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गुरुवार, 29 जनवरी, 2004 को 16:57 GMT तक के समाचार
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बौद्ध भिक्षुणियों का संघर्ष
बौद्ध भिक्षुणी कुसुम
कुसुम नई परंपरा क़ायम कर रही हैं

भिक्षुणी कुसुम का मुंडा हुआ सर और उनके बौद्ध सन्यासियों की पोशाक कुछ आश्चर्यजनक हैं क्योंकि वह एक महिला हैं.

कुछ पुरुष बौद्ध भिक्षुओं का मानना है कि वह भटकी हुई हैं पर अपने शिष्यों के लिए वह एक ऐसी अध्यापिका हैं जिन्होंने पौराणिक वेद पढ़ कर फिर से उस प्रथा का प्रचलन किया है जिसके अनुसार महिलाएँ बौद्ध सन्यासिनें बन सकती हैं.

इन सन्यासिनों को भिक्षुणी के नाम से जाना जाता है.

‘भिक्षुणी’ के संदर्भ में वह कहती हैं, "यह शब्द एक अवरोध था. न कोई इस शब्द को अपनाना नहीं चाहता था, न कोई इसे मानता था." इस शब्द का श्री लंका में उपयोग करने वाली वह पहली महिला थीं.

माइक्रोबॉयोलोजी में डॉक्टरी की डिग्री हासिल करने के बाद वह अपने वजूद को एक नई नज़र से देखने लगीं, धार्मिक नज़र से.

परंपराएं तोड़ीं

कई सालों तक भिक्षुणी कुसुम जर्मनी के पुस्तकालयों में पौराणिक ग्रंथों का चयन करती रहीं. वह जानना चाहती थीं कि भगवान बुद्ध के समय में बौद्ध सन्यासिनों का जीवन कैसा होता था.

फिर वह एक वर्गीकरण के अवसर पर भारत गईं.

बौद्ध सन्यासिनें

भिक्षुणी कुसुम का कहना था, "आप यह भी कह सकते हैं कि श्रीलंका में यह करना सुरक्षित नहीं था. वहाँ लोगों का सोचना था कि यह कुछ नया और नियम से बाहर है."

अधिकतर श्रीलंकाई सन्यासी अभी भी सन्यासिनों के इस वर्ग को नहीं मानते.

वे कहते हैं कि भिक्षुणी कुसुम ने श्रीलंका के थेरावड़ा वर्ग से बाहर जा कर सुदूर पूर्ववर्ती देशों में प्रचलित महायान वर्ग में दीक्षा पाने के लिए पहुँचीं.

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यह ऐसा ही है जैसे कोई कैथोलिक ईसाई प्रोटेस्टेंट वर्ग में अपनी दीक्षा कराए और फिर एक कैथोलिक पादरी की तरह अपना जीवन व्यतीत करे.

वहीं भिक्षुणी कुसुम का कहना है यह प्रथा तो हज़ारों वर्षों से चली आ रही है जब सन्यास लेने के लिए बौद्ध महिलाएँ सिल्क मार्ग पर श्रीलंका से चीन जाती थीं. वह तो केवल इस प्रथा को फिर से जीवित कर रही हैं.

वह कहती हैं, "भगवान बुद्ध के समय से इस वंश की टूटी कड़ियाँ ही चली आ रही हैं."

श्रीलंका में बौद्ध सन्यासी काफ़ी प्रभावशाली होते हैं लेकिन वहाँ की 400 सन्यासिनें आम विरोधियों से बढ़ कर कुछ नहीं हैं.

सन्यासिनों को इस बात के दुःख है कि एक नए और कम उम्र के सन्यासी को भी मंदिरों में उनसे ज़्यादा आदर मिलता है हालाँकि उन्होंने सालों के परिश्रम के बाद यह पद हासिल किया है.

उदाहरण के तौर पर सन्यासिनों को अक्सर ज़मीन पर बिठाया जाता है, जबकि सन्यासियों को ऊँचे स्थान पर.

एक सन्यासी डॉक्टर बेलनविला विमलरत्ने थेरो का कहना है, "ऐसा नहीं है कि सन्यासिनें महिला होने के नाते सन्यासियों के साथ नहीं बैठ सकतीं, बल्कि इसलिए क्योंकि ये पूरी तरह से नियुक्त नहीं हैं."

वे भी भिक्षुणी कुसुम की नियुक्ति को प्रबल नहीं मानते क्योंकि उनका कहना है कि सन्यासिन बनने के लिए एक महिला को दस वरिष्ठ सन्यासिनों द्वारा ही नियुक्त किया जा सकता है.

और क्योंकि बौद्ध धर्म के थेरावड़ा वर्ग में कोई वरिष्ठ सन्यासिनें नहीं हैं, यह परंपरा फिर से जीवित नहीं की जा सकती.

डॉक्टर थेरो का कहना है बौद्ध धर्म में महिलाओं का आदर किया जाता है और फ़ेमिनिज़्म जैसे विदेशी विचारों से इन सन्यासिनों की सोच पर बुरा प्रभाव पढ़ रहा है.

मुश्किलें

श्रीलंका में लगभग 400 नियुक्त सन्यासिनें हैं.

उन्हें अपने समुदाय से कुछ आर्थिक सहायता मिल जाती है लेकिन उसके बावजूद उन्हे रोज़मर्रा की जीवनचर्या में भी विभिन्न समस्याओं का सामना करना पढ़ता है.

बौद्ध सन्यासियों को भिक्षुणी वर्ग की ज़्यादा चिन्ता नहीं है क्योंकि उन्हें तो सरकार और जनता दोनों की ओर से मदद मिलती है और और उनका वर्ग एक प्रभावशाली धार्मिक समुदाय का हिस्सा है.

सन्यासिनों को शिकायत है कि वे आर्थिक सहायता से वंचित रह जाती हैं क्योंकि वहाँ भी पुरुषों का नियंत्रण है.

एक ही समय पर अपने अधिकारों के लिए लड़ना और दुनियादारी का सामना करना कठिन है.

ऐसे हालात में श्रीलंका की सन्यासिनों का यह कहना ठीक लगता है कि उन्हे पुरुषों से दस गुना बेहतर होने की आवश्यकता है.

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