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सोमवार, 01 दिसंबर, 2003 को 21:24 GMT तक के समाचार
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राष्ट्रपति मुशर्रफ़ से पूरी बातचीत पढ़ें
राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़, बीबीसी उर्दू की नयीमा अहमद के साथ
राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ बीबीसी हिंदी-उर्दू के कार्यक्रम आपकी बात बीबीसी के साथ में श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए

बीबीसीः राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ बीबीसी के इस विशेष कार्यक्रम में आपका स्वागत है.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः बहुत शुक्रिया.

बीबीसीः भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत आगे बढ़ रही है, क्या आप कह सकते हैं कि जो आगरा में हुआ था वो दोहराया नहीं जाएगा?

राष्ट्रपति मुशर्रफ़: मैं उम्मीद रखता हूँ और सब को यह उम्मीद रखनी चाहिए, बातचीत आगे बढ़ रही है. लेकिन मैं सबको यही कहता हूँ कि यह हमें 'क्प्लेसेंसी' की तरफ़ न ले जाए. ये शुरूआत है, मुझे लगता है कि कुछ लोग यह समझ रहे हैं कि बस सब हो गया. सब अमन-अमान हो गया, लेकिन ऐसा नहीं है. 'इट इज़ बिगनिंग ऑफ़ एन एंड.' हमें बहुत समझदारी, 'सिन्सिएरिटी' के साथ आगे बढ़ना चाहिए इस बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए.

कनाडा से अतुल गुप्ता: आज जबकि भारत और पाकिस्तान के सामने इतनी समस्याएँ हैं, क्या वे एक साथ बैठकर अपनी समस्याएँ समझदारी से नहीं सुलझा सकते, क्या कारगिल और कश्मीर को भुलाकर नई पहल नहीं की जा सकती?

राष्ट्रपति मुशर्रफ़: जी हाँ, बिल्कुल, लेकिन ये कारगिल और कश्मीर की बात कर रहे हैं, सियाचिन को भूल रहे हैं. सियाचिन को भी पीछे छोड़ना पड़ेगा. मुझे यकीन है कि अगर हमारे में 'सिन्सिएरिटी' है तो हम इन सारे मुद्दों को छोड़कर आगे जा सकते हैं. पीछे की 'हिस्ट्री' अगर तल्ख़ हो तो उसे भूलना ही बेहतर है. आगे का सोचना चाहिए. मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि सब लोग ये कह रहे हैं, जिसका जवाब देने का मुझे मौक़ा दें. सब लोग जो कह रहे हैं कि मैं कहता कुछ और हूँ और करता कुछ और हूँ, यह ग़लत है. मैं ऐसा दोगलापन नहीं करता. ये इनकी ग़लतफ़हमियाँ हैं. मैं हमेशा जो कहता हूँ वही करता हूँ, मैं एक फ़ौजी हूँ, मैं सीधा बोलता हूँ और सीधा करता हूँ. अपने मीडिया को देखें, अपने नेताओं को देखें. मैं हमेशा वही करता हूँ जो बोलता हूँ. मेरी ज़बान हमेशा फ़ाइनल होती है.

इस्लामाबाद से अनवरः कश्मीर मामले में फ़ैसला करने की 'अथॉरिटी' किसकी है, सदर की या फिर राष्ट्रीय एसेम्बली की?

