BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
रविवार, 11 जनवरी, 2004 को 09:31 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
इतिहास और कश्मीर का भविष्य

नियंत्रण रेखा और कश्मीर
कई साल से दोनों देशों के संबंध तनाव पूर्ण रहे हैं

भारत और पाकिस्तान के बीच यातायात शुरु हो चुका है, क्रिकेट टीम के दौरे का कार्यक्रम तय हो चुका है और अब दोनों देशों ने घोषणा की है कि वे दुश्मनी भूलकर शांति वार्ता करेंगे जिसमें कश्मीर के मुद्दे पर भी बातचीत होगी.

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के बीच बनी इस सहमति को ऐतिहासिक कहा जा रहा है लेकिन यह कौन जानता है कि वास्तव में इतिहास रचा जाएगा या नहीं.

तीस साल पहले मैंने एक और भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भुट्टो को शिमला में हाथ मिलाते हुए देखा था.

दोनों नेताओं के बीच न केवल बांग्लादेश युद्ध के बंदियों की रिहाई और कब्ज़े वाली ज़मीनें छोड़ने पर सहमति हुई थी बल्कि जगजाहिर सा 'एक गुप्त समझौता' था कि दोनों देश नियंत्रण रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा मान लेंगे.

इसका मतलब था कश्मीर विवाद का अंत.

कड़वा घूँट

लेकिन यह मामला प्रधानमंत्री भुट्टो के लिए एक कड़वे घूँट की तरह था क्योंकि इसका सीधा मतलब था कि पाकिस्तान कश्मीर घाटी के लिए अपना दावा छोड़ देगा जो एक तरह से कश्मीर की जान है.

उसके बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच कई झूठी शुरुआतें हुई हैं.

यह तीसरा मौक़ा है जब प्रधानमंत्री वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ समझौते की कोशिश की है.

हालाँकि दोनों देशों के बीच बातचीत के लिए बनी सहमति पिछले साल की तुलना में बेहतर स्थिति का संकेत देती है क्योंकि पिछले साल तो दोनों परमाणु ताक़तों के बीच युद्ध की स्थिति बनती दिख रही थी.

कश्मीरी लोग
पिछले डेढ़ दशक में कश्मीर के लोगों ने बहुत कुछ देखा है

प्रधानमंत्री वाजपेयी और राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने शांति के लिए अपनी प्रतिष्ठा दाँव पर लगा रखी है.

यदि इस बार भी बातचीत कहीं नहीं पहुँचती है तो दोनों नेताओं के लिए यह भारी पड़ सकता है.

अटल बिहारी वाजपेयी की हिंदूवादी भारतीय जनता पार्टी की यह राय रही है कि कश्मीर भारत का अटूट हिस्सा है और इसे लेकर कोई विवाद नहीं है.

लेकिन अब प्रधानमंत्री वाजपेयी ने यह स्वीकार कर लिया है कि कश्मीर को लेकर एक विवाद है और इस विषय पर दोनों देशों के बीच बातचीत भी होनी है.

दूसरी ओर परवेज़ मुशर्रफ़ ने यह घोषणा करने का ख़तरा मोल लिया है कि वे पाकिस्तान की ज़मीन से किसी ''आतंकवाद'' की अनुमति नहीं देंगे.

भारतीय नेता इसे 'सीमापार आतंकवाद' कहते हैं या इस्लामी चरमपंथी, जो सीमा पार करके कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों में हिंसक हमले करते रहे हैं.

लेकिन कश्मीर में जिस तरह हिंसा जारी है, उसने भारत को यह स्वीकार करने के लिए बाध्य किया है कि दोनों देशों के बीच एक विवाद तो है.

दूसरी ओर परवेज़ मुशर्रफ़ अपना सबसे शक्तिशाली हथियार छोड़ने को तैयार हो गए हैं जो पाकिस्तानियों को, खासकर इस्लामी पार्टी के लोगों को, सेना और उसके बाहर भी लोगों को नाराज़ कर सकती है.

