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एक पाकिस्तानी पत्रकार की कहानी
यह बात नवंबर 2001 की है, उन दिनों मैं पाकिस्तान के अख़बार डॉन के इस्लामाबाद दफ़्तर में बतौर रिपोर्टर काम कर रहा था. मैं विदेश मंत्रालय के एक संवाददाता सम्मेलन में शामिल होकर वापस दफ़्तर जा रहा था, दोपहर का वक़्त था. दफ़्तर से कुछ ही दूरी पर एक यू टर्न पर मेरी कार दूसरी तरफ़ से आने वाली एक गाड़ी से टकरा गई. मैं गाड़ी से उतरकर नुक़सान का जायज़ा लेता इससे पहले दूसरी गाड़ी में सवार एक लहीम-शहीम नौजवान ने बड़े ग़ुस्से में उतरकर बदतमीज़ी से बात करनी शुरू कर दी. मैं अभी कुछ कहता इससे पहले उसने मुझ पर हमला कर दिया और मेरे चेहरे पर घूँसा मारा. घूँसा इतने ज़ोर का था कि मैं चकरा गया, उसके बाद उसने दूसरा घूँसा मेरे पेट में मारा और मैं सड़क पर गिर पड़ा.
करीब ही कुछ पुलिस वाले खड़े थे, मैंने उन्हें मदद के लिए पुकारा लेकिन उनमें से कोई मेरी मदद के लिए नहीं आया. इस बीच दूसरी गाड़ी वाला आदमी बड़े आराम से अपनी गाड़ी स्टार्ट करके चलता बना. मैं ख़ून से लथपथ सीधे थाने पहुँचा और रिपोर्ट लिखवाने की कोशिश कर रहा था कि वही आदमी थाने में दाख़िल हुआ, मैंने थानेदार से कहा कि यही वह आदमी है जिसने मुझे मारा है. फ़ौजी रौब बात आगे बढ़ती इससे पहले उसने बड़े रौब से कहा, "मैं मेजर फ़लाँ हूँ, मेरा फ़ोन नंबर लिख लीजिए.'' मेरे कई बार कहने के बावजूद पुलिस ने उसे बिना किसी कार्रवाई के जाने दिया. पुलिस ने मुझे मरहम-पट्टी के लिए अस्पताल भेज दिया, मुझे छह टाँके लगाए गए लेकिन पुलिस एफ़आईआर दर्ज करने को तैयार नहीं हुई. मेरी मेडिकल रिपोर्ट तैयार होने से पहले आर्मी के कुछ लोग अस्पताल पहुँचे, इसका नतीजा ये हुआ कि मेरे छह टाँकों वाले ज़ख्म को रिपोर्ट में मामूली ज़ख्म बताया गया यानी ऐसी चोट जिसकी एफ़आईआर लिखने की ज़रूरत नहीं. मैं भी ठहरा पत्रकार, अन्याय बर्दाश्त करके मैं चुप कैसे रहता. फिर पत्रकार होने की वजह से अख़बारों में ख़बरें छपने लगीं और सरकार ने उस ख़बर को "हुकूमत को बदनाम करने की कोशिश" बताया, सरकार ने मुझे देश के दुश्मन के तौर पर पेश करना शुरू किया. इसके बाद मैंने इंसाफ़ की तलाश में लाहौर हाइकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया जहाँ एक जज ने पुलिस को एफ़आईआर दर्ज करने का हुक्म जारी किया. इसके जवाब में मेरे ख़िलाफ़ तेज़ गाड़ी चलाने और बदतमीज़ी करने का आरोप लगाते हुए एक एफ़आईआर दर्ज कर दी गई. फ़ौज की तरफ़ से मेरे ऊपर लगातार दबाव डाला गया कि मैं मामला वापस ले लूँ लेकिन मैं अड़ा रहा फिर भी नतीजा आज तक कुछ नहीं निकला. सोचता हूँ तो, यही लगता है कि जिन लोगों पर देश की जनता की हिफ़ाज़त का ज़िम्मा है, जिन्हें देश के लोगों के ख़ून-पसीने की कमाई से तनख़्वाह मिलती है उन्हीं लोगों की मनमानी की वजह से लोग दहशत में जीते हैं. |
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