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मंगलवार, 14 अक्तूबर, 2003 को 13:30 GMT तक के समाचार
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बदले-बदले हैं मुलायम सिंह यादव

विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के इस बार अयोध्या मार्च को धार नहीं मिल रही है क्योंकि इस बार मुलायम सिंह यादव भी बदले हुए हैं और आम लोग भी वीएचपी की चालों को समझ चुके हैं.

मुलायम सिंह 1991 के बाद लंबा राजनीतिक सफर तय कर चुके हैं और अब वे ज़्यादा परिपक्व नेता बन गए हैं.

इस तरह इस बार वीएचपी का यह आंदोलन सिर्फ़ उसके कार्यकर्ताओं का है और उसमें उन्हें आम लोगों का ज़्यादा समर्थन नहीं मिल रहा है.

प्रधानमंत्री ने विदेश से लौटकर भले ही शिष्टाचार के नाते वीएचपी पर नर्मी दिखाते हुए यह कहा हो कि उस पर भरोसा करना चाहिए लेकिन वे भी कोई ख़तरा नहीं मोल लेना चाहते हैं.

क्योंकि वाजपेयी चार साल तक गठबंधन सरकार चलाने का बढ़चढ़कर दावा कर रहे हैं इसलिए वह उसे मोर्चे पर कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं.

वीएचपी की माँग है कि मौजूदा केंद्र सरकार अयोध्या की विवादित भूमि इसी संसद के कार्यकाल में उन्हें सौंप दे जिससे मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ हो जाए.

भारतीय जनता पार्टी ऐसा कर नहीं सकती क्योंकि सरकार अदालतों के आदेशों से बंधी हुई है और न ही वह गठबंधन को किसी ख़तरे में डालना चाहती है.

वीएचपी इस रुख़ के लिए भाजपा को कोस रही है लेकिन अयोध्या में उसके एकत्र होने से मुलायम सिंह सरकार के साथ उसके फिर से टकराव के आसार बन गए हैं.

गोमती का नुस्ख़ा

 अब मैं गोमती नदी की तरह हो गया हूँ, जहाँ कोई रोड़ा या रुकावट आए, अपना रास्ता बदल दो और बच निकलो

मुलायम सिंह यादव

लेकिन मुलायम सिंह यादव इस मुद्दे पर इस बार कोई टकराव लेने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं नज़र आ रहे हैं और वे बहुत फूँक-फूँक कर क़दम रख रहे हैं और बयान भी बहुत नपे-तुले दे रहे हैं.

इसके लिए उनके ख़ास तौर से दो बयानों का हवाला दिया जाता है.

एक तो यह कि उच्च न्यायालय के आदेश को लागू करना ज़िला प्रशासन का काम है और यह कि वह अब अपनी राजनीतिक रणनीति गोमती की तरह बना चुके हैं.

यानी कि जहाँ अगर कोई रोड़ा या रुकावट आए तो वहाँ से रास्ता बदल दो और निकल चलो.

1991 के मुक़ाबले मुलायम सिंह एक परिपक्व राजनेता बन चुके हैं और यहाँ तक कि इस बार वे कोई चेतावनी भरी भाषा का भी इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं.

यही नहीं, इस बार मोहम्मद आज़म ख़ाँ, अब्दुल्ला बुख़ारी या मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कोई भी चेतावनी का रुख़ नहीं अपना रहा है और इसका अहसास वीएचपी को भी है.

और वीएचपी कह भी रही है कि इन नेताओं के इस नरम रुख़ की वजह से उसके आंदोलन को धार नहीं मिल रही है.

इस बार फ़र्क ये है कि अब बाबरी मस्जिद वहाँ नहीं है. 1991 में बाबरी मस्जिद को एक कलंक के रूप में पेश किया जा रहा था और वह विश्व हिंदू परिषद की आँखों में खटक रही थी.

तब मुलायम सिंह यादव की छवि मुस्लिम हितैषी थी और वह विश्व हिंदू परिषद के ख़िलाफ़ चेतावनी की भाषा का भी इस्तेमाल कर रहे थे जिससे परिषद को व्यापक जनसमर्थन मिला था.

हनुमान गढ़ी

अयोध्या विवाद में केंद्रीय अहमियत रखने वाले हनुमान गढ़ी का भी इस बार वीएचपी को कोई समर्थन नहीं है.

अयोध्या में हिंदू कार्यकर्ता
अयोध्या में कड़ी सुरक्षा है

हनुमान गढ़ी के महंत धर्मदास ने हाई कोर्ट में याचिका दायर करके वीएचपी के अयोध्या मार्च पर पाबंदी लगाने की माँग की थी.

एक अन्य महंत ज्ञानदास मुसलमानों के बीच जाकर यह हिम्मत बँधा रहे हैं कि वीएचपी से घबराने या डरने की कोई ज़रूरत नहीं है.

वीएचपी को रामचंद्र परमहंसदास का भी समर्थन हासिल रहता था जो अब नहीं है और इस बार जो लोग अयोध्या का रूख़ कर रहे हैं वे सिर्फ़ वीएचपी के ही कार्यकर्ता हैं उनमें आम लोग नहीं हैं.

कुल मिलाकर स्थिति यह है कि वीएचपी के लिए 1991 और आज के हालात में ज़मीन आसमान का फ़र्क है.

जहाँ तक मुलायम सिंह का सवाल है तो वह इस बार मुसलमान हितैषी या वीएचपी विरोधी की छवि से बच रहे हैं.

वे अच्छी तरह समझ रहे हैं कि अगर वीएचपी पर कोई सख़्ती की गई तो उसे गुजरात की तरह हिंदुओं को लामबंद करने का मौक़ा मिल सकता है जो मुलायम को राजनीतिक नुक़सान दे सकता है.

मुलायम सिंह इस बार यही दिखा रहे हैं कि वे इस पूरे मामले में सिर्फ़ क़ानून और अदालत के आदेश लागू करेंगे.

वैसे भी भारतीय जनता पार्टी के नेता विनय कटियार कह चुके हैं कि अगर वीएचपी के कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया जाता है तो उससे उनकी पार्टी को फ़ायदा होगा.

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