इस बात पर भी आश्चर्य नहीं है कि परवेज़ मुशर्रफ़ ने बातचीत शुरु होने से पहले किसी भी शर्त का विरोध किया है.

दरअसल दोनों नेता वार्ता से पहले कोई उम्मीद नहीं जगाना चाहते क्योंकि दोनों ही देशों में कश्मीर से लोगों की भावनाएँ जुड़ी हुई हैं.

दो नेता

लेकिन यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि इस बातचीत का कोई नतीजा निकलने वाला नहीं है.

यदि कोई दो नेता कोई फैसला कर सकते हैं तो वे परवेज़ मुशर्रफ़ और अटल बिहारी वाजपेयी ही हैं, बशर्ते वाजपेयी इस साल चुनाव जीत जाएँ.

वे दोनों अपने-अपने देशों में सबसे ताक़तवर कट्टरवादी ताक़तों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

पाकिस्तानी सेना की भारत के ख़िलाफ़ कार्रवाई में एक निहित स्वार्थ भी है क्योंकि यदि भारत से दुश्मनी ख़त्म हो गई तो सबसे पहले पूछा जाएगा कि सेना पर इतने ख़र्च की क्या ज़रुरत है.

सेना के प्रमुख होने के नाते परवेज़ मुशर्रफ़ अपने सैनिकों का मत बदल सकते हैं.

दूसरी ओर प्रधानमंत्री वाजपेयी उस पार्टी के नेता हैं जो किसी और के बयान को ख़ारिज कर सकती है.

वाजपेयी और जमाली
बातचीत को राज़ी हो गए हैं दोनों देश

हाल ही में परवेज़ मुशर्रफ़ पर हुए दो जानलेवा हमलों ने उनके इरादों को और मज़बूत कर दिया है कि इस्लामी चरमपंथी संगठनों को सहायता देना ख़तरनाक हो सकता है.

दूसरी ओर सत्ता में आते ही वाजपेयी ने अपने निकट सहयोगी से कहा था कि पाकिस्तान के साथ शांति स्थापना उनका ऐतिहासिक मिशन होगा.

इसलिए दोनों नेताओं के पास इतिहास बनाने के लिए पर्याप्त कारण मौजूद हैं और दोनों पर सफलता के लिए पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय दबाव भी हैं.

नतीजे

यदि बातचीत सफल होती है तो दोनों देशों के लिए इसके परिणाम फ़ायदेमंद होंगे.

दोनों देशों में रक्षा पर होने वाले ख़र्च में भारी कमी हो जाएगी. दुनिया के सबसे ऊँचे युद्ध के मैदान सियाचिन में सेना की तैनाती पर होने वाले ख़र्च में भारी कमी होगी और दोनों देशों को होने वाले जानमाल का नुक़सान भी रुक जाएगा.

दोनों देशों के बीच व्यावसायिक संबंध बनेंगे और बँटवारे के बाद अलग हो गए लोग अपने परिवारजनों से मिल सकेंगे, पाकिस्तान के लोग बॉलीवुड की फ़िल्में देख सकेंगे और भारत के लोग सीमापार के संगीत का आनंद ले सकेंगे.

सबसे ज़्यादा फ़ायदा कश्मीरियों को होगा.

लगभग चौदह सालों से वे हिंसा के बीच रह रहे हैं. इस बीच उन्हें दोहरी हिंसा झेलनी पड़ी है एक ओर भारतीय सुरक्षा कर्मियों की और दूसरी ओर इस्लामी चरमपंथियों की.

पिछली बार जब मैं कश्मीर गया तो लोगों ने मुझसे बार-बार पूछा कि भारत और पाकिस्तान हमें शांति में क्यों नहीं छोड़ देते.

यह कश्मीर की त्रासदी है कि दोनों देश लाशों के ढेर लगाकर अपने बदले ले रहे हैं और उन्हें इस समस्या में कोई रुचि नहीं है.

मैं कह सकता हूँ कि कश्मीर के लोग अटल बिहारी वाजपेयी और परवेज़ मुशर्रफ़ से कह सकते हैं कि वे किसी भी ऐसे समझौते के लिए तैयार हैं जो शांति लाए.

सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>