BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शुक्रवार, 13 फ़रवरी, 2004 को 10:27 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
गाँधी-नेहरू वंश का एक और बँटवारा

प्रियंका गाँधी अपनी माँ के साथ
प्रियंका गाँधी को मैदान में उतारने की माँग तेज़ हो सकती है
काँग्रेस के नेता और कार्यकर्ता जहाँ दस जनपथ के आगे गुहार लगा रहे हैं कि प्रियंका और राहुल गाँधी पार्टी की नैया पार लगाने के लिए राजनीति के भवसागर में कूद पड़ें वहीं भाजपा ने एक दिलचस्प घोषणा की है.

वरूण गाँधी सोमवार 16 फ़रवरी से भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो रहे हैं, रिश्ते में वरूण के चाचा अरूण नेहरू के संक्षिप्त भाजपा-प्रेम छोड़ दें तो वे गाँधी ख़ानदान के पहले व्यक्ति हैं जो भाजपा में शामिल हो रहे हैं.

वैसे राजनीतिक दृष्टि से यह कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि मेनका गाँधी पहले ही एनडीए का हिस्सा हैं और भाजपा के सहयोग से लोकसभा चुनाव जीतती रही हैं, और वाजपेयी के मंत्रिपरिषद की सदस्य रह चुकी हैं.

प्रियंका और राहुल की माँ सोनिया गाँधी यही कह रही हैं कि उनके बच्चों की मर्ज़ी पर निर्भर है कि वे राजनीति में आएँ या नहीं.

भाजपा लोहे को लोहे से काटने की रणनीति पर चल रही है, अगर प्रियंका या राहुल खुलकर मैदान में उतरते हैं तो भाजपा परिवार के देसी वारिस के तौर पर वरुण को आसानी से आगे कर सकती है.

भाजपा के कई नेताओं ने कभी खुलकर और कभी दबी ज़ुबान में राहुल और प्रियंका की राजनीतिक पात्रता पर सवाल उठाया है कि वे 'सौ प्रतिशत भारतीय नहीं' हैं, वरूण गाँधी के बारे में ऐसे सवाल नहीं उठ सकते.

वरूण गाँधी का भारतीय जनता पार्टी में आना काँग्रेस के लिए कोई बड़ा आघात तो नहीं है क्योंकि वंशबेल का एक सिरा इंदिरा गाँधी के ही ज़माने में अलग हो गया था जब मेनका गाँधी ने परिवार से अलग हो गई थीं या अलग कर दी गईं थीं.

लेकिन इतना ज़रूर है कि 'युवा काँग्रेसी, पक्के काँग्रेसी और असली काँग्रेसी' की जो छवि संजय गाँधी की रही है उसकी परछाईं वरूण गाँधी में उतनी ही है जितनी लोग प्रियंका में इंदिरा गाँधी ढूँढने की कोशिश कर सकते हैं.

राजनीतिक अनुभव

वैसे, वरूण गाँधी को राजनीति के मैदान में उतारने को लेकर मेनका गाँधी को शायद ही कभी संशय रहा हो.

सोनिया गाँधी
काँग्रेस को लग रहा है कि अकेली सोनिया गाँधी काफ़ी नहीं

मेनका गाँधी के सभी चुनाव अभियानों में वरूण गाँधी सक्रिय रहे हैं और प्रचार में जमकर हिस्सा लेते रहे हैं, इतना तो कहा जा सकता है कि वे अपने चचेरे भाई-बहनों की तुलना में राजनीति का अधिक अनुभव रखते हैं.

लेकिन वरूण गाँधी को ख़ानदान के वारिस के तौर पर शायद वह मान्यता हासिल नहीं है जो प्रियंका और राहुल को है. वजह यही है कि वे पूरे दशक तक ख़ानदान से दूर रहकर जवान हुए हैं, दादी का घर छोड़ते वक्त वे बहुत छोटे थे.

मगर मेनका गाँधी और उनके बेटे वरूण ने जब-जब मौक़ा मिला लोगों को यह याद दिलाने की कोशिश की कि वो भी गाँधी हैं और उनके साथ अन्याय हुआ है.

शायद इसका कुछ राजनीतिक लाभ वरूण गाँधी को मिल भी जाए.

भाजपा के लिए तो उनका महत्व इतना ही दिखता है कि वे राहुल-प्रियंका कार्ड की काट कर सकते हैं.

चुनाव वे नहीं लड़ सकते क्योंकि उनकी उम्र संसदीय चुनाव के लिए अभी भी कम है.

काँग्रेस पर इसका एक असर यह हो सकता है कि अब प्रियंका और राहुल को मैदान में उतारने की माँग कुछ और तेज़ हो जाए.

वैसे गाँधी-नेहरू वंश का राजनीतिक बँटवारा चुनावी मैदान में नए रंग ला सकता है, मिसाल के तौर पर यह दूर की कल्पना नहीं है कि प्रियंका गाँधी और वरूण गाँधी जनता के बीच आमने-सामने हों.

बहरहाल, किसी काँग्रेसी के लिए यह कह पाना मुश्किल होगा कि उसके दिल में इस घटनाक्रम को लेकर कोई कसक नहीं है.

इंटरनेट लिंक्स
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>