मात्र छह सीटों वाला प्रदेश जम्मू-कश्मीर आगामी लोकसभा चुनाव के नतीजों को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करने जा रहा है.
लेकिन चुनाव में यहां जो कुछ होगा उसका राज्य में लोकतांत्रिक राजनीति के भविष्य के लिए बहुत महत्व है.
और इस अर्थ में इस बार के चुनाव जम्मू-कश्मीर के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं कि यहां चुनावी राजनीति सचमुच के अपने उसी रंग रूप में सामने आए जैसा कि पूरे मुल्क में बड़े मज़े से होता है.
और अगर यह हुआ तो निश्चित रूप से 2002 के विधानसभा चुनाव एक युग परिवर्तन का प्रतीक साबित होंगे.
इससे पहले के चुनावों, खासकर 1987 के चुनावों में मतदान में धांधली और दूसरी गड़बड़ियों के आरोप लगते रहे हैं.
अनेक ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि 1977 को छोड़कर राज्य में हुए सारे चुनावों में ग़लत मतदान हुआ था. शासक दल ज़ोर-जबरदस्ती कराता था.
सच्चाई जो हो, पर 2002 का अपेक्षाकृत साफ-सुथरा चुनाव राज्य के लोगों के लिए भी एक सुखद बदलाव का एहसास कराने वाला था.
और इसी के जीवंत मुकाबलों वाले सामान्य चुनावी संघर्ष का रास्ता खुला है.
और इस चुनाव में इस बात की जांच हो जाएगी कि राज्य और खासकर घाटी में वैसे ही जीवंत चुनाव होते हैं या नहीं जैसा पूरे मुल्क में होते हैं.
तीन क्षेत्र
सामान्य चुनावी लड़ाई शुरू होने का भी राज्य के तीन अलग-अलग क्षेत्रों के लिए एकदम अलग-अलग मतलब है.
![]() चरमपंथी घटनाओं के कारण जम्मू कश्मीर में सेना की बड़ी मौजूदगी है |
जम्मू-कश्मीर तीन इलाकों से बना है-कश्मीर घाटी, जम्मू और लद्दाख.
इन तीनों इलाकों की सामाजिक और धार्मिक बनावट अलग है और यहां एकदम अलग-अलग क़िस्म की राजनीति चलती है.
इनके अपने-अपने ढर्रे हैं, अपनी-अपनी प्रवृत्ति है.
इस हिसाब से आगामी चुनाव एक राज्य में ही तीन अलग-अलग क्षेत्रों में तीन तरह के पहलवानों की एकदम अलग-अलग कुश्ती होगी.
विभिन्न समुदायों के राजनीतिकरण पर भी इस बार के चुनावों का बहुत बड़ा और अलग-अलग असर होने लगता है.
राज्य की छह सीटों में से तीन सीटों वाली कश्मीर घाटी में लोगों की बसाहट और मजहबी विश्वास एक जैसै हैं.
यहां हिन्दुओं की आबादी मुश्किल से 5 फीसदी होगी जबकि मुसलमानों का हिस्सा 95 फीसदी है.
इनमें भी कश्मीरी बोलने वाले मुस्लिमों का अनुपात काफी बड़ा है.
गूजरों, पहाड़ियों और शिया जैसे समुदाय के लोगों की संख्या कम है.
राजनीतिक दल
इस समाज में चाहे जिस आधार पर बटवारा हो पर राजनैतिक गहमागहमी कम नहीं रही है.
![]() नेशनल कांफ्रेंस अपनी वापसी की ज़ोरदार कोशिशों में जुटी हुई है |
दशकों से यहां नेशनल कांफ्रेंस का दबदबा रहा है.
घाटी में उसका वही स्थान था जो पूरे मुल्क में कांग्रेस का था.
नेशनल कांफ्रेंस के दबदबे को पहली बार कांग्रेस से निकलकर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी बनाने वाले मुफ्ती मोहम्मद सईद ने तोड़ा जो पिछले विधानसभा चुनाव के बाद से मुख्यमंत्री हैं.
अगर संसदीय सीटों के हिसाब से देखें तो पीडीपी की जीत का अंतर बहुत कम है.
उसे तीन में से दो संसदीय सीटों पर बढ़त थी.
वैसे तो पीडीपी कांग्रेस से टूटकर ही बनी है पर उसकी अपनी अलग पहचान है.
वह न तो कांग्रेस का एक मुकाबला मानी जाती है न केन्द्र सरकार की पिछलग्गू है.
इतना ही नहीं यह नेशनल कांफ्रेंस के मजबूत विकल्प के रूप में उभरी है.
पार्टी की महबूबा मुफ्ती ने इस बात में सफलता पाई है कि कश्मीरी लोग उनकी पार्टी को अपना मानें और नेशनल कांफ्रेंस का राजनैतिक एकाधिकार न चले.
परन्तु साथ-साथ नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला भी जुटे हैं कि अपनी पार्टी का पुराना जनाधार क़ायम हो.
ख़ुद श्रीनगर से चुनाव लड़ने की उनकी दिलेरी भरी घोषणा से उनकी पार्टी के लोगों का मनोबल बढ़ेगा.
