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आईआईएम की फ़ीस कम ही रहेगी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सर्वोच्च न्यायालय ने उस याचिका को रद्द कर दिया है जिसमें देश के छह प्रबंधन संस्थानों (आईआईएम) की फ़ीस घटाने के निर्णय को चुनौती दी गई थी. आईआईएम की फ़ीस घटाने का निर्णय केंद्र सरकार ने लिया था. मुख्य न्यायाधीश वीएन खरे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने अपने निर्णय में कहा है कि सरकार ने आश्वासन दिया है कि वह फ़ीस कम होने से होने वाले नुक़सान की भरपाई करेगी. समाचार एजेंसियों के अनुसार सरकार ने यह भी कहा है कि फ़ीस घटाने के निर्णय से इन संस्थानों की स्वायत्तता पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. केंद्र सरकार की ओर से दिए गए इन आश्वासनों के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका को ख़ारिज कर दिया. देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों की फ़ीस इससे पहले डेढ़ लाख रुपए थी जिसे केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने घटाकर तीस हज़ार रुपए करने का निर्णय लिया था. इसके बाद इन प्रतिष्ठानों ने इसका विरोध करते हुए बहुत शोर मचाया था और कहा था कि इससे संसाधनों की कमी हो जाएगी और इन संस्थानों की दुनिया भर में जो प्रतिष्ठा है उस पर विपरीत असर पड़ेगा. आईआईएम के दो पुराने छात्रों ने सरकार के निर्णय के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी. उनका आरोप था कि सरकार इन प्रतिष्ठानों पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रही है. वैसे सरकार के इस फ़ैसले का देश के बड़े औद्योगिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों ने भी विरोध किया था. |
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