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चुनावों में महिलाओं की भूमिका
भारतीय राज्य मिज़ोरम में चुनाव हो चुके हैं और अब चार अन्य राज्यों में चुनाव होने हैं. इनमें से कम से कम तीन राज्यों में महिला उम्मीदवार हैं जो सर्वोच्च पद के लिए चुनाव लड़ रही हैं. शीला दीक्षित तो पहले से ही दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं और अगर उनकी पार्टी कांग्रेस फिर जीतती है तो वे एक बार फिर मुख्यमंत्री बन सकती हैं. भारतीय जनता पार्टी ने मध्यप्रदेश में उमा भारती और राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया है. लेकिन चुनावों में महिला उम्मीदवारी के लिए यह कोई संकेत या उदाहरण नहीं है क्योंकि चारों राज्यों में महिला उम्मीदवारों की कुल संख्या दस प्रतिशत से भी कम है. दो प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा हमेशा से महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का समर्थन करते आए हैं लेकिन उम्मीदवारों की सूची में उनकी यह इच्छा ज़ाहिर नहीं होती. भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष वेंकैया नायडू कहते हैं, ''हम और महिला उम्मीदवारों को टिकट देना चाहते थे लेकिन टिकट मांगने वाली महिलाएँ ही कम थीं.'' राजनीतिक दलों को लगता है कि महिला उम्मीदवारों के जीतने की संभावना कम होती है लेकिन हाल ही में एक सर्वेक्षण के बाद सेंटर फॉर सोशल रिसर्च ने कहा है कि यह धारणा सही नहीं है. उनका कहना है कि 1972 के बाद के आंकड़े बताते हैं कि महिला उम्मीदवारों के जीतने का औसत पुरुषों की तुलना में बहुत अच्छा रहा है. इस संस्था की निदेशक रंजना कुमारी कहती हैं कि राजनीतिक दल सिर्फ़ बात करते हैं, दरअसल महिलाओं के साथ सत्ता में भागीदारी की उनकी कोई इच्छा नहीं है. अच्छे संकेत हालांकि कम संख्या के बावजूद लगता है कि चार राज्यों के चुनाव महिलाओं के लिए अच्छे संकेत देने वाले हैं. दिल्ली में पिछले चुनावों की तुलना में इस बार 20 प्रतिशत ज़्यादा महिला उम्मीदवार हैं. पिछली बार 58 उम्मीदवार थीं और इस बार 70 हैं.
दिल्ली में कांग्रेस ने 12 महिलाओं को टिकट दी है. पार्टी ने मध्यप्रदेश में भी 40 महिलाओं को मैदान में उतारा है. विश्लेषकों का कहना है कि महिलाओं की भागीदारी भले ही सीमित संख्या में बढ़ रही है लेकिन जो महिलाएँ राजनीति में आ रही हैं उन्होंने महिला राजनीतिज्ञों के प्रति लोगों की राय बदलने का महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उनका कहना है कि अब जो महिलाएँ चुनाव लड़ रही हैं अब उनमें से कम ही किसी राजनीतिक की पत्नी, बेटी या बहू हैं. एक ओर शीला दीक्षित हैं जिन्हें पिछली बार मुख्यमंत्री बनाया गया तो उनका राजनीतिक क़द बेहद कम करके आंका गया था. लेकिन पिछले पाँच सालों में उन्होंने इस धारणा को बदल दिया है. मध्यप्रदेश में भाजपा की मुख्यमंत्री पद की दावेदार उमा भारती के पास लंबा राजनीतिक अनुभव है और उन्होंने दिग्विजय सिंह के लिए ख़ासी राजनीतिक चुनौती खड़ी की है. इसी तरह वसुंधरा राजे सिंधिया अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बावजूद अपने आपमें सक्षम राजनीतिक मानी जाती हैं और राजस्थान में भी उनका महिला होना किसी तरह आड़े नहीं आ रहा है. |
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