|
क्या है स्थायी निवासी का दर्जा? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जम्मू कश्मीर में स्थायी निवासी (अयोग्यता) विधेयक को राजनीतिक समीकरणों ने विवाद का मुद्दा बना दिया है. दरअसल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा हासिल है और यह विरासत की परंपरा या क़ानून इसी का एक हिस्सा है. स्थायी निवासी का दर्जा देने का मुद्दा 1927 से शुरू हुआ था जब तत्कालीन महाराजा ने राज्य में रहने वाले लोगों का दर्जा परिभाषित किया था. महाराजा को डर था कि अगर खुली छूट दे दी जाए तो बाहर से लोग आकर राज्य में बसने लगेंगे जिससे उनकी रियासत को ख़तरा पैदा हो सकता है, ख़ासतौर से अंग्रेज़ इसका फ़ायदा अपने हित में उठा सकते हैं. महाराजा के फ़रमान में कहा गया था कि कोई शादीशुदा महिला या विधवा को तब तक राज्य की स्थायी निवासी का दर्जा हासिल रहेगा जब तक कि वह स्थायी तौर पर राज्य के बाहर नहीं बस जाती है. इसका मतलब यह था कि अगर राज्य की स्थायी निवासी के दर्जे वाली कोई महिला राज्य के बाहर शादी करती है और वहीं बस जाती है तो उसे विरासत से वंचित होने पड़ेगा. 1947 में देश विभाजन के बाद जम्मू कश्मीर में कुछ ऐसे हालात बने कि वहाँ भारतीय संविधान के 370 अनुच्छेद के तहत विशेष दर्जा रखा गया जोकि अभी तक जारी है. बाद में राज्य सरकार ने यह व्यस्था की अगर कोई पुरुष स्थायी निवासी किसी बाहरी महिला से शादी करता है तो उसे राज्य की स्थायी निवासी का दर्जा हासिल हो जाएगा लेकिन महिलाओं के बारे में यह पहले जैसा ही रहा. 1975 में कुछ ऐसी महिलाओं ने इस मुद्दे को अदालत में उठाया जिन्होंने शादी तो बाहर के व्यक्ति से की थी लेकिन वे राज्य में शिक्षा और नौकरी की सुविधाओं का फ़ायदा उठाना चाहती थीं. यह मुक़दमा क़रीब 25 साल चला और राज्य उच्च न्यायालय ने फ़ैसला दिया कि राज्य की स्थायी निवासी अगर कोई महिला किसी ऐसे व्यक्ति से शादी करती है जिसे स्थायी निवासी का दर्जा हासिल नहीं है तो स्थायी निवासी का उसका दर्जा ख़त्म हो जाएगा. दर्जे का विवाद यह दर्जा ख़त्म होने का मतलब था कि उसे राज्य में नई संपत्ति ख़रीदने और नई नौकरी करने का अधिकार नहीं मिलेगा. राज्य में लड़कियों को सरकार की तरफ़ से स्थायी निवासी एक ऐसा प्रमाण पत्र जारी किया जाता जिसे उनकी शादी तक वैध माना जाता है.
लेकिन न्यायालय ने यह भी कहा था कि संविधान में चूँकि विस्तार से प्रावधान नहीं किए गए हैं इसलिए राज्य सरकार को इस बारे में क़ानून बनाने का हक़ है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर का एक अलग संविधान है जिसके तहत बहुत से विषयों पर राज्य सरकार को क़ानून बनाने का अधिकार हासिल है. राज्य के संविधान के अनुच्छेद आठ में कहा गया है कि राज्य सरकार स्थायी निवासी की परिभाषा और उसके अधिकारों के बारे में क़ानून बना सकती है. राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय में विशेष याचिका दायर की जिसे बाद में वापस ले लिया गया. इस पर राज्य में हंगामा हुआ और नेशनल कान्फ्रेंस सहित अनेक दलों ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह राज्य का विशेष दर्जा बरक़रार करने के बारे में गंभीर नहीं है. यह मसला विधान सभा में भी उठा जिसके बाद सरकार ने इस पर एक नया क़ानून बनाने का भरोसा दिलाया. इसमें नेशनल कान्फ्रेंस और मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी ने सरकार का साथ दिया और विधेयक का मसौदा तैयार करने में भी अहम भूमिका निभाई. इसीलिए यह विधेयक विधान सभा में मिनटों में पारित हो गया क्योंकि काँग्रेस भी इस विधेयक का विरोध करने की राजनीति स्थिति में नहीं थी और उसकी बड़ी वजह ये थी कि इस क़ानून में नया कुछ भी नहीं है. बल्कि कुछ अलग व्यवस्था यह की गई है कि अगर कोई स्थायी निवासी महिला बाहर शादी करती है तो उसे सिर्फ़ नई संपत्ति ख़रीदने और नई नौकरी पाने पर रोक होगी. अपने संबंधित संपत्ति क़ानूनों यानी मुस्लिम पर्सनल क़ानून या हिंदू विवाह अधिनियम के मुताबिक़ उसे विरासत की संपत्ति पाने का अधिकार होगा. साथ ही अगर कोई महिला नौकरी करती है तो उससे वह छीनी नहीं जाएगी बल्कि नई नौकरी पाने पर रोक होगी. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||