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लखनऊ के मुसलमानों के हिंदू 'सहरी बाबा'
सर्दियों में सुबह तीन बजे उठकर गली-गली घूमना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन लखनऊ के बाराती लाल पिछले 16 वर्षों से रमज़ान के दौरान यही करते रहे हैं. अपने हाथ में मेगा-माइक लिए वे अलीगंज मोहल्ले में रहनेवाले मुस्लिम परिवारों को सहरी के लिए जगाते हैं. सहरी रोज़ा शुरू होने से पहले का समय होता है जब रोज़ा रखनेवाला कुछ भोजन कर सकता है. बाराती लाल कहते हैं, "मैने बचपन से ही सुना था कि मुसलमानों के लिए सहरी का समय कितना ज़रूरी होता है. फिर 1987 में मैने स्वयं ही सहरी के समय मुसलमानों को जगाने का बीड़ा उठा लिया."
उसके बाद से अलीगंज के मुस्लिम परिवारों को जैसे उनकी आवाज़ की आदत सी पड़ गई है. रमज़ान के दौरान वे गली-गली जाकर ऐलान करते हैं, "उठिए जनाब, सहरी का वक़्त हो गया है". इसके बाद बाराती लाल दरवाज़ों पर दस्तक देते हैं और जब लोग लाइट जलाकर, दरवाज़ा खोलकर उन्हें सलाम कहते हैं तो वे आगे बढ़ जाते हैं. उस समय बाराती लाल की आवाज़ के अलावा सिर्फ़ दो और आवाज़ें ही सुनाई पड़ती हैं. एक तरफ़ मुर्गे की बाँग और दूसरी तरफ़ स्थानीय मस्जिद के इमाम जो सहरी ख़त्म होने का समय बता रहे होते हैं. बदलता समय बाराती लाल बताते हैं कि पुराने ज़माने में लोगों की टोलियाँ ढोल-मंजीरे के साथ इस काम के लिए निकलती थीं.
वे कहते हैं, "अब मस्जिदों में लाउडस्पीकर और घरों में अलार्म घड़ी होने से यह परंपरा ख़त्म होती जा रही है." मस्जिद चौधरी टोला के इमाम रफ़ीउल्लाह का कहना है, "बाराती लाल बड़ा अच्छा काम करते हैं. ये धर्म से संबंधित है और मुसलमानों के फ़ायदे की चीज़ है." अलीगंज के कुछ मुसलमान बाराती लाल को 'सहरी बाबा' कहते हैं. इनमें से एक के अनुसार "अल्लाह ताला बड़ा मेहरबान है. वह बाराती लाल को जन्नत दे सकता है." मगर बाराती लाल एक भजन गाते हुए चलते हैं, 'ये दरबारे मोहम्मद है यहाँ मिलता है बेमाँगे. अरे नादान यहाँ दामन को फैलाया नहीं करते." |
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