|
चुनावी मुद्दों पर विशेषज्ञ के जवाब | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हमने बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के पाठकों से चुनाव से जुड़े सवाल आमंत्रित किए थे और वादा किया था कि उनके सवालों के जवाब हमारे चुनाव विशेषज्ञ योगेंद्र यादव देंगे. हमने पाठकों के सवाल योगेंद्र यादव के सामने रखे. प्रस्तुत है उनके जवाब. मेरे जैसे अनेक भारतीय विदेशों में बसे हैं. हम अपने मताधिकार का प्रयोग कैसे करें? क्या चुनाव आयोग के पास कोई विकल्प है? इसके लिए इंटरनेट का इस्तेमाल क्यों नहीं हो सकता? संजय कौशिक, बैंकॉक, थाईलैंड हमारे देश के क़ानून में फिलहाल ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. दरअसल बात केवल विदेशों की ही नहीं है, हमारे देश में तो ऐसा मतदाता, जो अपने संसदीय क्षेत्र में नहीं है, वह भी कहीं और वोट नहीं दे सकता है. ये विशेषाधिकार उन्हीं लोगों को दिया गया है, जिन्हें सरकार या चुनाव आयोग विशेष कार्य से अपने चुनाव क्षेत्र से बाहर भेजता है. या तो चुनाव कार्यक्रम में सरकारी अधिकारियों को, या फिर फ़ौजियों को. अगर ऐसी व्यवस्था करनी है तो संसद में विशेष प्रस्ताव लाना पड़ेगा.
मेरा सवाल यह है कि लोकसभा या विधानसभा के लिए एक ही उम्मीदवार दो जगह से क्यों खड़े हो जाते हैं. क्या इस तरह एक और प्रत्याशी का हक़ नहीं मारा जाता? एमए अहद, बड़ोदा पहले इस पर कोई कानूनी बंदिश नहीं होती थी कि एक प्रत्याशी कितनी जगहों से चुनाव लड़ रहा है. लेकिन कुछ मामलों में इसका ग़लत इस्तेमाल हुआ इसलिए अब यह नियम बना दिया गया है कि एक प्रत्याशी अधिकतम दो जगहों से ही चुनाव लड़ सकता है. बड़े नेता इसलिए ऐसा करते हैं क्योंकि या तो वे एक क्षेत्र में असुरक्षित महसूस करते हैं और या फिर एक जगह में घेरे जाने का ख़तरा रहता है. इससे राजनीतिज्ञों की असुरक्षा तो दिखती है, लेकिन किसी का हक छिनता दिखाई नहीं देता. क्योंकि अगर कोई दो जगह से जीत जाए तो दो जगहों से प्रतिनिधि तो नहीं रह सकता, एक सीट तो छोड़नी ही पड़ेगी. हाँ, ये राजनीतिक मर्यादा के अनुरूप नहीं है. भारत में ऐसी क्या बुनियादी बात है जो अन्य लोकतंत्रों में नहीं है? अवधेश, दरभंगा लोकतंत्र दुनिया में संपन्न और एकरूपी समाजों के लिए बना था और इसके बनते समय शायद इसके पैरोकारों को इसकी कल्पना भी नहीं रही होगी कि लोकतंत्र का प्रयोग ऐसे देश में भी हो सकता है. जहाँ सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक विषमता और विविधता इतनी गहरी है. मैं समझता हूँ कि ग़ैर बराबरी और विविधता के साथ लोकतंत्र के सपने और संघर्ष को बनाए रखना ही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता है. क्या हम सांविधानिक प्रावधानों के ज़रिए आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों से छुटकारा नहीं पा सकते? प्रशांत कुमार झा, रांची
