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संसद हमले में रिहाई के ख़िलाफ़ याचिकाएँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संसद पर चरमपंथी हमले के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चार याचिकाएँ सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली हैं. दो याचिकाएँ दिल्ली पुलिस ने दायर की हैं. इनमें दिल्ली हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को चुनौती दी गई है जिसमें इस हमले के मामले के दो अभियुक्तों को रिहा करने का आदेश दिया गया था. जबकि दूसरी दो याचिकाएँ उन लोगों ने दायर की हैं जिनकी मौत की सज़ा को हाईकोर्ट ने बरकरार रखा था. भारतीय संसद पर हमला 13 दिसंबर 2001 को हुआ था जिसमें 14 लोगों की जान गई थी. इनमें पाँच हमलावर शामिल थे. सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों के एक खंडपीठ ने दिल्ली पुलिस की याचिकाओं को सुनवाई के लिए स्वीकार किया. इस पीठ में न्यायमूर्ति एसएन वरियावा और न्यायमूर्ति एच के सेमा हैं. दिल्ली पुलिस की याचिकाओं में नवजोत संधु या अफ़सान गुरु और दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेक्चरर एसएआर गिलानी को रिहा करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी गई है. जबकि दूसरी याचिका में शौकत हुसैन गुरु और मोहम्मद अफ़ज़ल ने अपनी मौत की सज़ा बरकरार रखने के हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी गई है. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार गिलानी की ओर से उनके वकील राम जेठमलानी ने कहा है कि जब अदालत ने कई सबूतों को अपर्याप्त माना है तब पुलिस उनके आधार पर किसी पर मुक़दमा कैसे चला सकती है. उल्लेखनीय है कि गत 29 अक्टूबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में फ़ैसला सुनाया था. हाईकोर्ट ने दो अभियुक्तों की मौत की सज़ा बरकरार रखी थी लेकिन दो लोगों को रिहा करने के आदेश दिए थे. |
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