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जम्मू कश्मीर में विवादित विधेयक टला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जम्मू कश्मीर सरकार ने महिलाओं की नागरिकता के बारे में एक विवादास्पद विधेयक को टाल दिया है. इस विधेयक के तहत अन्य किसी दूसरे राज्य के निवासी से शादी करने पर यहाँ की महिलाओं की राज्य की मूल नागरिकता समाप्त हो जाने का प्रावधान है. नागरिकता नहीं रहने के बाद न तो वह लड़की जम्मू कश्मीर में कोई संपत्ति रखने की पात्र होगी न ही सरकारी नौकरी पाने की. वोट देने का उनका अधिकार भी उनसे छिन जाएगा. हालांकि पैतृक संपत्ति में उनकी हिस्सेदारी बची रहेगी. विधेयक का जमकर विरोध हुआ और तमाम राजनीतिक दलों के अलावा सत्ताधारी गठबंधन की पार्टियों ने भी इसपर आपत्ति जताई. इस विधेयक को दो दिन पहले ही विधानसभा में मंज़ूरी दी गई थी. मगर इसके बाद सत्ताधारी गठबंधन के कई सहयोगियों ने पाला बदलते हुए इस विधेयक को वापस लिए जाने की माँग रख दी. राज्य सरकार का कहना है कि अब वो विधान परिषद में एक विशेष प्रस्ताव लाएगी ताकि इस विधेयक को विस्तृत समीक्षा के लिए एक चयन समिति के सामने रखा जा सके. विरोध राज्य के विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने ये कहते हुए इस प्रस्तावित विधेयक के ख़िलाफ़ देशव्यापी अभियान चलाने की धमकी दी है कि ये पक्षपाती है और इससे महिलाओं के अधिकारों का हनन होता है. पार्टी का कहना है कि वह अगले महीने चुनाव में इस विवाद को अपना प्रमुख मुद्दा बनाएगी. राज्य के उपमुख्यमंत्री मंगत राम शर्मा ने कहा है कि इस विधेयक पर गहराई से विचार किया जाना ज़रूरी है. शर्मा राज्य में मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईदी की सरकार के प्रमुख घटक कॉंग्रेस के नेता हैं. एक और सत्ताधारी घटक जम्मू कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी ने इससे पहले विधेयक का विरोध करते हुए पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से हाथ खींच लेने की धमकी दी. एक और घटक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा है कि इस विषय पर विधेयक को पारित किए जाने से पहले विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जाना चाहिए. कम्युनिस्ट पार्टी ने पहले इस विधेयक का समर्थन किया था. इतिहास और क़ानून ऐसा एक क़ानून पहली बार 1927 में बनाया गया था जब राज्य पर डोगरा शासकों का राज था. डोगरा राजा को लगता था कि ब्रितानी शासक बाहरी लोगों को कश्मीर में संपत्ति ख़रीदने को बढ़ावा दे सकते हैं जिससे उनकी सत्ता कमज़ोर पड़ सकती है. इसके बाद उन्होंने जो क़ानून बनाया उसके तहत लड़कियों को राज्य में तभी तक मूलनागरिक होने का अधिकार दिया गया था जब तक उनका विवाह न हो जाए. उस समय भी जम्मू के इलाक़े में रहने वाले हिंदुओं ने इस क़ानून का विरोध किया था जो अपनी बेटियों की शादी देश भर में किया करते थे. इस समय इस नए क़ानून की ज़रुरत 2002 में हाईकोर्ट के एक निर्णय के बाद पड़ी है. इस निर्णय में हाईकोर्ट ने कहा था कि विवाह के बाद भी राज्य की लड़कियों को नागरिकों के अधिकार हासिल रहेंगे. इस निर्णय का राजनीतिक दलों ने विरोध किया था क्योंकि वे मानते हैं कि इससे जम्मू कश्मीर का विशेष राज्य वाला दर्जा ख़त्म होने की स्थिति बन जाएगी. बाद में राज्य सरकार ने इस निर्णय को सर्वोच्त न्यायालय में चुनौती दी थी लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया गया क्योंकि क़ानूनविदों का मानना था कि यदि फ़ैसला ख़िलाफ़ आया तो विधानसभा में विधेयक पारित करवाने के रास्ते बंद हो जाएँगे. |
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