|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जूदेव का राजनीतिक जीवन
केन्द्रीय पर्यावरण और वन राज्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा देने वाले दिलीप सिंह जूदेव की छवि छत्तीसगढ़ में कट्टरपंथी हिन्दू नेता की है. जशपुर राजघराने में 1949 को जन्मे जूदेव के पिता राजा विजय भूषणदेव जशपुर रियासत के अंतिम शासक थे. माना जाता है कि उनके राजघराने की 1970 में आर्थिक स्थिति तब ख़राब हो गई जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 'प्रिवि पर्स' या राजघरानों को दी जाने वाली 'पेंशन' समाप्त करने की घोषणा की. जूदेव की शिक्षा जशपुर और मेयो कॉलेज अजमेर में हुई. उन्होंने 1975 में राजनीति में प्रवेश किया और जशपुर नगरपालिका के अध्यक्ष बने. लेकिन 1988 में जूदेव खरसिया विधानसभा क्षेत्र से उपचुनाव लड़े और हार गए. भारतीय जनता पार्टी की ओर से 1989 से 91 तक वे लोकसभा सदस्य रहे और 1992 से 98 तक राज्यसभा सदस्य रहे. जनवरी 2003 में दिलीपसिंह जूदेव को केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन राज्यमंत्री बनाया गया. लेकिन हाल में उनपर आरोप लगाए जाने के बाद उन्होंने इस पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. जूदेव उड़ीसा में ईसाई पादरी स्टेन्स की हत्या के प्रकरण में अभियुक्त दारासिंह की पैरवी के लिए आगे आए और इससे उन्होंने पूरे देश को चौंका दिया. दिलीपसिंह जूदेव का जशपुर राजघराना तीन पीढ़ियों से रामराज्य परिषद, जनसंघ और अब भाजपा से जुड़ा रहा है. दिलीपसिंह जूदेव आरएसएस की एक अंग बनवासी कल्याण परिषद से जुड़े थे. पार्टी में उनका महत्व इसलिए है क्योंकि उन्होंने पिछले पन्द्रह सालों से आरएसएस की लाईन पर छत्तीसगढ़ में आदिवासियों में धर्म परिवर्तन के खिलाफ एक अभियान चला रखा है. इसका नाम ऑपरेशन "घर वापसी" रखा गया है. जूदेव का दावा रहा है कि उन्होंने सैकड़ों आदिवासियों का धर्म परिवर्तन सुनिश्चित कर उन्हें हिंदू बनाया. छत्तीसगढ़ में अब तक विधानसभा चुनाव की कमान दिलीपसिंह जूदेव के ही हाथों में ही थी. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||