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एनडीए के लिए ख़तरे की घंटी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पीला रंग पीला पड़ गया है, आंध्र प्रदेश की जनता ने चंद्रबाबू नायडू को लॉगऑफ़ कर दिया है. फ़िल्मों के राम और कृष्ण एनटी रामराव के राजनीति के पर्दे पर हिट होने से पहले तक कांग्रेस का साथ देने वाले राज्य आंध्र प्रदेश में एक बार फिर कांग्रेस की बारी है. एनडीए के खुशनुमा एहसास के बीच उसकी मुश्किलों की भविष्यवाणी करने वाले अपनी पहली परीक्षा में पास हो गए हैं. आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू के चुनावी अभियान के केंद्र में "फीलगुड" ही था जो बीजेपी के राष्ट्रीय अभियान का आधार था. "फीलगुड" का जो अभियान आंध्र में नाकाम रहा क्या वह देश भर में चलेगा? शायद इसी आशंका ने दिल्ली में बीजेपी ख़ेमे में हलचल मचा दी है, हालांकि एनडीए नेतृत्व को आंध्र से इससे बहुत अलग नतीजों की आशा नहीं रही होगी लेकिन उनके लिए यह एक झटका ज़रूर है. एनडीए की कुर्सी का सबसे मज़बूत पाया खिसकता दिखाई दे रहा है, किसी भी विश्लेषक को इसमें शक नहीं कि राज्य की 42 लोकसभा सीटों के परिणाम आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनाव के नतीजों से बहुत अलग नहीं होंगे. आंध्र प्रदेश में लोकसभा की 42 सीटों में से 1999 के चुनाव में टीडीपी ने 29 सीटें जीती थीं जबकि भाजपा ने छह सीटें जीती थीं, यानी कुल 35 सीटें. इस बार के मतदान-बाद सर्वेक्षण बता रहे हैं कि टीडीपी के सीटों की संख्या घटकर छह-सात तक पहुँच सकती हैं, भाजपा को पिछली बार मिली छह सीटें भी टीडीपी के साथ गठबंधन के कारण ही मिली थीं. आंध्र प्रदेश में लोकसभा चुनाव में टीडीपी-बीजेपी गठबंधन को होने वाले नुक़सान की भरपाई बहुत मुश्किल दिखाई देती है. भाजपा को उम्मीद है कि पंजाब, असम और कर्नाटक जैसे राज्यों में मिलने वाली बढ़त से आंध्र प्रदेश में होने वाले नुक़सान को पाट लिया जाएगा. इन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें हैं और भाजपा को उम्मीद है कि उनसे जनता की नाराज़गी का फ़ायदा उसे मिलेगा.
भारत के पाँच प्रमुख टीवी चैनलों की चुनावी भविष्यवाणी में कितना भी अंतर हो, एक बात सब कह रहे हैं कि एनडीए को पिछली लोकसभा से कम सीटें मिलेंगी यानी वह सरकार बनाने के लिए टीडीपी जैसी पार्टियों के बाहर से मिलने वाले समर्थन पर ज़्यादा निर्भर होगी. एक नहीं तीन-तीन टीवी चैनल--आजतक, एनडीटीवी और ज़ी न्यूज़ एनडीए को 250 से कम सीटें मिलने की भविष्यवाणी कर रहे हैं यानी उसे सरकार बनाने के लिए कम से कम 25 तक सांसदों के समर्थन की ज़रूरत पड़ सकती है. छोटे दल एनडीए को गठबंधन से बाहर के जिन दलों से समर्थन का आसरा हो सकता है उनमें से किसी ने बहुत सकारात्मक रूख़ नहीं दिखाया है.
बीजेपी ने कई बार कहा कि विदेशी मूल के व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने के सवाल पर समाजवादी पार्टी के रूख़ के कारण दोनों दलों में साझेदारी संभव है, इस पर समाजवादी पार्टी ने कम से कम सार्वजनिक तौर पर तो कड़ी आपत्ति की है और कहा है कि वाजपेयी नेतृत्व को किसी भी हालत में समर्थन नहीं दिया जाएगा. समर्थन पाने के लिए एनडीए की नज़र समाजवादी पार्टी के अलावा, ओमप्रकाश चौटाला के इंडियन नेशनल लोकदल, झारखंड मुक्ति मोर्चा, बहुजन समाज पार्टी और अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल पर है. आंध्र प्रदेश के अलावा दक्षिण में एक और राज्य है जहाँ एनडीए को भारी नुक़सान होने के आसार हैं, वह है तमिलनाडु. तमिलनाडु में एम करूणानिधि की डीएमके पार्टी को छोड़कर, जयललिता की एआईडीएमके से गठबंधन करना भाजपा को भारी पड़ सकता है क्योंकि राज्य में सत्ताधारी एआईडीएमके की अलोकप्रियता का घाटा उसे हो सकता है. पिछली बार राज्य की कुल 39 लोकसभा सीटों में से एआईडीएमके ने ग्यारह और डीमके ने दस सीटें जीती थीं, इस बार के चुनावी सर्वेक्षण जयललिता की पार्टी का सफ़ाया होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं. 1999 के चुनाव में डीएके से साझीदारी के कारण बीजेपी ने तमिलनाडु में पहली बार चार सीटें हासिल हुई थीं लेकिन इस बार ऐसा होने का आसार नहीं दिख रहे. राज्यवार विश्लेषण के जाल में उलझे बिना ही यह देखा जा सकता है कि आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में एनडीए को होने वाला घाटा सरकार बनाने के मंसूबों में रोड़े अटका सकता है. भविष्यवाणियों के मुताबिक़ अगर गठबंधन बहुमत से दूर रहा तो राजनीतिक नाटक बहुत दिलचस्प हो जाएगा, इतना तो ज़रूर है कि राजनीतिक समीकरण नए सिरे से गढ़े जाएँगे, आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम इसी ओर इशारा कर रहे हैं. |
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