 ये कारगिल और कश्मीर की बात कर रहे हैं, सियाचिन को भूल रहे हैं. सियाचिन को भी पीछे छोड़ना पड़ेगा. मुझे यकीन है कि अगर हमारे में 'सिन्सिएरिटी' है तो हम इन सारे मुद्दों को छोड़कर आगे जा सकते हैं. पीछे की 'हिस्ट्री' अगर तल्ख़ हो तो उसे भूलना ही बेहतर है. आगे का सोचना चाहिए. ये लोग जो कह रहे हैं कि मैं कहता कुछ और हूँ और करता कुछ और हूँ, यह ग़लत है. मैं ऐसा दोगलापन नहीं करता. ये इनकी ग़लतफ़हमियाँ हैं. मैं हमेशा जो कहता हूँ वही करता हूँ.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः जी हाँ, फ़ैसला बिल्कुल क़ौमी एसेम्बली के ज़रिए होगा क्योंकि वो अवाम को 'रिप्रेजेंट' करती है, जो भी फ़ैसला कश्मीर का होगा, पाकिस्तान के अवाम को हमें साथ ले जाना होगा, तो ज़ाहिर है कि क़ौमी एसेम्बली का फ़ैसला होगा. लेकिन उसमें 'कॉन्ट्रिब्यूशन' प्रेसिडेंट की हो सकती है. तो इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए. मुझे हैरानी है कि ऐसे सवाल क्यों आते हैं, 'प्रेसिडेंट' भी पाकिस्तान का ही एक हिस्सा है. प्रेसिडेंट की भी कोई राय हो सकती है, ऐसी बात नहीं है कि राष्ट्रपति मुँह सीकर बैठा रहे. प्रेसिडेंट की भी राय होनी चाहिए, अवाम की राय एसेम्बली के ज़रिए होगी.

लड़काना पाकिस्तान से शाह मुहम्मद शाह: वाघा की तरफ़ से यातायात शुरू हो चुका है, विमान सेवा भी शुरू हो गई तो फिर खोकरापार सरहद को खोलने में क्या समस्या है?

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः नहीं, कोई समस्या नहीं है. इंशा अल्लाह, इसे भी शुरू करेंगे. हमने यही सोचा कि वाघा की तरफ़ से आने-जाने वाले अधिक हैं, मुझे पूरा एहसास है. खोकरापार से भी होना चाहिए, लेकिन वहाँ रेललाइन का पूरा सिस्टम पटरी-वटरी सब ख़राब है, उसको पूरे को 'रिपेयर' करना होगा, उसके बाद ही इसे स्टार्ट करना होगा. कोई समस्या नहीं है, मैं मानता हूँ आपकी बात.

श्रीनगर से नूर अहमद बाबाः दीवारे बर्लिन की तरह खड़ी लाइन ऑफ़ कंट्रोल के दोनों तरफ़ फँसे कश्मीरियों को मिलाने के लिए आप क्या कर रहे हैं?

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः जी हाँ, आपने बहुत सही बात की है, मेरी भी दुआएँ हैं, मेरी पूरी कोशिश रहेगी. मैं चाहता हूँ कि आप लोगों की तकलीफ़ें आसान हों, हम तो यहाँ आराम से बैठे हैं तकलीफ़ तो आपको ही हो रही है. आप श्रीनगर से बोल रहे हैं, मुझे इस बात का पूरा एहसास है, जहाँ तक बस की बात है, हमने 'एग्री' किया है कि श्रीनगर से मुज़फ़्फराबाद बस चलेगी. हमारी कोशिश यही है कि कश्मीरियों की ट्रेवल रिस्ट्रिक्शन कम हो जाएँ, ताकि आप आराम से आ-जा सकें. इस पर हमने मंजूरी दे दी है तो इंशा अल्लाह कम से कम आपका आना-जाना आसान हो जाएगा. फिर जैसे भी 'डायलॉग' का सिलसिला शुरू होगा उसमें हम देखेंगे कि और ज़्यादा कैसे बात आगे बढ़ सकती है. ताकि 'फ़ाइनली' अमन का एक 'सॉल्यूशन' हो जाए कश्मीर का. पूरा सिलसिला ही हल हो जाए, कोशिश हमारी यही होगी.

