महिलाओं के लिए हिजाब पहनने और न पहनने की आज़ादी के क्या मायने हैं.
इमेज कैप्शन, अज़रबैजानी कलाकार अलेक्जेंद्रा क्रेमर-खोमासोरद्ज़े ने 'फ़ेसेज़ ऑफ़ फ्रीडम' (आज़ादी के चेहरे) शृंखला के तहत कई तस्वीरें खींची. उन्होंने इस शृंखला के तहत दुनियाभर की 50 महिलाओं की तस्वीरें खींची. इन महिलाओं में अलग-अलग देशों, पृष्ठभूमियों और पेशों की महिलाएँ शामिल हैं. शृंखला में हर महिला की तस्वीर हिजाब और बग़ैर हिजाब के ली गई. (तस्वीर में- रुहा, स्टाइलइस्ट)
इमेज कैप्शन, क्रेमर बताती हैं कि उन्हें इस प्रोजेक्ट की प्रेरणा अपनी 2011 की बाखू यात्रा से मिली. वो कहती हैं, "22 साल पहले जब मैंने अज़रबैजान छोड़ा तो वहाँ हिजाब का प्रचलन कम हो रहा था, ख़ासकर युवतियों में जो जींस और मिनी स्कर्ट पहनना पसंद करती हैं. उनकी पसंद से पता चलता है कि वो एक नई बहुलतावादी संस्कृति को अपना रही हैं." (तस्वीर में- जूलिया)
इमेज कैप्शन, क्रेमर कहती हैं, "जब मैं 22 साल बाद अज़रबैजान वापस आई तो यह देखकर हैरान हो गई कि युवा अज़रबैजानी महिलाओं ने फिर से हिजाब पहनना शुरू कर दिया है. मुझे लगा कि मैं एक नए बाख़ू को देख रही हूँ, जहाँ आज़ादी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है." (तस्वीर में- फराह, कला दीर्घा की मालकिन)
इमेज कैप्शन, क्रेमर कहती हैं, "फेसेज़ ऑफ़ फ्रीडम के तहत मेरा इरादा हिजाब पहनने और हिजाब न पहनने की आज़ादी को समझने का था." (फ़ोटो- मरीना, वेब डिज़ाइनर)
इमेज कैप्शन, हिजाब एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है घूंघट. पश्चिमी देशों में सबसे अधिक प्रचलित है चौकोर स्कार्फ़ जिसमें सिर और गला ढंका रहता है लेकिन चेहरा पूरा दिखता है. नक़ाब उस हिजाब को कहते जिसमें बस आंखें दिखती हैं. इसमें आंखों के लिए अलग पर्दे का प्रयोग किया जा सकता है, जिसे हेडस्कार्फ़ के साथ पहना जा सकता है. (तस्वीर में- लोरी, होटल मैनेजर)
इमेज कैप्शन, सभी इस्लामी हिजाबों में बुर्का में शरीर सबसे ज़्यादा ढंका रहता है. इसमें महिला का पूरा शरीर और आंखें ढंकी रहती हैं. आंखों के ऊपर एक जालीदार पर्दा होता है जो देखने का काम आता है. (तस्वीर में- एंजी अनास्तासिया, समाजशास्त्र की छात्रा)
इमेज कैप्शन, क्रेमर बताती हैं कि इस शृंखला के लिए तस्वीरें लेना काफ़ी कठिन था. वो कहती हैं, "मेरे स्टूडियो से जाने के बाद हर किसी में एक स्थायी बदलाव आ गया था. जिनकी मैंने तस्वीरें खींची उनमें भी और मुझमें भी. मेरे लिए मॉडलिंग करने वाली कुछ महिलाएं रो पड़ीं. कुछ तो बिल्कुल ही हिजाब नहीं पहनना चाहती थीं, उनका कहना था कि वो इस बारे में किसी दिन सोचेंगी. वहीं कुछ महिलाएं जो हिजाब पहनकर आईं थीं उन्होंने हिजाब उतारने से मना कर दिया." (तस्वीर में- स्वेतलाना, ग्रास हॉकी टीम की गोलकीपर)
इमेज कैप्शन, क्रेमर कहती हैं, "मेरी कुछ मॉडलों ने रोते हुए कहा कि वो कभी हिजाब नहीं पहनेंगी. कुछ ने ठीक उल्टी बात कही, और कहा कि वो हमेशा हिजाब पहनेंगी." (लजाल्जा, एनॉटमी की प्रोफ़ेसर)
इमेज कैप्शन, अलेक्जेंद्रा क्रेमर का जन्म मॉस्को में हुआ था, उनका परिवार की जड़ें अज़रबैजान, जॉर्जिया और रूस मूल की हैं. उन्होंने अपनी युवास्था का ज़्यादातर समय अज़रबैजान की राजधानी बाखू में बिताया है. वो इसे ही अपना मूल निवास मानती हैं. (तस्वीर में- मैरी फ्रैंक्वा, असिस्टेंट मैनेजर)
इमेज कैप्शन, 'फ़ेसेज़ ऑफ़ फ्रीडम' शृंखला की तस्वीरें एशिया हाउस, लंदन में तीन फ़रवरी, 2015 से बूटा फ़ेस्टिवल के तहत पेश की जाएंगी. इस फ़ेस्टिवल में अज़रबैजानी कला और संस्कृति को प्रदर्शित किया जाता है. (तस्वीर में- उलविया, संगीतकार)