फोड़ा कहा जाता है.

News image
भक्तगणों का उत्साह बढ़ाने का प्रयास

इस दौरान छऊ नृत्य का विशेष रूप से आयोजन किया जाता है.

दिंदली शिव पूजा कमेटी के अध्यक्ष बबू दत्ता ने बताया कि उनकी बस्ती में यह आयोजन 1818 से ही लगातार किया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि आमतौर पर भक्तगण मन्नते माँगते हुए रोजनी फोड़ा करते हैं.

छोटानागपुर की आदिवासी संस्कृति के जानकार और जमशेदपुर के लालबहादुर शास्त्री कॉलेज में मनोविज्ञान के प्राध्यापक दिगम्बर हंसदा ने बताया कि चड़क पूजा आदिवासी संस्कृति का अभिन्न अंग है.

उन्होंने बताया कि देश के अन्य कई हिस्सों में भी इसे अलग-अलग नामों से मनाया जाता है.

इससे जुड़ी ख़बरें
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>