बीबीसीः भारत का कहना है कि पाकिस्तान भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देता है, आपके कई मंत्री कह चुके हैं कि वे कश्मीर चरमपंथियों को नैतिक समर्थन देते हैं. आप कहते हैं कि कश्मीर में 'इंडिजिनस स्ट्रगल' है, तो कैसे बात का सिलसिला बढ़ेगा.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः देखें न, नज़रिया तो 'फ्यूचरिस्टिक' है न? हमें तो 'फ्यूचर' का सोचना है न, वो तो 'प्रेजेंट और पास्ट' की बात कर रहे हैं. मैं तो कहता हूँ कि आगे चलें, बैठे, बातचीत करें. और फिर आगे की तरफ़ देखें. मैंने बताया है कि 'फ़ोर स्टेप प्रॉसेस' है - पहले तो बातचीत करें, फिर 'एक्सेप्ट' करें कि कश्मीर का विवाद ऐसा है कि जिसे हमें हल करना है, एक व्यापक बातचीत करें जिसमें कश्मीर भी शामिल हो. तीसरा 'स्टेप' है कि जो भी 'अनएक्सेप्टेबल सोल्यूशन' है, भारत को, पाकिस्तान को या कश्मीरियों को, उन्हें अलग करना होगा. चौथा स्टेप है कि जो बाक़ी 'सॉल्यूशन' है, दस बारह लोगों ने 'सॉल्यूशन' दिए हैं. उनमें से एक को लें, जो कि 'विन-विन सिचुएशन' है, भारत के लिए, पाकिस्तान के लिए, कश्मीरियों के लिए. यही एक बड़ा 'लॉजिकल स्टेप बाई स्टेप' तरीक़ा है, हल करने का. आप जो कह रहे थे कि नज़रिया फ़र्क है, आगे का कोई नज़रिया फ़र्क नहीं होना चाहिए. यह हिंदुस्तान को भी कबूल करना चाहिए और हमें भी.

बीबीसीः कश्मीर में और दुनिया के दूसरे हिस्सों में जो हथियारबंद संघर्ष चल रहा है, क्या आप समझते हैं कि ग्यारह सितंबर के बाद दुनिया भर में ऐसे आंदोलनों का कोई भविष्य नहीं रह गया है?

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः जो कश्मीर में हो रहा है, वह तो 'इंडिजिनस स्ट्रगल' चल रही है. वो मेरे ख़याल में ख़त्म या कम तभी होगा जब 'डायलॉग' का सिलसिला शुरू होगा और हम 'सॉल्यूशन' की तरफ़ बढ़ने लगेंगे. अभी तो मामला शुरू ही नहीं हुआ है, अभी तो भारत और पाकिस्तान के बीच 'कॉन्फ़िडेंस बिल्डिंग' शुरू हुई है. हम बैठें और बातचीत करें, लेकिन दिक्कत है कि भारत कश्मीर की बात ही नहीं करता, फिर हम वहीं के वहीं बैठे रहेंगे. होना यही चाहिए कि बातचीत शुरू हो, उसमें कश्मीर शामिल हो, फिर आहिस्ता-आहिस्ता वहाँ जो कुछ भी हो रहा है वह कम होता जाएगा और ख़त्म हो जाएगा.

बीबीसीः पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने थोड़े दिन पहले ही नियंत्रण रेखा पर 'सीज़ फ़ायर' किया था और भारत ने उसे स्वीकार भी किया था लेकिन भारत का अब भी यही मानना है कि अभी भी क्रॉस बॉर्डर यानी सीमा पार से गतिविधियाँ चल रही हैं, आज ही भारत के उप- प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने जो कहा है हम आपको सुनवाते हैं.

टेप पर भारतीय उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी: ...नियंत्रण रेखा पर संघर्षविराम लागू होने के बाद भी सीमा पार से आतंकवादी गतिविधियाँ जारी हैं... घुसपैठ पहले ही हो चुकी है, वे निर्दोष लोगों की हत्या करने में संकोच नहीं करते...