मैं समझता हूँ कि हर बीमारी का इलाज क़ानून और संविधान से नहीं हो सकता. क़ानून और संविधान मदद कर सकते हैं. अपराधियों को रोकने के लिए कुछ क़ानूनी प्रावधान हैं और उनको थोड़ा और कड़ा किया जा सकता है, लेकिन ये वो बीमारी नहीं है जिसको क़ानून से ही सुलझा सकते हैं. कई बड़े अपराधी ऐसे होते हैं जिनके बारे में लोग तो जानते हैं लेकिन क़ानून की निगाह में वो अपराधी नहीं होते हैं. ऐसे लोगों को सबूत और गवाह न होने की वजह से सजा नहीं हो सकती. इसके लिए क़ानून को और कड़ा करने के बजाय राजनीतिक दलों के भीतर लोकतंत्र को बनाने और बेहतर संस्कार और विचार पैदा करने की ज़रूरत है. एक प्रतिनिधि पर कितना सरकारी ख़र्च आएगा और भारत के एक नागरिक पर कितना आर्थिक बोझ पड़ेगा? विष्णु प्रसाद तिवारी, भिलाई अगर चुनाव पर होने वाले खर्च की बात करें तो पिछले चुनाव में करीब 900 करोड़ का खर्च आया था. इस बार हो सकता है कि 1000-1200 के करीब खर्च हो जाए. यानी कि देश के हर व्यक्ति के ऊपर 20 रूपये का खर्चा. लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए ये खर्च कोई बहुत बड़ा खर्च नहीं है. 1000 करोड़ भारत के राष्ट्रीय बजट का बहुत बड़ा हिस्सा नहीं है. यूँ भी, लोकतंत्र के प्रावधानों को बनाए रखने की कीमत को पैसों से नहीं आँक सकते हैं. इस असंतोष की असली वजह ये नहीं है कि पैसा ज़्यादा खर्च होता है, बल्कि ये है कि उससे वो काम नहीं होता है जिसकी लोगों को अपेक्षा है. भारत में राजनीति प्रोफ़ेशन के तौर पर क्यों नहीं होती है? उसके लिए क्या योग्यताएँ ज़रूरी हैं? राजेश कुशवाहा, दिल्ली राजनीतिक प्रोफ़ेशन के दो अलग-अलग मायने हो सकते हैं. एक तो यह कि जैसे लोग डिग्री लेकर डॉक्टर इंजीनियर वगैरह बनते हैं, वैसे ही राजनीति में आने के लिए हो, लेकिन ऐसा करना लोकतंत्र की भावना के ख़िलाफ़ होगा. राजनीति में आने की एक ही डिग्री होनी चाहिए, वो है जनता के दुख-दर्द को समझने की क्षमता, उसे अभिव्यक्त करने की योग्यता और उनका विश्वास जीत सकने का माद्दा. इससे अधिक किसी भी चीज़ की माँग करना लोकतंत्र की भावना के ख़िलाफ़ होगा. दूसरा मतलब ये हो सकता है कि राजनीति गंभीरता से की जाए, पूर्णकालिक लोग राजनीति करें, बजाय उनके जो कल तक व्यापार, फ़िल्म आदि कर रहे थे. कभी-कभी राजनीति को प्रोफ़ेशन कहने से उसमें धँधे की बू आने लगती है, अगर राजनीति धँधा बन गई तो यह लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ होगा. मतपत्र में नेगेटिव वोट के लिए बटन क्यों नहीं होता अगर आपकी पसंद का उम्मीदवार नहीं है तो आप के पास यह विकल्प होना चाहिए. कपिल देव कौशिश, हिसार, हरियाणा
मैं समझता हूँ कि ये विकल्प होना चाहिए, खुद चुनाव आयोग ने भी यह कहा है कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए और इस ओर प्रयास जारी रहे तो संभव है कि अगले चुनाव तक ऐसी व्यवस्था लागू हो जाए. लेकिन इतना भर होने से चुनाव एकदम साफ़ हो जाएँगे और अपराधी खत्म हो जाएँगे, ऐसा कहना ग़लत होगा. वैकल्पिक और साफ़-सुथरी राजनीति को खड़ा करने का काम कुछ लोगों को करना ही होगा. नेगेटिव वोट ये काम नहीं कर पाएगा. क्या ये सही है कि भारत में दलितों की आबादी 70 से 80 प्रतिशत है? तो फिर वे सत्ता से बाहर क्यों हैं? जगतार सिंह, कनाडा अगर दलित से आशय अनुसूचित जातियों से है, तो उनकी आबादी देश में 16 फ़ीसदी के आस-पास है, 70-80 बिल्कुल नहीं है. ये आबादी पूरे देश भर में फैली हुई है, इसलिए किसी एक इलाक़े या सीट में केवल इनके वोटों के दम पर ही कोई चुनाव नहीं जीत सकता. इससे उनकी ताकत कम रहती है. लेकिन दलित का मतलब अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़े, इन सभी से है तो इनकी संख्या 70 फ़ीसदी के करीब है. लेकिन फिर वो इतने अलग-अलग तरह के हैं कि उनके लिए एक साथ आकर काम करना संभव नहीं है. इसके लिए बहुत गंभीर राजनीति और आंदोलन करना