|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एचआईवी के बारे में जागरूकता ज़रूरी
महाराष्ट्र सरकार की एड्स विशेषज्ञ डॉक्टर अलका देशपांडे का कहना है कि यदि भारत में एचआईवी और एड्स को फैलने से रोकना है तो इसके बारे में पूरे देश में इसके फैलने के कारणों के बारे में जागरूकता पैदा करनी होगी, केवल क़ानून बनाने से इससे बचा नहीं जा सकता. वे एचआईवी और एड्स के बारे में बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रमों की एक श्रंखला की शुरुआत में बीबीसी हिंदी सेवा के साप्ताहिक कार्यक्रम 'आपकी बात बीबीसी के साथ' में श्रोताओं के सवालों के जवाब दे रही थीं. उनका कहना था कि इस विषय में जागरूकता पैदा करना मानव व्यवहार से संबंधित है और इस विषय में बच्चों और युवाओं को जानकारी देने में मुश्किलें हो सकती हैं. लेकिन उनका मानना है कि इस विषय में समाज के हर वर्ग को जागरुक बनाना आवश्यक है. लक्षण और कारण डॉक्टर देशपाँडे ने इस बीमारी के लक्षणों के बारे में कहा कि हो सकता है कि एचआईवी वायरस किसी व्यक्ति के शरीर में दाख़िल होने के बाद उसका आठ या दस साल तक कोई असर न हो.
उनका कहना था कि ये वायरस चुपचाप उस व्यक्ति के शरीर से उन लोगों के शरीर में दाख़िल हो सकता है जिनके साथ उनके शारीरिक संबंध हों. वे कहती है कि इसका पता लगाने का एक ही तरीका है और वह है ख़ून की जाँच. वे कहती हैं कि बाद में ये वायरस उस व्यक्ति की बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट कर देता है और एचआईवी से ग्रस्त व्यक्ति टीबी या अन्य बीमारियों का शिकार हो जाता है. डॉक्टर देशपाँडे ने बताया कि ये बीमारी 1981 में अमरीका में पहले सामने आई और भारत में एड्स के पहले मामले का पता चला 1986 में. वे मानती हैं कि भारत में एड्स ने फ़िलाहाल ख़तरनाक रूप नहीं अपनाया है और एचआईवी से ग्रस्त व्यक्ति कई वर्ष तक जीवित रह सकता है.
उन्होंने कहा कि इसका सबसे बड़ा कारण एक व्यक्ति के कई व्यक्तियों के साथ शारीरिक संबंध होना और कंडोम का इस्तेमाल एचआईवी वायरस से बचने का सबसे बढ़िया और सस्ता तरीका है. एड्स पीड़ित से भेदभाव 'आपकी बात बीबीसी के साथ' कार्यक्रम में एचआईवी से ग्रस्त एक व्यक्ति भी शामिल हुए और उन्होंने अपने अनुभव बीबीसी श्रोताओं के सामने बयान किए. उनका कहना था, "जी हाँ, हमारे साथ भेदभाव होता है. जब मैने पाया कि मुझे पीठ का दर्द बहुत ज़्यादा हुआ तो मैं मुंबई के सबसे बड़े हस्पताल में गया. लेकिन जब उन्होंने पाया कि मैं एचआईवी से ग्रस्त हूँ तो उन्होंने बहनाने बनाने शुरु किए और मुझे किसी और अस्पताल में जाने को कहा." संयुक्त राष्ट्र के एड्स कार्यक्रम से संबंधित महेश महालिंगम का कहना था कि भारत में एड्स से ग्रस्त व्यक्ति को घृणा की नज़र से देखा जाता है. वे कहते हैं कि पहले ही अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीज़ो के टेस्ट कर लिए जाते हैं. उनका कहना है कि यदि मरीज़ एचआईवी से ग्रस्त पाया जाए तो कई बार तो उसे अस्पताल से बाहर निकाल दिया जाता है. महेश महालिंगम कहते हैं कि भारत में लगभग पचास प्रतिशत लोगों को एड्स के बारे में जानकारी नहीं है और एड्स ग्रस्त रोगियों का सरकारी अस्पतालों में भी ठीक तरह इलाज नहीं होता. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||