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः जी. अडवाणी साहब हिंदी बोलते हैं, मैं उर्दू समझता हूँ, हिंदी नहीं समझता, लेकिन मुझे आधी बात समझ में आई...ये तो कभी कुछ कहते हैं, कभी कुछ कहते हैं, बयान बदलते रहते हैं...

बीबीसीः परवेज़ मुशर्रफ़ साहब, आडवाणी साहब कह रहे थे कि पाकिस्तान की ओर से गतिविधियाँ जारी हैं यानी घुसपैठ अब भी जारी है.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर तो फौजें फायर करती हैं, 'सीज़ फ़ायर' है तो फायरिंग बंद है, तीन महीने पहले 'प्रपोज़' किया था तब इन लोगों ने 'रिजेक्ट' कर दिया था. अब मान गए हैं, कभी ये कुछ कहते हैं तो कभी कुछ, यही मैं कह रहा हूँ. मैं एक चीज़ और बताऊँ, ये कहते थे कि पाकिस्तानी फ़ायर करते हैं और उस फ़ायरिंग की आड़ में जिसे घुसपैठिया ये कह रहे हैं, वे घुस जाते हैं. अब जब 'लाइन ऑफ़ कंट्रोल' पर फायरिंग बंद है तो तब ये कैसे जा रहे हैं. इल्ज़ाम तो यह पहले से ही लगाते रहे हैं, अगर दो चिड़ियाएँ आ जाती हैं तो कहते हैं कि घुसपैठिए आ गए. वहाँ 'इंडिजिनस स्ट्रगल' चल रही है, यह इन लोगों को मान लेना चाहिए, सब कुछ वहीं हो रहा है. 'पीस प्रॉसेस' को आगे चलाएँ तभी सब कुछ ठीक होगा.

 हमें तो 'फ्यूचर' का सोचना है न, वो तो 'प्रेजेंट और पास्ट' की बात कर रहे हैं. मैं तो कहता हूँ कि आगे चलें, बैठें, बातचीत करें. और फिर आगे की तरफ़ देखें. मैंने बताया है कि 'फ़ोर स्टेप प्रॉसेस' है. दस बारह लोगों ने 'सॉल्यूशन' दिए हैं. उनमें से एक को लें, जो कि 'विन-विन सिचुएशन' है, भारत के लिए, पाकिस्तान के लिए, कश्मीरियों के लिए. यही एक बड़ा 'लॉजिकल स्टेप बाई स्टेप' तरीक़ा है, हल करने का. आप जो कह रहे थे कि नज़रिया फ़र्क है, आगे का कोई नज़रिया फ़र्क नहीं होना चाहिए. यह हिंदुस्तान को भी कबूल करना चाहिए और हमें भी.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़

जर्मनी से राघव कुमारः बीस के करीब हिंदुस्तानी दहशतगर्द पाकिस्तान में हैं जो इंटरपोल की 'मोस्ट वांटेड लिस्ट' में हैं, भारत माँग करता रहा है कि उन्हें उसके हवाले कर दिया जाए. पाकिस्तान को लिस्ट भी सौंपी गई, आप इस कार्यक्रम में ऐलान क्यों नहीं करते उन्हें भारत के हवाले कर दिया जाएगा.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः बीस आदमियों की लिस्ट इन्होंने दी है, मैं पचास की लिस्ट भिजवाता हूँ. लिस्टों की कोई कमी नहीं है जी. एक लिस्ट मुझे 'प्रिपेयर' करके दी गई जिसमें आडवाणी साहब का नाम लिखा था, अब मैं वो लिस्ट उधर भेज देता हूँ. तो इस पर कहाँ तक झगड़ा होता रहेगा? इसका कोई हल नहीं है, आगे की तरफ़ सोचें. अगर आपको गलतफ़हमी है तो मैं बता दूँ कि केवल यहीं से दहशतगर्दी नहीं हो रही है, यहाँ जो बम धमाके हो रहे हैं, बहुत से मामलों में हमें तकरीबन यकीन है कि वे यहाँ बम धमाके कर रहे हैं. इन्होंने जो लिस्ट दी है उसके बारे में कोई 'एविडेंस' नहीं है, 'इविडेंस' के आधार पर ही हम ऐक्शन करेंगे.

