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स्वाद क़ायम है पराँठे वाली गली का | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली के चाँदनी चौक इलाक़े में कई मशहूर गलियाँ और कूचे हैं. हर एक सँकरी गली अपनी एक ख़ास पहचान लिए हुए है. इन्हीं में एक है मशहूर 'पराँठे वाली गली' जिसकी चर्चा देश-विदेश हर जगह सुनी जा सकती है. लेकिन एक समय अपने पराँठे के लिए जानी-पहचानी इस गली में अब बड़ा अंतर आ चुका है. समय के चक्र और व्यावसायिकता की दौड़ में पराँठे वाली गली अपनी मौलिकता खो चुकी है. मुग़लों के ज़माने से मशहूर इस गली में कभी लगभग सभी दुकानें पराँठे की हुआ करतीं थीं. लेकिन आज स्थिति ये है कि इस पराँठे वाली गली में सिर्फ़ तीन दुकानें पराँठे की हैं. बाक़ी की दुकानें साड़ियों और कपड़ों की दुकानों में तब्दील हो चुकी हैं. स्थिति आज जो तीन पराँठे की दुकानें आपको इस गली में मिल जाएँगी वे 100 साल से भी ज़्यादा पुरानी हैं. इन दुकानों के मालिकों की पाँचवीं पीढ़ी के लोग इन दुकानों को चला रहे हैं. इन दुकानों में इंदिरा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री की, भोजन करते लगीं बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी हैं जो एक ज़माने में इनकी महत्ता का आभास दिलाती हैं. लेकिन अभी भी इन तस्वीरों की छाया में यहाँ बड़ी संख्या में लोग पराँठे खाने आते हैं. इनमें बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी भी होते हैं. एक ऐसे ही व्यक्ति गुड़गाँव के वरुण जैन कहते हैं, "भीड़-भाड़ वाली इस गली में राह चलते ढेरों लोगों के बीच पराँठे खाने का एक अलग अनुभव है." वरुण मानते हैं कि पाँच सितारा होटलों में भी उन्हें कभी ऐसा स्वाद चखने को नहीं मिला. डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही श्रुति का कहना था, "पित्ज़ा और बर्गर अपनी जगह हैं लेकिन इस गली का आकर्षण ही मुझे यहाँ खींच लाता है." बदलाव बदलते ज़माने ने इन दुकानदारों को भी अपने को बदलने पर मजबूर कर दिया है. तीन तरह के पराँठे की जगह अब गाजर, मूली और मटर के अलावा खुरचन, रबड़ी, मेवे, केले और टमाटर के पराँठे बनने लगे हैं.
पत्तलों की जगह अब स्टील की प्लेटों ने ले ली है. लेकिन जो चीज़ नहीं बदली वो है शुद्धता की गारंटी जिसका दावा ये दुकान अभी भी करते हैं. फ़ास्ट फ़ूड की दुकानों से मुक़ाबले की बात दुकानदार रमेश चंद्र शर्मा नहीं मानते हैं. वे कहते हैं, "हमारा मुक़ाबला केवल अपने आप से है. पित्ज़ा और पराँठे का मुक़ाबला हो ही नहीं सकता." नेता-अभिनेताओं की पसंद लंबे समय से नेता और अभिनेता इन दुकानों पर पराँठे खाने आते रहते हैं. प्रमोद महाजन, राम नाईक और अक्षय कुमार जैसे लोग कभी-कभी यहाँ भी आ ही जाते हैं.
लेकिन इन हाई प्रोफ़ाइल लोगों के यहाँ न आने का एक कारण सुरक्षा की समस्या भी है. कोई 100 साल पुरानी दुकान 'गयाप्रसाद शिवचरणदास' के वर्तमान मालिक राजीव शर्मा कहते हैं, "अब राजनेता यहाँ नहीं आ पाते हैं. लेकिन हम उनके यहाँ जाकर उनका पराठा खाने का शौक पूरा कर देते हैं." वे प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री के यहाँ भी जा चुके हैं. चिंता और उम्मीद इन सबके बावजूद पराँठे वाली गली के पराँठा दुकान मालिकों को अपने दुकानों के भविष्य की चिंता है. नई पीढ़ी के उनके बच्चे अब पढ़-लिख चुके हैं और इस व्यवसाय में नहीं आना चाहते. रमेशचंद शर्मा भावुक होकर कहते हैं, "ये दुकान मेरी माँ है. मेरा मोह, मेरी ममता इसी से है और किसी से नहीं. कोई-न-कोई तो इसे चलाएगा ही और बाप-दादाओं की विरासत को आगे ले जाएगा." बदलते स्वाद और स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता के चलते इस गली का आकर्षण भले ही कम हुआ हो लेकिन उत्सुकता, इन गलियों की परंपरा और इनके चाहने वालों के कारण यह गली अभी भी ज़िंदा है. |
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