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गुरुवार, 18 दिसंबर, 2003 को 18:03 GMT तक के समाचार
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राजा काटें पेड़, रानी लगाएँ झाड़ू

राजा और रानी
राजा सूर्चवंशी और रानी सुशीला अपनी झोपड़ी के बाहर

दादा परदादा भले ही राजा रहे हों लेकिन चंद्र सिंह सूर्यवंशी को अब गुज़ारा चलाने के लिए लकड़ियाँ काटनी पड़ती हैं.

उनका कहना है कि दो हज़ार रूपए की पेंशन से दाल-रोटी चलना संभव नहीं इसलिए जंगल के पेड़ों की मदद लेनी पड़ती है.

जब मैं राजा साहब के घर पहुँचा तो देखा कि सुशीला रानी साहिबा फ़र्श पर झाड़ू लगा रही थीं.

गुजरात के डांग ज़िले के पाँच कबायली राजा उन लोगों में शामिल नहीं हैं जिन्होंने राजशाही ख़त्म होने के बाद फ़ैक्ट्रियाँ लगा लीं या मंत्री बन बैठे.

डांग के राजा
डांग के पाँचो राजा जंगल को नहीं छोड़ना चाहते

इन लोगों को उसी जंगल पर गुज़ारे के लिए निर्भर रहना पड़ता जहाँ कभी उनके ख़ानदान का राज चलता था.

आज इन राजाओं की कुल संपत्ति है एक अदद झोपड़ी जिसमें फ़र्नीचर के नाम पर दो टूटी कुर्सियाँ हैं, कुछ छोटी-छोटी शाही निशानियाँ हैं जिनके दम पर वे ख़ुद को राजपरिवार का वारिस बताते हैं.

डांग के वसुराना इलाक़े के राजा धनराज सिंह सूर्यवंशी कहते हैं, "हमारा गुज़ारा दो हज़ार रूपए के सरकारी पेंशन और सरकार की इज़ाजत से लकड़ी काटकर चलता है."

ये सभी राजा-रानी निरक्षर हैं और बहुत बुरी हालत में रहते हैं लेकिन जंगल से उनका भावनात्मक जुड़ाव है और वे शहर में जाकर नहीं रहना चाहते.

इन्होंने जीवन में जो सबसे बड़ा शहर देखा है वह अहमदाबाद, वे ज़्यादा से ज़्यादा पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के कुछ क़स्बों में गए हैं.

पूरा मान

डांग के दो लाख लोग इन्हें अच्छी तरह जानते हैं कि ये राजपरिवार के वंशज हैं और परंपरागत क़बायली मौक़ों पर उन्हें शाही सम्मान भी मिलता है.

लोग आज भी उन्हें राजा जी कहकर बुलाते हैं, गुजरात सरकार भी पेंशन देती है और पूर्व राजा के तौर पर मान्यता देती है.

 राजा के साथ राजा जैसा ही व्यवहार होना चाहिए

राजा के एक सहयोगी

पेंशन पाने वाले एक राजा के सहायक श्याम सिंह पंवार कहते हैं, "वे दूसरे राजाओं की तरह धनी नहीं बन पाए हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि डांग के समाज में उनकी इज़्ज़त नहीं है. राजा के साथ राजा जैसा व्यवहार होना चाहिए."

ऐसे दुखियारे राजाओं को सहायता देने के लिए ट्रस्ट बनाने वाले धीरज बकुल कहते हैं, "वे हमेशा से जंगल से जुड़े रहे हैं और जंगल उन्हीं का है, वे कभी भी धन जमा करने के चक्कर में नहीं रहे."

बकुल कहते हैं, "इनमें से लगभग सभी की एक से अधिक पत्नियाँ हैं और बड़े परिवार के कारण उनकी आर्थिक हालत और भी ख़राब है."

रानी सुशीला कहती हैं कि रानी होने से ही काम नहीं चलता, "हमारी ज़िंदगी बहुत मुश्किल है, सरकार को हमारे लिए कुछ करना चाहिए."

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