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वाजपेयी का चुनावी दाँव
लोकसभा को भंग किए जाने के केंद्रीय मंत्रिमंडल के प्रस्ताव के साथ ही भारत एक और आम चुनाव की राह पर आ खड़ा हुआ है. भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में केंद्र में सत्तारूढ़ गठजोड़ की पार्टियाँ इस उम्मीद में हैं कि जल्दी चुनाव होने का सर्वाधिक फ़ायदा उन्हें ही मिलेगा. उल्लेखनीय है कि मौजूदा लोकसभा का कार्यकाल अक्तूबर तक निर्धारित था. लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि अप्रैल-मई में ही आम चुनाव कराया जाना संभव है. केंद्रीय मंत्रिमंडल के लोकसभा भंग करने के प्रस्ताव से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ है. इसी महीने के शुरू में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भारतीय जनता पार्टी उनसे अनुरोध कर चुकी है कि वे जितना जल्दी हो सके आम चुनाव कराएँ. भाजपा की आशाएँ भाजपा आशा करती है कि राजनीतिक और आर्थिक मोर्टों पर मिली कई सफलताओं को चुनावी विजय में बदला जा सकता है.
प्रधानमंत्री ने हाल ही में पुराने प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के साथ सफल वार्ता की है. दोनों देशों के बीच रूकी पड़ी शांति प्रक्रिया को वापस पटरी पर लाने की सहमति बनी है. इसे वाजपेयी की व्यक्तिगत जीत के रूप में देखा जाता है जो कि 1999 से ही पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ शांति का प्रयास करते रहे हैं. ख़ुद पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने वाजपेयी को शांति दूत बताया है. भाजपा वाजपेयी की व्यक्तिगत लोकप्रियता को चुनावों में भुनाना चाहती है. पार्टी दिसंबर के विधानसभा चुनावों में मिली जीत से भी उत्साहित है. उन चुनावों में कांग्रेस को मिली पराजय से पार्टी नेता सोनिया गाँधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा है. एक ओर जहाँ वाजपेयी परस्पर विरोधाभासी विचारधाराओं वाले 20 दलों के गठजोड़ को सफलता से सँभाले हुए हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी अब भी गठजोड़ बनाने के प्रयास में लगी हुई है जो कि भाजपा गठबंधन को चुनावों में टक्कर दे सके. फ़ील-गुड फ़ैक्टर सरकार के लिए जल्दी चुनाव का सबसे बड़ा प्रलोभन है भारत की बेहतरीन आर्थिक स्थिति. देश का विदेश मुद्रा भंडार 100 अरब डॉलर से भी ज़्यादा का है, शेयर सूचकांक आसमान छू रहे हैं और आर्थिक वृद्धि दर आठ प्रतिशत तक पहुँच गई है. वाजपेयी सरकार इस उत्साहजनक आर्थिक स्थिति जिसे कि 'फ़ील-गुड फ़ैक्टर' कहा जा रहा है, का चुनावी फ़ायदा उठाने को बेसब्र दिखती है.
पिछले साल बढ़िया मॉनसून रहने के कारण भारत का बहुसंख्या कृषक वर्ग भी ख़ुश है, दूसरी ओर उद्योग जगत ख़ास कर मोटर, दवा और सॉफ़्टवेयर कंपनियों के अच्छे दिन चल रहे हैं. विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा इस साल ख़राब मॉनसून का ख़तरा मोल नहीं लेना चाहती है. उल्लेखनीय है कि भारत के ज़्यादातर हिस्सों में जून में मॉनसून पहुँचता है. व्यापार जगत भी शीघ्र चुनाव के पक्ष में है क्योंकि चुनावी वर्ष में उन्हें आम तौर पर करों की मार पड़ने की आशंका नहीं रहती है. वाजपेयी की उम्र 79 वर्ष हो चुकी है और वह अपने राजनीतिक कैरियर के अंतिम चरण में हैं. ऐसे में विश्लेषकों का मानना है कि वह अंतिम बार चुनावों में जीत हासिल कर भारत के सर्वाधिक सफल राजनेताओं में शुमार होना चाहते हैं. |
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