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रविवार, 02 मई, 2004 को 11:53 GMT तक के समाचार
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अपने गढ़ में ही फंस गए हैं कमलनाथ

कमलनाथ
कमलनाथ छह बार छिंदवाड़ा से संसद पहुँच चुके हैं
मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा लोकसभा सीट को राज्य में ‘मदर ऑफ़ ऑल बैटेल्स’ यानी सबसे रोचक और कठिन संघर्ष के रूप में देखा जा रहा है.

यहाँ से पिछले छह चुनाव जीत चुके कांग्रेस महासचिव कमलनाथ मैदान में हैं और इन्हें चुनौती दे रहे हैं केंद्रीय कोयला मंत्री और भाजपा नेता प्रहलाद पटेल.

इन दोनों की लड़ाई को गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की उपस्थिति ने तीसरा आयाम दे दिया है.

छिंदवाड़ा उन संसदीय क्षेत्रों में से है, जहाँ 1977 के आम चुनावों में कांग्रेस विरोधी देशव्यापी लहर के बावजूद कांग्रेस का ही प्रत्याशी जीता था.

'प्रहलाद पटेल बाहरी'

कमलनाथ यहाँ से छह बार चुनाव जीत चुके हैं और इस बार यानी सातवीं बार भी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं. कमलनाथ को विश्वास है कि इस बार भी जनता उनका ही साथ देगी.

कमलनाथ कहते हैं, ''प्रहलाद पटेल बाहर के हैं और उन पर कई मामले भी चल रहे हैं, प्रहलाद आपराधिक छवि के हैं और लोगों का भरोसा कमलनाथ के साथ है.''

कमलनाथ ने गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और भाजपा के बीच साठ-गाँठ का आरोप लगाते हुए कहा कि दोनों ही दल मिलकर कांग्रेस के वोट काटना चाहते हैं.

कमलनाथ यहाँ से सिर्फ़ एक बार 1996 के उपचुनाव में हारे थे लेकिन 1998 और 1999 में वो दोबारा जीत गए.

इससे पहले उनकी पत्नी अलका नाथ भी एक बार चुनाव जीत चुकी हैं.

'कमलनाथ की तानाशाही'

हालांकि भाजपा ने इस बार उनके ख़िलाफ़ केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री, उमा भारती के ख़ास समझे जाने वाले प्रहलाद पटेल को उतारा है.

प्रहलाद का चुनाव प्रचार युद्ध स्तर पर चल रहा है. इससे पहले प्रहलाद बालाघाट से सांसद रह चुके हैं जबकि छिंदवाड़ा उनके लिए नया संसदीय क्षेत्र है.

पटेल का दावा है कि लोग कमलनाथ के आतंक से त्रस्त हैं.

उन्होंने कहा, ''क्षेत्र में अराजकता का माहौल है, यहाँ तानाशाही चलती है और यहाँ कमलनाथ के गुंडों का आतंक है.''

उन्होंने कमलनाथ को चुनौती देते हुए कहा कि इस बार कमलनाथ हारेंगे क्योंकि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी भी उनके वोट काटेगी.

निर्णायक हैं आदिवासी वोट

उधर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के एकमात्र विधायक मनमोहन शाह आदिवासी वोटों के आधार पर चुनाव जीतने की कोशिश कर रहे हैं.

शाह के सहयोगी और गोंडवाना आंदोलन से जुड़े डीके प्रजापति दावा करते हैं कि इस बार के चुनाव में कमलनाथ की ऐतिहासिक हार होगी और उन्हें एक लाख से भी कम वोट मिलेंगे.

उन्होंने बताया कि अटल के पक्ष में भाजपा प्रत्याशी को ढाई से तीन लाख वोट मिल सकते हैं जबकि शाह को साढ़े तीन लाख वोट मिलने की उम्मीद है.

क्षेत्र में कुल 12 लाख मतदाता हैं जिनमें से 40 फीसदी वोट आदिवासियों के हैं.

जानकारों का मानना है कि शाह के आने से कमलनाथ की मुश्किलें बढ़ गई हैं.

शाह को जो आदिवासी वोट मिल सकते हैं, उन्हें कांग्रेस का आधार माना जाता है.

कमलनाथ भी इस बात को समझ रहे हैं लेकिन वे दावा करते हैं कि वे इसे लेकर चिंतित नहीं हैं.

कई लोग ये मानते हैं कि कमलनाथ अगर जीतते हैं तो जीत का अंतर बहुत अधिक नहीं होगा वहीं कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि इस बार छिंदवाड़ा में कुछ उलटफेर हो सकता है.

परिणाम जो भी हो, लेकिन यहाँ के माहौल से साफ़ पता चलता है कि छिंदवाड़ा को मुख्यमंत्री उमाभारती ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है.

यही वजह है कि अब कमलनाथ के लिए यह चुनाव आसान नहीं रह गया है.

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