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शुक्रवार, 09 अप्रैल, 2004 को 11:28 GMT तक के समाचार
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दुकानदार मैदान में, पैसे गल्ले में

गोपाल बाबू की दुकान
दुकान में ग्राहक तो होते हैं लेकिन दुकानदार नहीं
क्या आज के ज़माने में भी ऐसा संभव है कि किसी दुकान को मालिक नहीं बल्कि ग्राहक ही चलाते हों और बीते 15 वर्षों से हिसाब-किताब में गड़बड़ी नहीं हुई हो?

अगरी अनूठी दुकान देखनी हो तो पश्चिम बंगाल के 24 परगना ज़िले के छोटे से शहर बशीरहाट में गोपाल स्टोर्स पर आपका स्वागत है.

दरअसल, इसके मालिक गोपाल मजूमदार दुकान पर नहीं बैठते. वजह ये है कि पूर्व फुटबॉलर गोपाल मजूमदार ने अपना जीवन उभरते खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने में समर्पित कर दिया है.

वे सुबह आकर अपनी दुकान खोलकर थर्मस में चाय भरकर रख देते हैं और फुटबॉल मैदान की ओर चले जाते हैं.

फिर सुबह से जुटने वाले लोग खुद ही चाय निकाल कर पीते हैं और उसके पैसे डिब्बे में डाल देते हैं. चाय के अलावा बिस्कुट, केक, अंडे और घरेलू इस्तेमाल की दूसरी वस्तुऐं भी दुकान में मिलती हैं.

जो चाहिए निकालिए और पैसा रख दीजिए. गोपाल बाबू बीच में एकाध बार आकर थर्मस में और चाय रख जाते हैं.

कोई डर नहीं

ख़ास बात ये है कि बशीरहाट में गोपाल बाबू को कभी लोगों ने धोखा नहीं दिया. वह बताते हैं कि 15 वर्षों में कभी एक पैसे की भी गड़बड़ी नहीं हुई.

 मैं खिलाड़ियों को ईमानदारी का प्रशिक्षण देता हूँ. आज तक दुकान से एक बिस्किट भी गायब नहीं हुआ है
गोपाल मजूमदार

क्या दुकान में चोरी का डर नहीं लगता? इस पर गोपाल कहते हैं कि "मैं खिलाड़ियों को ईमानदारी का प्रशिक्षण देता हूँ. आज तक दुकान से एक बिस्किट भी गायब नहीं हुआ है. किसी ने बिना पैसे दिए एक कप चाय तक नहीं पी है."

लेकिन गोपाल बाबू की इस अनूठी मिसाल के पीछे एक दयनीय कहानी भी छिपी है. उनसठ साल के गोपाल बाबू का पहला प्यार फुटबॉल है.

अपने खेलने के दिनों में वे दो-दो बार बशीरहाट के सर्वश्रेष्ठ फुटबॉलर चुने जा चुके हैं. उनकी देखरेख में प्रशिक्षण पाकर निकले फुटबॉलरों की सूची भी काफी लंबी है. इनमें भारत के पूर्व कप्तान आलोक दास भी शामिल हैं.

संघर्ष

अपने खेलने के दिनों में गोपाल ने नौकरी के लिए काफी भागदौड़ की थी. इलाक़े के लोगों ने इस माँग में बशीरहाट नगरपालिका में पोस्टर भी लगाए थे, लेकिन कहीं नौकरी नहीं मिली.

प्रशिक्षण
गोपाल मजूमदार युवा खिलाड़ियों को रोज़ फुटबॉल सिखाते हैं

गोपाल बताते हैं कि सभी राजनीतिक दलों ने वादे तो बहुत किए लेकिन नौकरी किसी ने नहीं दी. हर तरफ से निराश होने के बाद 1972 में उन्होंने अपनी थोड़ी सी पूंजी लगाकर एक फुटबॉल प्रशिक्षण केंद्र खोला.

लेकिन ये तीन पुत्रियों और पत्नी का पेट भरने के लिए काफी नहीं था. इसलिए दुकान खोलने का फैसला किया. लेकिन सवाल ये भी था कि दुकान पर बैठेगा कौन?

तब गोपाल ने लोगों पर भरोसा करते हुए दुकान खोली और हर चीज़ पर कीमत लिख दी....तब से आज तक किसी ने उनका भरोसा नहीं तोड़ा है.

समस्याएँ

कुछ साल पहले एक दुर्घटना में कई ऑपरेशन होने के बाद से उनकी ज़िंदगी अभावों ही में गुज़र रही है. हालाँकि इस बारे में वह कोई बात नहीं करते.

दुकान में ग्राहक
क़ीमत पढ़िए, सामान लीजिए, पैसे डालिए

उनकी पत्नी प्रतिमा कहती हैं, "परिवार कैसे चलता है, ये मैं ही जानती हूँ." उनकी एक पुत्री की शादी हो चुकी है और बाकी दोनों बेटियाँ अभी पढ़ रही हैं.

इलाक़े में गोपाल की लोकप्रियता का आलम यह है कि रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड कहीं भी पूछने पर लोग उनकी दुकान का रास्ता बता देंगे.

गोपाल की दुकान पर आये निताई मुखर्जी ने बताया कि यह दुकान हम लोग ही चलाते हैं. जिसकी जो मर्ज़ी होती है खाकर डिब्बे में पैसा रख देता है.

एक अन्य ग्राहक मंतू बताते हैं कि यह सिर्फ एक दुकान नहीं, विश्वास का जीता-जागता मंदिर है हमारे लिए.

अपने अभाव और संघर्ष के बावजूद गोपाल ने स्वाभिमान से कोई समझौता नहीं किया. एक स्थानीय क्लब ने उनकी सहायता के लिए एक चैरिटी मैच आयोजित करने का प्रस्ताव दिया था लेकिन गोपाल ने उसे ठुकरा दिया.

वे कहते हैं, "नौकरी के लिए दर-दर घूमा हूँ. किसी ने भी सहायता नहीं की. अब इस उम्र में किसी की दया नहीं लेना चाहता."

शायद इसीलिए उनको इलाक़े में फुटबॉल का द्रोणाचार्य कहा जाता है.

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