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रविवार, 12 अक्तूबर, 2003 को 10:20 GMT तक के समाचार
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परवेज़ मुशर्रफ़ ने सिलसिला आगे बढ़ाया है

पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़
सैनिक बग़ावत के ज़रिए सत्ता हासिल की

पाकिस्तान की ज़मीन कम से कम इस नज़र से बहुत बड़े दिल वाली है कि यह लूले लंगड़े ‘लोकतंत्रों’ की लाशों को अपने दामन में एकदम पनाह दे देती है.

अगर किसी को संदेह हो तो इस्लमाबाद में लोकतंत्र के क़ब्रिस्तान का इतिहास उठाकर देख लें.

देखने वाले को अगर कराची में जरनल अय्यूब ख़ान लोकतंत्र का मक़बरा बनाते नज़र आएंगे तो इस्लामाबाद में जरनल ज़ियाउल हक़ भुट्टो का लोकतंत्र दफ़नाते दिखाई देंगे.

किसी जगह जुनेजो के लोकतंत्र की क़ब्र भी मिल जाएगी.

और पिछली सदी के आख़िरी दशक में तो बेनज़ीर और नवाज़ शरीफ़ के ‘लोकतंत्रों’ का अंतिम संस्कार तो एक से ज़्यादा बार हुआ है और क़ब्र खोदने वालों का काम फौजी वर्दी पहने बिना भी अदा किया गया.

हालाँकि लोकतंत्र के इन जनाज़ों की धूम उसी वक़्त ज़्यादा होती है जब यह मालूम हो कि ‘हताहत’ यानी लोकतंत्र का लहू किसी फ़ौजी के हाथ में.

इतिहास

पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास के पन्नों में यूँ तो लोकतंत्र की हत्या होने के कई मामले मिल जाएंगे लेकिन आख़िरी बार यह हादसा चार साल पहले यानी 12 अक्तूबर 1999 की शाम पेश आया.

क्लोनिंग और सरकार

 मौजूदा हूकूमत तो क्लोनिंग की प्रक्रिया से वजूद में आई है. ख़त्म करनी भी पड़ी तो नई क्लोनिंग हो जाएगी.

वैसे भी जब तक जनरल मुशर्रफ़ पाकिस्तान के प्रशासक और नियंत्रक हैं, लोकतंत्र को क्या ख़तरा हो सकता है!

लूला लंगड़ा लोकतंत्र तो वह कब का दफ़ना चुके हैं. रह गई मौजूदा हूकूमत तो इसकी कोई समस्या ही नहीं है क्योंकि ये क्लोनिंग की प्रक्रिया से वजूद में आई है. ख़त्म भी करनी पड़ी तो नई क्लोनिंग हो जाएगी.

यूँ भी नया नारा तो यही है कि पहले लोकतंत्र नहीं, पहले पाकिस्तान है.

मगर पाकिस्तान के संस्थापक को जाने क्या सूझी जो उन्होंने एक नए मुल्क के लिए लोकतंत्र को पसंद किया, उनकी जगह अगर जनरल अय्यूब ख़ान या जनरल ज़ियाउल हक या फिर परवेज़ मुशर्रफ़ होते तो बेचारा पाकिस्तनान शायद लोकतंत्र की हत्याओं के दर्द में मुब्तिला ही ना होता.

लेकिन ज़्यादा ख़राबी फिर भी नहीं हुई. जनरल अय्यूब ख़ान ने जिस नई व्यवस्था की बुनियाद डाली थी उनके असली उत्तराधिकारियों ने उसे कम से कम अब तक तो बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ परवान चढ़ाया है.

सिलसिला

जनरल याहया ख़ान को मोहलत नहीं मिली वरना उस सिलसिले में कोई रुकावट ही नहीं पड़ती जो जनरल अय्यूब ख़ान से शुरू हुआ था.

भला हो जनरल ज़ियाउल हक़ का जिन्होंने हालात को सँभाला और 11 वर्ष तक ख़ूब संभाला. वो गए तो पाकिस्तान में सत्ता की धुरी का संतुलन बिगड़ गया और 11 साल तक बिगड़ा ही रहा.

जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने सिलसिला फिर वहीं से जोड़ दिया जहाँ से टूटा था.

