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गुरुवार, 20 नवंबर, 2003 को 00:42 GMT तक के समाचार
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मिज़ोरमः1998 का विधानसभा चुनाव

मिज़ोरम का 1998 का विधानसभा चुनाव काँग्रेस के लिए एक बड़ा आघात था.

इस चुनाव ने राज्य में काँग्रेस की एक दशक से चल रही सत्ता का अंत कर दिया.

चुनाव में मिज़ो नेशनल फ़्रंट(एमएनएफ़) और मिज़ो पीपुल्स कॉंफ़्रेंस(एमपीएफ़) के गठबंधन की ज़बरदस्त लहर थी और गठबंधन ने चुनाव में एकतरफ़ा जीत पाई.

गठबंधन को राज्य विधानसभा की कुल 40 में से 33 सीटों पर जीत हासिल हुई.

एमएनएफ़ को 21 और एमपीसी को 12 सीटों पर जीत मिली.

काँग्रेस को झटका

ललथनहावला

1993 में चुनी गई विधानसभा में कॉंग्रेस के 16 विधायक चुनकर आए थे.

मगर 1998 के चुनाव में काँग्रेस के बस 6 विधायक ही अपनी सीट बचा पाए.

कॉंग्रेस ने सभी 40 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे.

काँग्रेस के लिए हार और भी शर्मनाक हो गई जब मुख्यमंत्री ललथनहावला ख़ुद अपनी सीट नहीं बचा सके.

ललथनहावला अपनी विधानसभा सीट सरछिप से पिछले चारों चुनावों में जीतते रहे थे मगर इस चुनाव में उन्हें एमएनएफ़ के उम्मीदवार ने 720 मतों से पछाड़ दिया.

ललथनहावला राज्य काँग्रेस के अध्यक्ष भी थे और चुनाव के नतीजों को उन्होंने काँग्रेस के लंबे समय तक सत्ता में बने रहने का नुक़सान बताया.

एमएनएफ़-एमपीसी गठबंधन

ज़ोरामथांगा

एमएनएफ़ और एमपीसी ने 28-28 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे.

दोनों पार्टियों में तालमेल था ज़रूर मगर सभी सीटों पर नहीं.

दोनों के बीच 20 सीटों पर तो सीधा तालमेल था मगर बाकी 20 सीटों पर उनमें "दोस्ताना संघर्ष" हुआ.

एमएनएफ़ के अध्यक्ष ज़ोरामथांगा दो-दो सीटों से चुनाव लड़ रहे थे और दोनों पर ही उनकी जीत हुई.

एमपीसी अध्यक्ष ब्रिगेडियर टी साइलो भी मामिट सीट से आसानी से जीत गए.

साइलो 1979 में मिज़ोरम के मुख्यमंत्री रह चुके थे जब मिज़ोरम केंद्र शासित प्रदेश हुआ करता था.

मगर गठबंधन की सरकार का नेतृत्व सौंपा गया ज़ोरामथांगा को जिनके नेतृत्व में गठबंधन ने 5 साल तक सरकार चलाई.

अन्य दल

चुनाव में भारतीय जनता पार्टी, जनता दल, समता पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टियों ने भी अपने उम्मीदवार खड़े किए थे.

मगर खाता किसी भी पार्टी का नहीं खुल सका और अधिकतर उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई.

इस चुनाव में 44 निर्दलीय उम्मीदवार भी थे और इनमें जीता केवल एक.

एमपीसी ने दावा किया कि ये उम्मीदवार भी उसके समर्थन से जीता.

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