बीबीसीः अभी आपने कहा कि भारत बयान बदलता रहता है, लेकिन अभी अफ़गानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने कहा है कि तालेबान के नेता मुल्ला उमर पाकिस्तान में हैं, क्या आप कहना चाहते हैं कि पाकिस्तान के सारे पड़ोसी देश झूठ बोल रहे हैं.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः करज़ई साहब ने काबुल में बैठकर कह दिया कि मुल्ला उमर वहाँ हैं, अगर वे वहाँ थे तो हमें बताया क्यों नहीं हम उन्हें पकड़ लेते? कहा कि वे एक मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहे थे तो उन्हें पकड़वा क्यों नहीं दिया? इतना ज़्यादा पता है काबुल में बैठकर तो हमें बताया क्यों नहीं. किसी को कुछ पता है नहीं, बैठे बैठे यूँ बात करते हैं. उनको पता होना चाहिए कि हम दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ हैं. दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ सबसे ज्यादा 'सक्सेस' हमने हासिल की है, कोई मुल्क नहीं कह सकता कि उसने पाकिस्तान से ज्यादा काम किया हो, दहशतगर्दों को पकड़ा हो या फिर मारा हो. किस मुँह से कहते हैं कि हम कुछ नहीं कर रहे. 'एज़ ए प्रेसिडेंट इट इज़ इक्स्ट्रिमली एनॉयिंग,' ज़रा हमें बताएँ, हमने तो छह सौ आदमी पकड़कर मार भी दिए हैं. उन लोगों ने क्या कर दिया है जो हमारे ऊपर इल्ज़ाम लगाते हैं.

बेल्जियम से भावना हेगड़ेः कई साल पहले मोरारजी भाई देसाई को पाकिस्तान ने निशाने पाकिस्तान दिया था, क्या अब भारत में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे यह अवार्ड दिया जा सके.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः मैं तो वाजपेयी साहब को नामज़द करुँगा. (हँसते हुए) अगर कश्मीर के हल की तरफ़ हम आगे चल पड़ें या और कोई 'अचिवमेंट' हो जो कि पाकिस्तान के 'प्वाइंट ऑफ़ व्यू से सिग्निफ़िकेंट' हो, 'पीस प्रॉसेस' आगे जाए तो हम 'ऑनर' करना चाहेंगे किसी को भी.

बीबीसीः आप कह रहे हैं कि कश्मीर 'इंडिजिनस स्ट्रगल' है, भारत इसको मानने को तैयार नहीं है फिर बात आगे कैसे बढ़ेगी? हल क्या है?

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः ये क्या मतलब है, हल नहीं हो रहा है. हल नहीं हो रहा है कि इसीलिए तो 'स्ट्रगल' चल रही है. 'स्ट्रगल' कैसे ख़त्म होगी, ये तो आप उल्टी बात कर रहे हैं. आप हल की तरफ़ बढ़ेंगे तो 'स्ट्रगल' बंद होगी. ये बात नहीं है कि 'स्ट्रगल' हो रही है इसलिए हल नहीं हो सकता. ये 'पॉलिटिकल इश्यू' है और इसका 'पॉलिटिकल सॉल्यूशन' ढूँढना होगा. ऐसा 'सॉल्यूशन' जो भारत, पाकिस्तान और कश्मीरी अवाम को 'एक्सेप्टेबल' हो. जब ये हल मिल जाएगा तो 'स्ट्रगल' खुद ही बंद हो जाएगी.

