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"राजनीति अब फ़ायदे का धंधा बन गई है" | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"राजनीति अब पूरे तौर पर एक धंधा हो गई है. लोग अब राजनीति में योगदान के लिए या देश की सेवा के लिए नहीं आते. एक ज़माना था जब ऐसा ही हुआ करता था. फिर ज़माना आया कि सेवा के साथ फ़ायदे की भी इच्छा बढ़ने लगी और अब तो केवल फ़ायदे और नाजायज़ फ़ायदे के बारे में सोचा जाता है." ये कहना है भारत के पूर्व केबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यन का, जिनकी 4 दशक के सरकारी सफ़र का लेखा जोखा है उनकी किताब -- जरनीज़ थ्रू बाबूडम एंड नेतालैंड. यह किताब हाल ही में प्रकाशित हुई है. इस किताब में राजनीति के गलियारों की इतनी सारी हलचले हैं कि शायद ये आम जनता की आँखे खोल दे और देश चलाने की प्रक्रिया की असलियत सामने ला पाए. पूर्व राष्ट्रपति केआर नारायणन ने 1997 में ज़िद पकड़ ली की उन्हें एयर इंडिया के दो विमान चाहिए. जब केंद्रीय नागरिक विमानन सचिव ने कहा कि ऐसा करना केंद्र के आदेश का उल्लंघन होगा तो नारायणन ने तत्कालीन प्रधान मंत्री इंद्र कुमार गुजराल से कहकर अपनी ज़िद पूरी की. पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौडा और गुजराल सरकार में केबिनेट सचिव रह चुके सुब्रमण्यन ने वाजपेई सरकार के साथ भी कुछ दिन काम किया. वह लिखते हैं कि देवेगौड़ा ने साफ़ शब्दों में कहा था, "मेरे बेटे और रिश्तेदार आर्थिक लाभ पाने के लिए मेरे मौजूदा पद का दुरुपयोग करने की कोशिश करेंगे. मैं चाहता हूँ कि आप निष्पक्ष हो कर काम करें." किताब कहती है कि रामविलास पासवान केवल रेल चलाकर जनप्रिय बनने की कोशिश करते रहे. वाजपेई सरकार द्वारा ब्रजेश मिश्र को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाए जाने पर सुब्रमण्यन कहते हैं कि ऐसा कोई भी व्यक्ति जो प्रधानमंत्री के इतने नज़दीक हो उसे इतने महत्वपूर्ण पद पर नहीं रखा जाना चाहिए. "भारत के पास परमाणु क्षमता है और इसके इस्तेमाल की ज़रुरत भी पड़ सकती है. ऐसे में इस पद पर ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो तकनीकी जानकारी रखता हो और जिसका राजनीतिक हित प्रधान मंत्री के साथ न हो और मतभेद होने की स्थिति में देश हित में सही राय दे सके. उनका कहना है कि ये किताब उन्होंने किसी का पर्दाफाश करने या सनसनी फैलाने के इरादे से नहीं लिखी है. "सरकार किसी की चाय की दुकान नही है, ये तो देश की जनता की है. इसलिए उसे खुला होना चाहिए. मैंने जो 40 सालों में देखा है, वही लिखा है." "शायद ही कोई मंत्री होगा जिसने देश के विकास या आर्थिक या सामाजिक बदलाव में रुचि दिखाई हो. वे अपनी तरक्की के अलावा सार्वजनिक जीवन में अपने भविष्य को संवारने में ही रुचि रखते है.'' उनका कहना है कि अब ऐसे नेताओं की ज़रुरत है जो राजनीति एक तरफ रखें, न्यायपालिका को क़ाबू में रखें, नौकरशाही को क़ाबू में रखें और अगर ऐसा होता है तो दस सालों में देश में काया पलट हो सकता है. |
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