इसलिए आगामी चुनाव में कश्मीर घाटी में मुख्य मुकाबला पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस के बीच ही होने वाला रहा है.
कांग्रेस तीसरा खिलाड़ी है और पीडीपी से उसका चुनावी तालमेल हो सकता है.
हुर्रियत कांफ्रेंस से अलग हुआ उसका घटक पीपुल्स कांफ्रेंस भी मैदान में होगा जिसने विधानसभा चुनाव में एक सीट जीती थी.
जम्मू
घाटी के विपरीत जम्मू और लद्दाख क्षेत्र में आबादी बहुत ही मिश्रित किस्म की है.
![]() मुफ़्ती मोहम्मद की पार्टी राज्य में नेशनल कांफ्रेंस का विकल्प बनने की कोशिश कर रही है |
जम्मू का इलाका जम्मू, कठुआ और उधमपुर ज़िलों से मिलकर बना है और यहां हिन्दुओं का बहुमत है, पर घाटी में मुसलमानों के बहुमत जितना नहीं.
यहां 66 फीसदी हिंदू, 30 फीसदी मुसलमान और शेष आबादी सिखों की है.
हिन्दुओं में भी दलितों की आबादी 18 फीसदी है जिनमें बसपा का प्रभाव बढ़ता गया है और 2002 विधानसभा चुनावों में उसने यहां से एक सीट जीती भी थी.
इस क्षेत्र में भाजपा की मौजूदगी अच्छी रही है.
हिन्दू हितों की रक्षक होने का दावा करने वाली इस पार्टी को चुनावी सफलताएं भी मिलती रही हैं.
पिछले लोकसभा चुनाव में उसे इस क्षेत्र की दोनों संसदीय सीटें मिली थी, पर बाद में हुए उप चुनाव में उसे एक सीट गंवानी पड़ी.
यहां के मुसलमानों में नेशलन कांफ्रेंस का प्रभाव रहा है जबकि कांग्रेस सभी वर्गों में थोड़ा-बहुत प्रभाव रखती रही है.
2002 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इस इलाके में जबरदस्त सफलता मिली.
तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भाजपा का साथ, जो नेशनल कांफ्रेंस के साथ थी, न देकर एक नए हिन्दू मोर्चे को समर्थन दिया था.
जम्मू राज्य मोर्चा नामक यह संगठन अलग जम्मू प्रदेश बनाने की मांग कर रहा था.
मोर्चे को भी सिर्फ एक ही सीट मिली.
इस क्षेत्र में पैंथर्स पार्टी और बसपा भी ठीक-ठाक खिलाड़ी हैं.
लद्दाख एकदम अलग
लद्दाख का मामला एकदम अलग है.
यहा बौद्धों और मुसलमानों की जनसंख्या लगभग बराबर होगी, पर बौद्ध मुख्यतः लद्दाख ज़िले में हैं तो मुसलमान कारगिल ज़िले में.
![]() सवाल यह है कि इस बार क्या चुनावों में लोग निडर होकर भाग ले सकेंगे |
घाटी के मुसलमान सुन्नी हैं पर कारगिल के मुसलमान शिया हैं.
यहां मुख्य मुकाबला नेशनल कांफ्रेंस और लद्दाख की स्वायत्तता की मांग करने वाले संगठन के बीच मुख्य मुकाबला हो सकता है.
विधानसभा चुनाव में इस जमात ने निर्विरोध जीत हासिल की थी.
ये सारे हिसाब किताब और समीकरण यह एहसास दे सकते हैं कि जम्मू-कश्मीर की राजनीति भी बाकी मुल्क की तरह ही है.
पर असली सवाल यह है कि क्या यह सब जीवंत ढंग से हो जाएगा या ऐसा करने दिया जाएगा?
जम्मू-कश्मीर के चुनावी विश्लेषण का प्रमुख हिस्सा होता है मतदान में लोगों की हिस्सेदारी को देखना.
अगर बाहरी दखल न हुए तो हिस्सेदारी बहुत अच्छी हो सकती है क्योंकि लोगों की राजनीति में बहुत गहरी दिलचस्पी है.
पर यह सूरत आतंकवादियों और हुर्रियत जैसी जमातों को पसंद नहीं है.
अब देखना यह है कि क्या इस बार भी हुर्रियत चुनाव का बहिष्कार करता है या नहीं और पहले की तरह उसका प्रभाव पड़ेगा या नहीं.
हुर्रियत के अंसारी गुट की प्रतिक्रिया तो केन्द्र से वार्ता की प्रगति पर निर्भर करेगी.
चुनाव के अवसर पर आतंकवादी भी वारदातें बढ़ा दिया करते हैं - घाटी में भी और जम्मू क्षेत्र में भी.
पर जैसा 2002 विधानसभा चुनावों में दिखा उदासीनता और बुलेट का खौफ़ लोगों की लोकतांत्रिक इच्छा पर तब ज्यादा प्रभावी नहीं हो पाते जब लोकतांत्रिक व्यवस्था सचमुच खुली और निष्पक्ष हो.
चुनाव लोकतंत्र के लिए भी एक परीक्षा है - जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए तो खैर है ही.