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ग़ैर मुस्लिम संगठनों के साथ सहयोग की पहल
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य
बोर्ड के सदस्यों ने ग़ैर मुस्लिम संगठनों से तालमेल की बात कही

भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सामाजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ ग़ैर मुस्लिम संगठनों के साथ मिलकर काम करने का प्रस्ताव पारित किया गया है.

बोर्ड की की मज़लिस-ए-अमला यानी कार्यकारिणी की पटना के पास फुलवारी शरीफ़ में रविवार को हुई एक बैठक में मुस्लिम समाज के अंदरुनी मसलों पर बहस या विवाद की बातें भी उठीं.

लेकिन ज़्यादा चिंता कथित सांप्रदायिक ताक़तों के फिर से सर उठाने और बढ़ रहे उन्माद को लेकर व्यक्त की गई.

बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना राबे हसन नदवी और महासचिव मौलाना निज़ामुद्दीन की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि कुछ राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र सांप्रदायिक आधार पर मतदाताओं के ध्रुवीकरण की ख़ातिर फिर से आक्रामक रवैया अपनाया जा रहा है.

लेकिन इसके अलावा दूसरे गंभीर मसलों पर बोर्ड की कार्यकारिणी ने प्रस्ताव पारित किया.

प्रस्ताव

इनमें प्रमुख है तिलक दहेज़, तलाक और महिलाओं के शोषण जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर करने में ग़ैर मुस्लिम सामाजिक संगठनों से भी सहयोग का साझा मंच बनाया जाए.

 सामाजिक सुधार कमेटी की जो रिपोर्ट आई थी उसमें ख़ासतौर से कहा गया था कि कुछ कार्यक्रम ऐसे हों जिन्हें हिंदू और मुसलमान मिल कर करें. यानी पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य ऐसे कार्यक्रमों में ग़ैर मुस्लिम संगठनों के लोगों को भी बुलाएँ

ज़फ़रयाब जिलानी

बोर्ड के एक सदस्य ज़फ़रयाब जिलानी के अनुसार, "सामाजिक सुधार कमेटी की जो रिपोर्ट आई थी उसमें ख़ासतौर से कहा गया था कि कुछ कार्यक्रम ऐसे हों जिन्हें हिंदू और मुसलमान मिल कर करें."

"यानी पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य ऐसे कार्यक्रमों में ग़ैर मुस्लिम संगठनों के लोगों को भी बुलाएँ."

उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों से न सिर्फ़ दोनों समुदायों की सामाजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ मिलकर लड़ाई लड़ी जा सकेगी बल्कि दोनों समुदायों के बीच अच्छा माहौल भी बनेगा.

बोर्ड की कार्यकारिणी की बैठक में यह स्वीकार किया गया कि इस्लामी क़ानून के तहत औरतों की मर्यादा और ख़ास हैसियत की जो बातें कही गई हैं उनकी जगह आज के मुस्लिम समाज में नहीं है.

लेकिन दूसरी ओर मुस्लिम समाज के दलित तबके की ओर से जो विरोधी स्वर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ख़िलाफ़ ज़ोर पकड़ने लगे हैं उनपर बोर्ड के सदस्य कोई ख़ास टिप्पणी करने से परहेज़ करते नज़र आए.

इस तबके का आरोप है कि इस तरह के नाम वाले मुस्लिम संस्थान उच्च वर्गों के मुसलमानों के हिमायती हैं.

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