होगा. मतदान के बाद होने वाले एक्ज़िट पोल का उद्देश्य क्या होता है? गिरिधर पांडे, औरंगाबाद आमतौर पर तो बहुत सीधा-सादा उद्देश्य होता है, चुनाव के परिणाम का अनुमान लगाना. और वो इसलिए कि लोगों को बहुत उत्सुकता होती है. इससे लोकतंत्र का कोई बड़ा उद्देश्य सधता हो, ऐसा मुझे नहीं दिखता लेकिन हाँ, लोगों की जिज्ञासा शांत होती है और इस बहाने लोगों को कई सूचनाएँ मिलती हैं. मतदान के पहले और बाद होनेवाले सर्वेक्षण को आप कैसे परिभाषित करते हैं? इनकी विश्वसनीयता कितनी है? अरविंद कुमार, पटना, बिहार चुनाव पूर्व सर्वेक्षण का मतलब है, चुनाव से पहले लोगों के पास जाकर उनकी राय माँगना कि लोग क्या सोचते हैं. कैसे वोट डालेंगे. लेकिन अगर पूरे देश के मानस का सर्वेक्षण करना है तो हमें यह देखना होगा कि देश के हर वर्ग और क्षेत्र के लोगों की उनकी संख्या के प्रतिशत के हिसाब से राय ली गई हो. भारत में कितने लोग हैं जो वोट नहीं डालते? ये कौन लोग हैं? क्या इनकी संख्या हर चुनाव में समान रहती है या बदलती रहती है? सुधांशु गुप्ता, दिल्ली
भारत में अंदाजन 40-50 फ़ीसदी लोग वोट नहीं डालते हैं, यानी मतदान करने वालों की संख्या 50-60 फ़ीसदी रहती है. ज़्यादातर शहरी इलाकों के संपन्न और शिक्षित लोग वोट नहीं डालते हैं. जब राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव होता है तो मतदान कम होता है, विधानसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या बढ़ जाती है, और पँचायत स्तर के चुनावों में तो ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो वोट नहीं डालते. इस सब मायने में हमारा देश सबसे अनूठा है. दुनिया के अन्य देशों में आमतौर पर पढ़े-लिखे लोग ज़्यादा मतदान करते हैं लेकिन अपने यहाँ इसका ठीक उल्टा होता है. 60 साल की उम्र के बाद कोई भी व्यक्ति एक चपरासी की नौकरी के लिए भी नियुक्त नहीं किया जा सकता. लेकिन ऐसे लोग देश के राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री और सांसद कैसे बन जाते हैं? टी एस सोखे, जमशेदपुर इस सवाल के पीछे जो एक भाव है उसके हिसाब से प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति होना भी एक नौकरी है लेकिन राजनीति एक ऐसा कैरियर नहीं है जो 20-25 साल की उम्र में शुरू होता है. एक लेखक 30-35 की उम्र में परिपक्व होता है, ऐसे में ये नहीं कहा जा सकता है कि 60 की उम्र के बाद वो लिखना बंद कर दे. अगर ऐसा होता है तो हम तमाम अच्छी कृतियों से वंचित ही रह जाएँगे. राजनीति की समझ अक्सर 40-45 के करीब आती है, इसलिए 60 की उम्र पर एक तकनीकी बंदिश लगा देना समझ से परे है. हाँ, अगर जनता युवा लोगों को पसंद करें तो उनको कोई नहीं रोकता. इसका फ़ैसला भी जनता को करना चाहिए, न कि किसी किताब और क़ानून से. इन चुनावों में 18 से 20 साल की उम्र के वोटरों का प्रतिशत कितना है? इनसे नतीजों पर कितना असर पड़ता है? प्रकाश पांडे, गुजरात इससे चुनाव के नतीजों पर कोई बुनियादी फ़र्क नहीं पड़ता. राजीव गाँधी ने मतदाता की उम्र को कम करा कर सोचा था कि मतदाता युवा नेता को अवसर देंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ऐसा नहीं है कि युवा लोग किसी दूसरी पार्टी को वोट देते हैं और बुज़ुर्ग लोग किसी दूसरे को. हाँ कुछ पुरानी पार्टियों का बुजुर्गों में ज़्यादा मत होता है. लेकिन युवा हमारे यहाँ एक अलग राजनीतिक समुदाय नहीं है.