भारत से जितेंद्र सिंह भाटियाः पाकिस्तान सरकार समय समय पर कहती है कि वह कश्मीरियों की आज़ादी की लड़ाई में समर्थन कर रही है तो फिर उसने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में अपनी फ़ौज क्यों रखी है, वह उसे वहाँ से कब हटाएगी. पाकिस्तान सरकार कश्मीर के बारे में कितनी गंभीर है?

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः ऐसा सवाल मैंने आज तक नहीं सुना है कि पाकिस्तान कश्मीर से कब फौज हटाएगा, सात लाख फौजी तो भारत के वहाँ बैठे हैं. हमारे तो पचास हज़ार हैं कश्मीर में. दोनों को हटा लेते हैं, वो सात लाख हटा लें, हम पचास हज़ार हटा लेते हैं. उनसे पूछ लीजिए, हम कल शुरू कर लेते हैं.

बीबीसीः भारत कश्मीर पर नहीं झुकता, पाकिस्तान भी कश्मीर का मुद्दा छोड़ने को तैयार नहीं, कुछ लोगों को लगता है कि दोनों ओर के नेता कुर्सी के लिए कश्मीर का इस्तेमाल कर रहे हैं.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः यह ग़लत 'परसेप्शन' है. 'रिएलिटी' को देखना चाहिए. कश्मीरी पाकिस्तान की पूरी 'सोसाइटी' में हैं, आज़ाद कश्मीर में तो हैं ही, पूरे मुल्क में हैं जिनकी 'फीलिंग' हैं, 'इमोशंस' हैं, जिनकी 'एक्सपेक्टेशन' हैं. मेरे 'ज्वाइंट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़' कमेटी के चेयरमैन, इनफॉर्मेशन मिनिस्टर कश्मीरी हैं. बहुत से कश्मीरी मेरे इर्दगिर्द रहे हैं. पचास साल से मामला चल रहा है, हम अचानक कैसे कह दें कि चलो कश्मीर को भुला देते हैं, बिल्कुल 'अनरियलिस्टिक और डेंजरस' बात है, यह नहीं हो सकेगा. शायद 'मिलिटेंट एक्शन' हो जाए ऐसी सरकार के ख़िलाफ़. उसके अलावा कुछ 'प्रिसिंप्लस' भी होते हैं. मुल्क के उसूल होते हैं. पाकिस्तान के 'नेशनल इंटरेस्ट' हैं, 'नेशनल इंटरेस्ट' का कभी कोई सौदा हो सकता है. मेरे खयाल में ऐसे 'नेशन' कोई हक़ नहीं है रहने का 'विच कॉम्प्रॉमाइज़ ऑन नेशनल इंटरेस्ट.' 1948 से 'सिक्यूरिटी काउंसिल' का 'रिज़ाल्यूशन' है.

बीबीसीः अगले महीने इस्लामाबाद में सार्क समिट हो रहा है, क्या उम्मीदें हैं आपको सार्क सम्मिट से?

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः सार्क सम्मिट से बहुत उम्मीदें हैं. सबसे पहले मुझे उम्मीद है कि सार्क सम्मिट होगी, पहले तो यही लग रहा था कि सम्मिट ही नहीं होगी. दूसरी उम्मीद है कि वाजपेयी साहब आएँगे यहाँ, इंशा अल्लाह. तीसरी उम्मीद है कि वाजपेयी साहब सब लोगों से मिलेंगे. चौथी उम्मीद यह भी हो सकती है कि मिलके जो बातचीत होगी, वह कारगर होगा.

बीबीसीः क्या आप मिलेंगे प्रधानमंत्री वाजपेयी से?

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ः अगर वो मिलना चाहते हैं... लगता है कि बार-बार मैं कह रहा हूँ, उन्हें कोई ऐसा खयाल नहीं आना चाहिए कि मैं कोई उनसे मिले बग़ैर रह नहीं सकता हूँ. मैं बहुत खुश हूँ, आराम से बैठा हुआ हूँ, अगर वे मिलना चाहेंगे तो मिल लूँगा.

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