BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
बुधवार, 31 दिसंबर, 2003 को 14:03 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
कैसे मिली राष्ट्रपति मुशर्रफ़ को राहत?
राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़
राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ सेनाध्यक्ष का पद छोड़ने को तैयार हो गए हैं

पाकिस्तान के संविधान में हाल में हुए संशोधनों से राष्ट्रपति मुशर्रफ़ को काफ़ी राहत मिली है.

इन संशोधनों से राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने पिछले चार साल में जो भी कदम उठाए थे, सभी को जायज़ ठहराया गया है और उन पर संसद की मुहर लग गई है.

चाहे पाकिस्तान में संसदीय प्रणाली है लेकिन इन संशोधनों के बाद राष्ट्रपति मुशर्रफ़ पाकिस्तान के इतिहास में सबसे शक्तिशाली राष्ट्रपतियों में से एक बन गए हैं.

जब वे सेनाध्यक्ष तब ही सन 2001 में उन्होंने ख़ुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया.

लेकिन उन्हें इस बात का एहसास था कि जब तक उनके फ़ैसलों पर संसद की मुहर नहीं लगती तब तक उन पर सवालिया निशान लगा रहेगा.

आख़िर हुआ ये है कि जो कट्टर इस्लामी पार्टियाँ उनकी सबसे कड़ी आलोचक रही हैं उन्हीं ने राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के शासन को संवैधानिक ठहराने का काम किया है.

यदि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के नज़रिये से देखा जाए तो संशोधित संविधान में जिस अनुच्छेद का सबसे अधिक महत्व है वह है 270-एए.

 चौदह अक्तूबर 1999 को आपातकाल की घोषणा, राष्ट्रपति के जारी किए सभी आदेश, अध्यादेश, मुख्य कार्यकारी के आदेश... को किसी भी न्यायलय या किसी और जगह पर, किसी भी कारण से चुनौती नहीं दी जाएगी

संविधान का अनुच्छेद 270-एए

इसके तहत 1999 में सत्ता में आने के बाद से राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के सभी फ़ैसलों पर संसद की मुहर लगा दी गई है.

इस अनुच्छेद की शब्दावली इस प्रकार है - "चौदह अक्तूबर 1999 को आपातकाल की घोषणा, राष्ट्रपति के जारी किए सभी आदेश, अध्यादेश, मुख्य कार्यकारी के आदेश... को किसी भी न्यायलय या किसी और जगह पर, किसी भी कारण से चुनौती नहीं दी जाएगी."

एक मात्र रियायत

उधर कट्टरपंथी इस्लामी पार्टियों के गठबंधन मुत्तहिदा मजलिसे अमल यानी एमएमए की ओर से ऐसा जताया गया कि संविधान संशोधन से राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के अधिकार कुछ घटेंगे.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ 2008 तक राष्ट्रपति बने रहेंगे और कम से कम एक साल तक सेनाध्यक्ष भी बने रहेंगे.

उन्हें पाकिस्तान की राष्ट्रीय एसेंबली और प्रांतों की एसेंबलियों को सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श लिए बिना बरख़ास्त करने का अधिकार होगा.

वे समाजिक और आर्थिक सुधार कार्यक्रम जारी रख सकते हैं और पाकिस्तान की क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय नीति भी तय कर सकते हैं.

वे राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का गठन भी कर सकेंगे और सेना को सरकार के औपचारिक फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में भी शामिल कर सकेंगे.

कट्टरपंथियों को जो एक मात्र रियायत दी गई है वह है उनके 2004 के अंत में सेनाध्यक्ष के पद हटने की मौखिक घोषणा.

चाहे राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान के इतिहास में एक बड़े संसदीय विरोध का सामना किया है लेकिन शायद उन्हें ये शक कभी भी नहीं था कि वे जब चाहें तब अपने फ़ैसलों पर संवैधानिक मुहर लगवा सकते हैं.

अमरीका पर ग्यारह सितंबर 2001 के हमलों के बाद कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों ने राष्ट्रपति मुशर्रफ़ का विरोध तेज़ कर दिया था.

ये इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान की क्षेत्रीय नीति बदलते हुए अफ़ग़ानिस्तान की तालेबान सरकार को समर्थन देना बंद कर दिया और अमरीका को आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में समर्थन दिया.

फ़ौज-मौलवी साँठगाँठ?

तो फिर एमएमए जैसी पार्टियों ने राष्ट्रपति मुशर्रफ़ को राहत देने वाला ये रुख़ क्यों अपनाया?

कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि पाकिस्तान में काफ़ी देर से चले आई फ़ौजी और मौलवियों की साँठगाँठ अब भी बरक़रार है.

ये साँठगाँठ पूर्व सैनिक शासक ज़िया-उल हक़ के समय में कायम हुई थी जब मौलवियों को पाकिस्तान की क्षेत्रीय और घरेलू नीतियों के लिए इस्तेमाल किया गया.

जनरल ज़िया धर्म की ओर झुकाव रखने वाले मुसलमान थे और उन्होंने खुलेआम कई इस्लामी गुटों का समर्थन किया ताकि मुख्यधारा वाली राजनीतिक पार्टियों का प्रभाव कम किया जा सके.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के तालेबान से समर्थन वापस लेने और उदारवादी नीतियाँ चलाने से इस साँठगाँठ पर असर तो ज़रूर पड़ा है.

बदलते समय और हालात के कारण पाकिस्तान की इस्लामी पार्टियों ने इस्लामी चरमपंथियों के गुटों से कुछ दूरी बनाई है.

प्रक्षकों का मानना है कि कट्टरपंथी पार्टियों का गठबंधन एमएमए पहली बार पाकिस्तान के सूबा सरहद में सत्ता में आया है और सत्ता में बना रहना चाहता है.

अमरीका की चिंता है कि सूबा सरहद में तालेबान या ऐसे तत्वों को शरण मिल सकती है.

पर्यवेक्षक मानते हैं कि संभव है एमएमए को मौखिक आश्वासन दे दिया गया हो कि वे केंद्र सरकार से विरोध की चिंता किए बिना सूबा सरहद में अपनी कट्टरपंथी इस्लामी गतिविधियाँ जारी रख सकता है.

इसलिए फ़ौज से पुराने रिश्तों को ध्यान में रखते हुए ये हो सकता है कि कट्टरपंथी इस्लामी राज़ी हो गए हों कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ को कुछ राहत दे ही दी जाए.

इंटरनेट लिंक्स
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>