| चिड़ीमार से पक्षी विशेषज्ञ का सफ़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वे एक बहेलिए के परिवार में पैदा हुए और इस नाते चिड़ियों को पकड़ना या उन्हें मारना उनका पारिवारिक व्यवसाय होना चाहिए था लेकिन हैं वे पक्षियों के दोस्त. और दोस्त से अधिक पक्षियों के विशेषज्ञ हालांकि उन्हें इसके लिए कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली है. बिहार में बेगूसराय ज़िले के अली हुसैन की एक पक्षी विज्ञानी के रूप में अंतरराष्ट्रीय ख्याति है. कोई 500 पक्षियों और सौ से ज़्यादा पेड़-पौधों के कठिन वैज्ञानिक नाम फर्राटेदार बोलने वाले साठ साल के अली ने पक्षी विशेषज्ञ के रूप में अमरीका, ब्रिटेन और जापान सहित कई देशों की यात्रा की है. चिड़ियों को पकड़ने की हुसैन द्वारा विकसित 'गोंग एंड फ़ायर' और 'डक्कन' विधियाँ दुनिया भर में लोकप्रिय हैं. अली हुसैन मुसलमानों की अति-पिछड़ी मीर शिकार जाति में मंझौल में पैदा हुए. उल्लेखनीय है कि उनके गांव के पास ही मशहूर वेटलैंड कावर झील है, जहाँ सर्दियों में यूरोप से विभिन्न प्रजाति के पक्षी प्रवास के लिए पहुँचते हैं. गंवई रंग-ढंग में ही रहने वाले अली हुसैन ने पक्षियों को पकड़ने की ट्रेनिंग अपने पिता मीर जान शिकारी से ली. वह कहते हैं कि चिड़ियों को पकड़ कर बेचने से ही उनकी रोज़ी-रोटी चलती थी. पक्षी विशेषज्ञ अली हुसैन को चिड़ीमार से चिड़ियों के संरक्षक में बदलने का काम किया मशहूर पक्षी विज्ञानी डॉ. सलीम अली ने.
सलीम अली जब 1960 के दशक में अध्ययन के सिलसिले में कावर झील के दौरे पर थे तो उन्हें अली हुसैन की विलक्षण प्रतिभा से रूबरू होने का मौक़ा मिला. वह अली हुसैन को अपने साथ बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी ले आए. बाद में उनके ही प्रयासों से उन्हें भरतपुर स्थित केवलादेव राष्ट्रीय अभ्यारण्य में सीज़नल बर्ड ट्रैपर की अस्थाई नौकरी मिल गई. उसके बाद से अली हुसैन हमेशा सलीम अली के साथ रहे. अली हुसैन चिड़ियों को पकड़ते और सलीम अली अपने अनुसंधानों के लिए उनमें छल्ले लगाते और अन्य प्रयोग करते. अली हुसैन चिड़ियों को पकड़ने में अन्य चिड़ीमारों से इस रूप में अलग हैं कि वे प्रताड़ित किए बिना सौ से ज़्यादा तरीकों से चिड़ियों को पकड़ सकते हैं. डॉ. सलीम अली ने एक जगह लिखा है कि अली हुसैन का पक्षियों के मनोविज्ञान पर एकाधिकार है. सलीम अली के साथ रहने के दौरान अली हुसैन ने रूस के यूरी मरकीनो और सासी सेरकिन, अमरीका के जॉर्ज आर चिवाल्ड और कैटी रिचर समेत अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई प्रमुख पक्षी विज्ञानियों को अपना प्रशंसक बनाया. अली हुसैन ने विलुप्तप्राय साइबेरियाई सारसों के संरक्षण के अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में भी अपना योगदान दिया है. पक्षियों का दोस्त अपनी जन्मभूमि के पास 14 वर्गकिलोमीटर दायरे में फैले कावर झील पक्षी आश्रयणी के बारे में हुसैन कहते हैं कि वहाँ आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या निश्चय ही कम हुई है.
उन्होंने कहा,"इस साल कावर झील में मेहमान पक्षियों की संख्या में कमी आई है. लेकिन अब भी जहाँ पानी दिखता है वहाँ पेंटिल, सर्वलर, गेरवल, विजैल, रेड क्रस्टर पोचर, कॉमन पोचर और व्हाइट आई पोचर जैसे बड़े पक्षी और रेफ़र रीफ़, वेंड स्मैसे, स्पोकेट सनपाइपर, ग्रीन सैक और पेंटिल स्नेप जैसे छोटे पक्षी बड़ी संख्या में जमा मिल जाएँगे." हुसैन प्रवासी पक्षियों की संख्या में कमी का कारण कावर झील में नरकट और जलकुम्भी जैसे खरपतवारों का होना, अवैध शिकार और पेड़-पौधों की अवैध कटाई को मानते हैं. बेगूसराय के ज़िला वन पदाधिकारी कुन्दन कुमार हुसैन की शिकायत से काफ़ी हद तक सहमत हैं, हालाँकि वे कहते हैं कि इस इलाक़े में पक्षियों की औपचारिक गणना नहीं होती इसलिए संख्या में कमी के बारे में ज़्यादा कुछ कहा नहीं जा सकता. उन्होंने कहा कि पक्षियों के अवैध शिकार के मामले सामने आते रहते हैं, और इस संबंध कार्रवाई भी की जाती है. |
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