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'फ़ील गुड' नारे में आख़िर कितना दम है? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चुनावी नारों के नतीजे ख़तरनाक़ भी हो सकते हैं. इंदिरा गाँधी ने 1971 में ग़रीबी हटाओं का नारा दिया था लेकिन चुनाव जीतने के फ़ौरन बाद विपक्ष ने उन्हें यह कहकर ख़ामोश कर दिया था कि ग़रीबी तो लगातार बढ़ रही है. जनता दल ने 1989 में इस नारे पर चुनाव जीता था - "राजीव गाँधी चोर है" लेकिन इस नारे की हवा उस समय निकल गई जब जनता दल यह साबित नहीं कर पाया कि बोफ़ोर्स सौदे में राजीव गाँधी ने कोई धन लिया था. इस बार भारतीय जनता पार्टी ने 'शाइनिंग इंडिया' और 'फ़ील गुड' के नारे दिए हैं लेकिन ये नारे भी चुनाव से पहले ही टाँय-टाँय फिस्स होने की राह पर जा सकते हैं. 'फ़ील गुड' यानि चौतरफ़ा ख़ुशहाली एक छलावा भी साबित हो सकता है. भारत की छवि बात ये है कि हालात ही कुछ ऐसे बने हैं जिनसे विदेशों में भारत की छवि अच्छी बनी है. अब विदेशों में भारत की सिर्फ़ सूचना प्रोद्योगिकी ही कामयाबी हासिल नहीं कर रही है बल्कि जैव प्रोद्योगिकी में भी भारत नई ताक़त बनकर उभर रहा है. इतना ही नहीं, ऑटोमोबाइल्स और औषधि उद्योग जैसे पुराने क्षेत्रों में भी भारत विश्व बाज़ार में नया प्रतियोगी बनकर उभरा है.
भारत में बन रहे विदेशी टेलीफ़ोन केंद्रों ने अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों में घंटी बजानी शुरू कर दी है. शेयर बाज़ार विदेशों से आने वाले धन से सराबोर हो रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय बैंकर्स अब यह भी बात करने लगे हैं कि भारत 21वीं सदी में बड़ी संभावनाओं वाला देश है. अर्थशास्त्री भी 'शाइनिंग इंडिया' की छवि देख रहे हैं लेकिन बात ये है कि अर्थशास्त्री, निवेशक, उद्योगपति चाहे वे विदेशी हों या भारतीय, चुनाव तो नहीं लड़ते. मतदाता यहाँ सामने आता है मतदाता, तो क्या मतदाता भी 'गुड फ़ील' कर रहा है यानि ख़ुश है? क्या मतदाता का भारत भी 'शाइन' कर रहा है, यानी क्या उसे भी कोई चमक महसूस हो रही है. इसका जवाब इतना आसान नहीं है. 'फ़ील गुड' मध्यम वर्ग के उन लोगों के लिए हो सकता है जिन्हें सूचना प्रोद्योगिकी, विदेशी टेलीफ़ोन केंद्रों और अन्य बहुराष्ट्रीय दफ़्तरों में काम मिल रहा है. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अधिकारी यह तो कह रहे हैं कि हर साल क़रीब अस्सी लाख नई नौकरियाँ दी जा रही हैं लेकिन उद्योग संघ फिक्की ऐसा नहीं मानता कि नई नौकरियाँ आने को कोई ख़ास संभावना है. सरकारी कर्मचारी इसलिए अच्छा महसूस कर रहे हैं क्योंकि उनके वेतनों में कुछ बढ़ोत्तरी हुई है और सेवानिवृत हो चुके लोगों की पेंशन में भी इज़ाफ़ा हुआ है.
पिछले साल का अच्छा मौसम और तेज़ विकास दर का मतलब यह निकाला जा सकता है कि ज़्यादा धन बाज़ार में है और छोटे दुकानदारों के लिए अच्छे दिन हो सकते हैं. अच्छी बारिशों का मतलब ये हो सकता है कि गाँव में रहने वाले भारतीय जो देश के अधिकतर मतदाता हैं, अच्छा महसूस कर रहे हैं. लेकिन भारत के किसान की याददाश्त बहुत अच्छी है और उनका मानना है कि पिछले पचास साल में कम से कम दस बार अच्छे मानसून रहे हैं लेकिन उसके आर्थिक नतीजे ज़्यादा देर तक नहीं टिके रह सके. ख़ासतौर पर किसानों का सोचना है कि उन्हें कोई दूर्गामी फ़ायदा नहीं हुआ है. किसान मानते हैं कि साल दर साल उनका उत्पादन तो बढ़ा है लेकिन आज भी उन्हें उनकी फ़सलों के अच्छे दाम नहीं मिलते. भारत के दो बड़े समृद्ध प्रदेशों - आँध्र प्रदेश और कर्नाटक में पिछले पाँच सालों में बहुत से किसानों ने आत्महत्याएँ की हैं क्योंकि वे अपने क़र्ज़ नहीं चुका सके. अब सरकार ने किसानों की बंधी आमदनी के लिए बीमा योजनाएं भी शुरू करने की घोषणा की है लेकिन भारत के बहुत से अख़बार इन्हें सिर्फ़ चुनावी वादे मानते हैं. और बहुत से किसानों का भी कहना है कि वे तभी भरोसा करेंगे जब ये फ़ायदे उनके हाथ में आने लगेंगे क्योंकि चुनाव के समय किए गए ज़्यादातर वादे भुला दिए जाते हैं. किसान इस बात पर भी चौंकते हैं कि प्रधानमंत्री अपनी दूसरी हरित क्रांति के लिए धन कहाँ से जुटाएँगे? भूमिहीन मज़दूरों को इन वादों में कुछ भी नज़र नहीं आता है. इसलिए लब्बोलुबाब यही है कि भारत की शहरी जनता तो 'गुड फ़ील' कर सकती है लेकिन गाँव में रहने वाले लोग भारतीय जनता पार्टी के प्रचार-कर्ताओं से यह सवाल भी पूछ सकते हैं, "आख़िर किस आधार पर वे 'गुड फ़ील' करें है?" शहरों में बड़ी आबादी को झुग्गी झोंपड़ियों में रहना पड़ रहा है क्योंकि उनके पास कोई काम नहीं है, टिकाऊ रोज़गार नहीं है. साथ ही दूरदराज़ के भारत में रहने वालों को यह यक़ीन दिलाने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी कि अगर अभी तक चीज़ें अच्छी नहीं हैं तो अगले चुनाव के बाद कैसे अच्छी हो जाएँगी. विपक्षी नेता सोनिया गाँधी ने सरकार के 'फ़ील गुड' के दावों पर पहले ही हमले करने शुरू कर दिए हैं. हाल ही में उत्तर प्रदेश के दौरे पर गई सोनिया गाँधी को लाखों लोगों ने सुना और उन्होंने आरोप लगाए कि सरकार ने महिलाओं, युवाओं और किसानों के लिए कुछ भी नहीं किया है. अगर सोनिया गाँधी अपनी सोई हुई पार्टी को जगा पाती हैं तो 'फ़ील गुड' नारे की हवा निकाली जा सकती है और भारतीय जनता पार्टी के भारत उदय की चमक को भी फीका कर सकती हैं. |
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