| राज करने का मोह अभी भी बरकरार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जब देश आजाद हुआ और रियासतों का विलय हुआ तब छत्तीसगढ़ में 14 रियासतें थीं. ठोटे बड़े ये राजघराने अपने अपने क्षेत्र में ताक़तवर तो थे ही बाद में राजपरिवार ने लोकतंत्र में भी हाथ आजमाना शुरु किया और आज तक विधानसभा और लोकसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं. चाहे वह 13 हजार वर्ग मील वाली बस्तर की रियासत हो या फिर 138 वर्गमील वाली सक्ति रियासत. ताजा लोकसभा चुनाव में मुख्यमंत्री रमन सिंह के लिए विधानसभा की सीट छोड़कर चुनाव लड़ रहे प्रदीप गांधी के विरुद्ध खैरागढ़ रियासत के युवराज देवव्रत सिंह मैदान में हैं. वहीं मुख्यमंत्री रमन सिंह से इसी राजघराने की गीतादेवी सिंह मुकाबला कर रही हैं. यह सच भी है कि राज्य में रियासतों के प्रभाव वाले कई क्षेत्र एक-एक कर अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित होते गए और रियासतों के वारिस क्रमशः सत्ता की दौड़ से बाहर चले गए हैं लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि छत्तीसगढ़ में सरगुजा जैसे जिलों की राजनीति आज भी देसी रियासतों के इर्द-गिर्द घूम रही है. पीढ़ी दर पीढ़ी सारंगढ़ रियासत के राजा नरेशचन्द्र सिंह 1952 के पहले चुनाव में सारंगढ़ से विधायक बने.इसके बाद भी तीन बार वे विधायक बने. इस बीच वे एक बार 13 दिनों के लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे.
इसके बाद उनकी बेटियाँ कमला देवी, रजनीगंधा और पुष्पादेवी सिंह भी राजनीति में आईं. पुष्पादेवी सिंह लोकसभा में भी रहीं. छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी रियासत सरगुजा के शासक चंडीकेश्रवर शरण सिंह देव पहली बार 1952 में विधायक बने थे. बाद में उनकी पत्नी महारानी देवेन्द्र कुमारी ने कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा और विधायक व मंत्री बनीं. इस राजघराने से यू.एस.सिंहदेव आदि राजनीति में सक्रिय रहे लेकिन लोकसभा के साथ-साथ सरगुजा की अधिकांश विधानसभा की सीटें भी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गयीं और सत्ता की दौड़ से राजघराना बाहर हो गया. इसके बाद भी सरगुजा की राजनीति पर इस राजघराने की पकड़ अब तक बरकरार है और मान्यता है कि जीत-हार के सारे समीकरण महल के समर्थन और विरोध पर टिके रहते हैं. सरगुजा से लगे हुए कोरिया राजघराने के रामचंद्र सिंहदेव ने 1967 में विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीत हासिल कर संविद सरकार में 16 विभागों के मंत्री बने. इसके बाद से वे अब तक 6 बार चुनाव जीतकर अविभाजित मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विभिन्न महत्वपूर्ण मंत्री पदों पर रहे हैं. जूदेव जशपुर राजघराने के विजयभूषण सिंहदेव 1952 व 1957 में जशपुर से विधायक और 1962 में रायगढ़ से सांसद बने.
बाद में इस इलाके की कमान कथित धर्मांतरण के खिलाफ घर वापसी का कार्यक्रम चलाने वाले दिलीप सिंह जूदेव ने संभाली. जूदेव ने 1989 में जांजगीर से लोकसभा का चुनाव लड़ा और सांसद बने लेकिन 1991 में वे चुनाव हार गए. बाद में भाजपा ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया. वे केंद्र में मंत्री बने और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे लेकिन रिश्वत कांड ने उनका फिर राजनीतिक हाशिए पर बिठा दिया है. रायगढ़ राजघराने के कई सदस्य भी राजनीति में रहे हैं. कवर्धा रियासत के वारिस मूलतः विधानसभा चुनावों तक ही सीमित रहे हैं. और अब तीसरी पीढ़ी के योगेश्वर राज सिंह विधानसभा के सदस्य हैं. उससे सटी हुई खैरागढ़ रियासत के सदस्यों का राजनीतिक दबदबा आज़ादी के बाद से शुरु हुआ तो आज तक बरकरार है. खैरागढ़ की रियासत कई राजनीतिक खेमों में बंटी हुई है. फिर भी अब तक खैरागढ़ में हुए विधानसभा चुनावों में 9 बार जीत का सेहरा रियासत के वारिसों के माथे ही बंधा है. राजीव गाँधी के सहपाठी रहे शिवेंद्र बहादुर सिंह राजनांदगांव से लोकप्रिय सांसद रहे हैं. अब उनके भतीजे देवव्रत सिंह भी चुनाव मैदान में हैं. बस्तर आदिवासी बहुल कांकेर रियासत के शासक भानुप्रताप देव 1952 व 1962 में विधायक बने. बाद में यह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कर दी गई. इस कारण कांकेर रियासत के वारिस सत्ता और राजनीति से दूर हो गए. कुछ यही हाल बस्तर रियासत का भी रहा. बस्तर रियासत में देवताओं की तरह मान्य राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव 1957 में विधायक बने लेकिन उनकी मौत के बाद राजपरिवार का सक्रिय राजनीति से रिश्ता टूट गया. इस क्षेत्र की भी सीट अनुसूचित जाति जनजाति के आरक्षित कर दी गई. इसके अलावा सक्ति से लेकर वीरेंद्रनगर तक कई रियासतों के वारिस गाहे बगाहे वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भी दस्तक देते रहे हैं. |
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