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और देखते-देखते वह इस दुनिया को छोड़ गया...
उसे मालूम था कि वह धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ रहा है लेकिन उससे बैठ कर कई घंटों तक बात कर लें तो अहसास ही नहीं होता था कि उसे इस बात की जानकारी भी है. अक्सर मुझे पूछना पड़ता था कि उसकी तबियत अब कैसी है. और जवाब में वह हँसकर कहता था, ''आपको तो मालूम ही है.'' इसी सवाल और जवाब के बीच मैं अपना शहर छोड़कर दिल्ली आ गया लेकिन जब भी वहाँ लौटता तो उससे मुलाक़ात होती और अक्सर इसी सवाल-जवाब पर ख़त्म हो जाती. अचानक एक दिन एक मित्र का फ़ोन आया, ''वह नहीं रहा.'' न उसने नाम बताया न मैंने पूछा, हम दोनों बहुत देर तक ख़ामोश रहे और फिर हमने फ़ोन रख दिया. यह जानने के लिए कि कौन चला गया इससे ज़्यादा कहने की आवश्यकता भी नहीं थी. वह मेरे किसी भी मित्र या परिचित की पहली मौत तो नहीं थी लेकिन इस मौत और किसी दूसरे मौत में बहुत अंतर था. वह मेरे आसपास पहली मौत थी और शायद आख़िरी भी, जिसके पीछे दुनिया की वही भयावह बीमारी थी- एड्स. भरोसा ही नहीं होता था वह एक छोटे से गाँव में अख़बार का संवाददाता था. संवाददाता क्या कहें, था तो वह अख़बार बेचने वाला एजेंट लेकिन अख़बार ने उसे ख़बरें भेजने का काम भी दे रखा था. एक दिन उसकी लिखी ख़बरें संपादक ने देखीं तो उसे बुलवा भेजा. सच उसकी लिखी ख़बरों में धार ही ऐसी थी कि उसे किसी छोटे गाँव में छोड़ देना उसकी प्रतिभा का अपमान होता. उसने साबित भी किया कि उसे गाँव से बुलाने का फ़ैसला ग़लत नहीं था. मानवीय दुख-दर्द की ख़बरें वह इस तरह लिखता था मानों वह उसकी आपबीती हो. लेकिन जीवन को तरतीब से जीना मानों उसके बूते की बात ही नहीं थी. पूरी रात जागकर बिता देना फिर दिन में जो कपड़ा मिल गया उसी को पहनकर घूमते रहना. दाढ़ी बढ़ती रहती फिर एक दिन यूँ अवतरित होता मानों नहा-धोकर नया होकर आ गया हो. छोटी-छोटी बात पर परेशान सा दिखता और फिर थोड़ी ही देर में सामान्य हो जाता. इस बीच उसे प्रेम हो गया. हम सब चकित थे और उससे मज़ाक में पूछते भी कि ऐसी कौन सी लड़की है जो उससे प्रेम कर बैठी. लेकिन वह लड़की थी दीवानी सी. अभी यह प्रेम परवान चढ़ ही रहा था कि अचानक एक हादसा हो गया. लड़की के माँ बाप ने दबाव डालकर लड़की की शादी कहीं और कर दी. सब कुछ बदल गया अभी उसे कुछ समझ में आता कि इसी बीच अख़बार ने आदिवासी इलाक़े से अपना संस्करण शुरु कर दिया और कुछ अच्छे रिपोर्टरों को वहाँ जाने को कहा गया. चार-पाँच महीने या शायद छह महीने हमारी मुलाक़ात किसी आम पत्रकार से एक पाठक की मुलाक़ात जैसी ही होती रही. उसने आदतन वहाँ से भी जानदार ख़बरें भेजीं. मानवीय संवेदनाओं से भरपूर. फिर एक दिन वह लौट आया. वैसा का वैसा. लेकिन मैं ग़लत था. कोई एक महीने बाद उसने एक मित्र को ख़बर दी, ''मुझे एड्स हो गया है.'' और फिर उस मित्र ने यह ख़बर मुझे दी. हम दोनों ही अविश्वास में रहे और सच कहूँ तो एक तरह के सदमे में. कई दिनों तक तो मैं उसे देखता तो एक अजीब सा डर मन में उभर जाता और मैं डर के मारे इधर उधर देखने लगता. धीरे-धीरे मन संभला और एक दिन मैंने उससे पूछा कि आख़िर हुआ क्या था. उसने एकदम सपाट शब्दों में बताया कि अपने प्रेम की असफलता से दुखी जब वह उस आदिवासी इलाक़े में पहुँचा तो परेशानी में उसने जो मिला उसी से शारीरिक संबंध बना लिए. जब लौटने के बाद एक बार बुखार आया तो उतरने का नाम ही नहीं लेता था. तब डॉक्टर ने ख़ून की जाँच करवाने को कहा. रिपोर्ट आई तो सब कुछ बदल चुका था. इस बीच उसकी पुरानी प्रेमिका अपनी शादी के बावजूद उससे मिलती रही थी. थोड़ा बचपना था और बाक़ी दीवानगी. उसने चिंता करते हुए अपनी प्रेमिका के ख़ून की भी जाँच करवाई. तब तक वह बची हुई थी. हमारे बीच एक लिहाज़ का रिश्ता था इसलिए मैं पूछ नहीं पाया कि उनका प्रेम कहाँ तक और कब तक चलता रहा लेकिन मित्र बताते रहे कि वह किसी न किसी रुप में अंत तक जारी था. हालांकि उसने अपनी ओर से एक दूरी बनाए रखी. एक पढ़ा-लिखा और समझदार युवक, जो अपनी लेखनी से लोगों को जाने कितने ख़तरों से आगाह करता रहा, एक दिन ख़ुद एक जानलेवा जंजाल में फँस गया. अब जाकर पता चलता है कि उस जाँच के बाद से जो सात साल उसने एचआईवी के साथ बिताए वे बहुत पीड़ा भरे थे. लेकिन वह आदतन मुस्कराता रहा और लगभग आख़िरी समय तक उसी अख़बार में काम करता रहा. उसकी मौत को अब तीन वर्ष बीत गए हैं लेकिन अब भी उसका चेहरा जब-तब आँखों के आगे घूम जाता है. |
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