सत्ता की धुरी का संतुलन दुरुस्त करने वालों में थोड़ा बहुत मतभेद तो होता ही है लेकिन जब बात उसूल की हो तो सबकी ऊर्जा एक ही तरह से इस्तेमाल होती है.

और इस पर तुर्रा ये कि उन्हें माहौल भी एक सा मिल जाता है.

जनरल अय्यूब ख़ान की बदक़िस्मती कहिए कि उनके ज़माने में अफ़ग़ानिस्तान की अहमियत कम थी, हालाँकि अमरीकी हित तब भी थे. लेकिन जनरल ज़ियाउल हक़ के दौर में अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन ने पाकिस्तानी फौज के साथ अपनी मोहब्बत का इज़हार किया.

उनके बाद जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ आए. शुरु में उनके लिए हालात ज़्यादा उपयुक्त नहीं थे लेकिन फिर अफ़ग़ानिस्तान की सरज़मीन से ही पाकिस्तानी फौज के साथ तालमेल बिठाने की एक लहर उठी, अमरीका पर 11 सितंबर के हमले हुए और जनरल मुशर्रफ़ का सितारा बुलंदी पर चढ़ता रहा.

जनरल ज़ियाउल हक़ ने अमरीका के कहने पर अफ़ग़ानिस्तान से रूसियों को निकालने का कर्तव्य निभाया था और जनरल मुशर्रफ़ ने वहाँ से तालेबान का निशान मिटाने की अमरीकी ख़्वाहिश के सामने सिर झुका दिया जिससे उन्हें पश्चिमी दुनिया में लोकप्रियता की गारंटी भी मिल गई.

अमरीकी हित

इस तरह अगर अतीत में ज़ियाउल हक़ अमरीकी आँख का तारा थे तो अब मुशर्रफ़ अमरीकी दिल की धड़कन बन चुके हैं. अमरीकी सत्ता गलियारों में पहले अगर जनरल हक़ की सुनवाई होती थी तो आज वहाँ मुशर्रफ़ की गूँज होती है.

जनरल ज़ियाउल हक़ और परवेज़ मुशर्रफ़ में एक ख़ास समानता ये भी है कि इन दोनों पाकिस्तानियों का ताल्लुक़ उन इलाक़ों से है जो अब भारत का हिस्सा है. जनरल ज़ियाउल हक़ जालंधर के बताए जाते हैं और मुशर्रफ़ दिल्ली के कहलाते हैं.

हक़ के बेटे भी कुछ कारणों से मुल्क से दूर गए थे और मुशर्रफ़ के साहबज़ादे भी वतन के नज़दीक नहीं हैं.

हक़ के सर पर इस्लाम फ़ैलाने का भूत सवार था तो मुशर्रफ़ के कंधों पर डूबते हुए पाकिस्तान को बचाने का भार है.

हक़ को भी भी लूला लंगड़ा लोकतंत्र एक आँख नहीं भाता था और मुशर्रफ़ को भी यह पसंद नहीं आता.

हक़ की अक्लमंदी ने एमआरडी को सताकर रखा हुआ था तो मुशर्रफ़ की चालाकी ने अब एआरडी को दबा कर रखा हुआ है.

अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ बात हक़ को भी गवारा नहीं होती थी तो विरोध मुशर्रफ़ को भी भी पसंद नहीं है.

देख लीजिए, संविधान की बहाली के लिए शोर मचा-मचाकर विपक्ष का गला दुःख गया है, सरकारी सतह पर पाकिस्तान में अमरीकी हितों का संरक्षण करने के ख़िलाफ़ नारे बुलंद हो रहे हैं, लूला लँगड़ा विपक्ष, लीगल फ्रेमवर्क यानी एलएफ़ओ को ख़त्म करने की माँग किए जा रहा है, विधानसभाओं में ‘नो मुशर्रफ़ नो’ की गूंज है लेकिन मुशर्रफ़ अपनी वर्दी संभाले उसी इस्लामाबाद में सल्तनत की बागडोर पकड़े बड़ी शान के साथ बैठे हुए हैं जो लोकतंत्र की कई क़ब्रों से आबाद है.

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