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टीपू की मशहूर तलवार भारत लौट आई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अठारहवीं सदी के महान योद्धा टीपू सुल्तान की नामी तलवार दो सौ वर्षों के बाद एक बार फिर भारत पहुँच गई है. 1799 में श्रीरंगपट्टनम की लड़ाई में मौत के बाद टीपू की मशहूर तलवार अँगरेज़ों के हाथ लगी थी लेकिन अब एक उद्योगपति ने नीलामी में इसे ख़रीदा है. राज्यसभा के सांसद और बियर बनाने वाली कंपनी किंगफ़िशर के मालिक विजय माल्या ने यह तलवार एक करोड़ रूपए में ख़रीदी. इस लंबी तलवार पर सुंदर नक्काशी है और इसमें धार एक ही तरफ़ है. शेर-ए-मैसूर के नाम से जाने जाने वाले टीपू को यह तलवार बहुत प्रिय थे और इसे हमेशा अपने साथ रखते थे. भारत के जिन राजाओं ने अँगरेज़ों को कड़ी टक्कर दी उनमें टीपू का नाम सबसे पहली क़तार में आता है. यह टीपू की बहादुरी ही थी कि अँगरेज़ों को मैसूर को अपने साम्राज्य में शामिल करने के लिए नाकों चने चबाना पड़ा और उन्हें इस काम में चार दशक लग गए. धरोहर की राजनीति? 1799 से लेकर अब तक यह तलवार ब्रितानी सेना के तत्कालीन मेजर जनरल ब्रेड के परिवार में रही थी. दो सौ वर्षों के बाद मेजर जनरल के परिवार वालों ने इसे नीलाम करने का फ़ैसला किया जिसकी ख़बर विजय माल्या तक पहुँची. जनता पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष माल्या कहते हैं, "मैं इस तलवार को उसी महान राजा की धरती पर ले जाना चाहता था जिसने अपनी मातृभूमि की रक्षा बहुत बहादुरी से की थी." छह महीने पहले नीलामी में इस तलवार को ख़रीदने वाले माल्या कहते हैं, "इस तलवार पर सिर्फ़ और सिर्फ़ भारतीय लोगों का अधिकार है." अब तक तलवार के ख़रीदार का नाम ज़ाहिर नहीं किया गया था, विजय माल्या इन आरोपों को ग़लत बताते हैं कि घोषणा देर से करने का संबंध लोकसभा चुनाव से है. उन्होंने कहा, "यह फ़ैसला मेरे लिए व्यक्तिगत था, राजनीतिक नहीं." बहरहाल, यह ख़बर उन लोगों के लिए ज़रूर अच्छी है जो इस ऐतिहासिक धरोहर के भारत लौट आने की उम्मीद लगाए बैठे थे. |
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