इन चुनावों से पहले सभी पार्टियों के नेता कुछ मुद्दों पर चुनाव लड़ते रहे और काम भी करते थे. लेकिन इस चुनाव में गंदगी उछाली जा रही है. क्या चुनाव निष्पक्ष हो रहे हैं या जातिवाद पर? सभी नेता आज कुछ कहते हैं, वह छपता है तो हाथों-हाथ खंडन भी कर देते हैं. आज कोई ऐसा नेता नहीं है जिसके दामन पर दाग़ नहीं है. क्या यही नैतिक मूल्य रह गए हैं देश के नेताओं के? चोरों के भी उसूल होते हैं पर हमारे नेताओं के कोई उसूल ही नहीं हैं. मुझे सभी पार्टियों के नेता `चोर-चोर मौसेरे भाई' ही लगते हैं. क्या ये चुनाव जातिवाद पर नहीं हो रहा? क्या इसे हम निष्पक्ष चुनाव कह सकते हैं?जितेंद्र सिंह भाटी, जोधपुर, राजस्थान कुछ खराब नेताओं, जिनके बारे में हम समाचार पत्रों से जानते रहते हैं, के आधार पर ही देश के हर राजनीतिक कार्यकर्ता जैसे गाँव के स्तर पर या क्षेत्र के स्तर पर, को ग़लत कहना दुर्भाग्यपूर्ण होगा. आज भी भारत में ऐसे हजारों-लाखों राजनीतिक कार्यकर्ता हैं जो तमाम मुश्किलों में भी समाज के लिए कुछ काम करते हैं, समस्या ये है कि हमारे देश की व्यवस्था कुछ ऐसी हो गई है जिसमें अच्छे नेता ऊपर नहीं पहुँच पाते. इसके लिए मध्यम वर्ग की उदासीनता भी काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार है. अब ये फ़ैशन भी बनता जा रहा है कि नेताओं को गाली देने से मन को बहुत सुकून मिलता है और उसके बाद कुछ न करने का बहुत अच्छा बहाना मिल जाता है. हाँ, अगर गुस्से को एक सकारात्मक दिशा में मोड़ा जाए और वैकल्पिक राजनीति की ओर बढ़ा जाए, तो ये काफ़ी बेहतर होगा. भारत को आज़ाद हुए इतने साल हो गए हैं, पर जनता के पास सड़कें नहीं हैं, रोज़गार नहीं हैं, बिजली नहीं है, पानी नहीं है, क्या कभी इनसे जनता को मुक्ति मिलेगी? भ्रष्टाचार का बोलबाला है, बिना दिए कोई काम नहीं होता. क्या भविष्य में ऐसा ही चलता रहेगा या इसे रोकने के लिए कोई कानून बनेगा? क्या पत्रकार यू हीं सोता रहेगा और भारत भाग्य विधाता ही सब चलाता रहेगा? हिम्मत सिंह भाटी, राजस्थान लोकतंत्र में भाग्यविधाता सिर्फ जनता होती है, न कि कोई नेता, पत्रकार या ऊपरवाला. अगर जनता सोती रहती है तो अच्छे से अच्छा नेता भी भ्रष्ट हो जाता है, पत्रकार सोता रहता है, अगर जनता जागरूक हो गई तो किसी नेता की, पत्रकार की मजाल नहीं हो सकती कि वो जनता की बात को नकार दे. इसका हल यही है कि क्या जनता संगठित होती है या नहीं, क्या देश का भला चाहने वाले लोग खुद राजनीति के दलदल में घुसकर उसे साफ़ करने की कोशिश करते हैं कि नहीं.
क्या लोकतंत्र के लचीलेपन ने समस्याओं में वृद्धि की है? राम आसरे यादव, इलाहबाद लचीलेपन के दो अर्थ हो सकते हैं, एक तो यह कि लोकतंत्र में सब-कुछ ढीले तरीके से होता है. तमाम प्रक्रियाओं से होकर गुजरना पड़ता है. लेकिन ऐसा जानबूझ कर किया गया है ताकि बहुत हद तक ग़लत निर्णय न हो सकें. इसका दूसरा मतलब होता है कि लोकतंत्र समाज के सभी हिस्सों को जगह देता है, लेकिन यह तो लोकतंत्र का गुण है. अगर इस बार चुनावों में एनडीए सत्ता में दोबारा आती है तो इसकी सबसे प्रमुख तीन वजहें क्या होंगी? मेरा दूसरा प्रश्न है कि भारत की मौजूदा, बेहद खर्चीली लोकतांत्रिक व्यवस्था का सर्वोत्तम विकल्प क्या है? विनोद अग्रहरि, गोरखपुर अगर एनडीए सत्ता में दोबारा आती है तो उसकी दो-तीन वजहें हो सकती हैं. एक तो यह कि राज्य स्तर पर ग़ैर-एनडीए सरकार के प्रति लोगों की नाराज़गी, दूसरा एनडीए के स्थानीय स्तर पर बनाए हुए पुख्ता गठबंधन, और तीसरा अटल बिहारी वाजपेयी की उदार, लचीली और संजीदा छवि का भी फ़ायदा होगा. जीतेगा या नहीं, ये तो वक्त बताएगा.
क्या भारत में राष्ट्रपतीय प्रणाली कारगर हो सकती है? राकेश मिश्रा, कैलीफ़ोर्निया, अमरीका जी नहीं, मुझे लगता है कि राष्ट्रपति प्रणाली भारतीय समाज और लोकतंत्र के अनुरूप नहीं है. यूँ भी दुनिया का अनुभव दिखाता है कि इस अमरीकी व्यवस्था से समस्याओं का हल नहीं निकला है, बल्कि ये खुद एक समस्या बन गया है. लेटिन अमरीका और श्रीलंका इसका उदाहरण हो सकते हैं. सोवियत संघ के विघटन के बाद भी जो देश बने उनमें भी इसका अनुभव अच्छा नहीं रहा. योगेंद्र जी ये बताएँ कि सबसे अधिक किंग और किंगमेकरों के यूपी-बिहार से होने के बावजूद इन राज्यों का विकास सबसे कम क्यों है? और भविष्य के बारे में क्या अनुमान है आपका? क्या राजनीतिक रूप से सर्वाधिक सजग इन क्षेत्रों का कभी आर्थिक विकास भी हो सकेगा? और बिहार में पिछले दो-तीन चुनावों से एक ही मुद्दा सबसे ऊपर क्यों रहता है कि मतदाता लालू के साथ हैं या लालू के विरोधी? राजेश, यामाटो, जापान उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में पिछले कुछ सालों में काफ़ी बदलाव आया है. पहले सत्ता अगड़ी जातियों के हाथ में थी, अब वो बदल कर पिछली-दलित जातियों के हाथ में आया है. लेकिन इनका जो नेतृत्व सामने आया है, वो राजनीतिक और वैचारिक दृष्टि से बहुत पिछड़ा है और कोई सार्थक राजनीतिक एजेंडा लेकर नहीं आ सका है. इसके चलते सत्ता तो बदली है लेकिन सामाजिक-आर्थिक ढ़ाचे में कोई बदलाव नहीं आया है. विकास केवल प्रशासनिक रूप से ही नहीं हो सकता. बिहार में लालू प्रसाद यादव के पक्ष और विरोध से लालू प्रसाद को ही फ़ायदा होता है. पिछले 10 सालों से लालू ने बिहार में कोई काम नहीं किया और इसे लालू विरोधी खेमे की अक्षमता ही कहा जाएगा कि वो कोई ऐसा विकल्प खड़ा नहीं कर सके जो वहाँ के पिछड़े मतदाताओं को इज़्जत भी दिखे और विकास की आशाएँ भी. मैं इस उम्मीद के साथ मतदान करूँगा कि आने वाली सरकार देश की सेवा करेगी और देश का नाम रोशन करेगी. चूँकि ये संसदीय चुनाव हैं इसलिए इनसे देश के भविष्य का फ़ैसला होगा. लेकिन अभी भी आज़ादी के 57 साल बाद भी विकास क्यों नहीं हो रहा है? दीपक कुमार विद्यार्थी, मुज़फ़्फ़रपुर विकास इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि लोकतांत्रिक राजनीति केवल सत्ता की उठा-पटक तक सीमित होकर रह गई है, उसका समाज परिवर्तन और देश के विकास से कोई संबंध नहीं रहा है. राजनीति कोई बड़ा सपना लेकर नहीं आ रही है, कोई नया विचार नहीं ला रही है. देश का विकास केवल योजनाओं और नौकरशाही से नहीं होगा. इसके लिए देश को एक नए किस्म की राजनीति की आवश्यकता है. फ़ील गुड और शाइनिंग इंडिया का स्लोगन बीजेपी ने कहाँ से और किस आधार पर अपनाया. कृपया बताएँ. अमानुल्ला ख़ान, महाराजगंज, उत्तर प्रदेश आडवाणी जी के मुताबिक कपड़ा बेचने वाली एक कंपनी से उन्हें प्रेरणा मिली. प्रेरणा जिस जगत से मिली, शायद उसी वजह से भाजपा इन दोनों शब्दों का पूरे चुनाव में किसी भी भारतीय भाषा में इसका अनुवाद नहीं सोच पाई. सवाल ये है कि कहीं ये नारे उसी जगत तक तो सीमित नहीं रहेंगे, जो इस कंपनी के कपड़े खरीदता है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||