सपेरों के गांव में है ज़िंदगी बेहाल

सांपों को रखने पर सख्ती से प्रतिबंध लगाने के बाद नोएडा के बिसरख गांव में सपेरे बरोजगार हो गए हैं. यहां सपेरों की 14 बस्तियां है.

सपेरें, बिसरख गांव
इमेज कैप्शन, राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के बिसरख गांव के रहने वाले सूरज नाथ बताते हैं कि सपेरों और सांपो का साथ तो सदियों से है और यही उनकी रोजी रोटी का साधन था.
सपेरें, बिसरख गांव
इमेज कैप्शन, भुट्टू नाथ बताते हैं कि वे शादियों में बीन बजाते हैं पर वो काम भी साल में दो-चार दिन ही मिलता है, जिसमें परिवार पालना मुश्किल हो गया है. भारत में वाइल्ड लाइफ प्रिवेंशन एक्ट (1972) के तहत सांपों को पालना अपराध है. इस नियम को सपेरों के ऊपर 2011 से सख्ती से लागू किया गया है.
बिसरख गांव
इमेज कैप्शन, इन बस्तियों के पास एक सरकारी स्कूल है पर वहां बच्चे भी पढ़ाई से ज्यादा खाना खाने ही जाते हैं.
बिसरख गांव
इमेज कैप्शन, कृपाल नाथ बीन बजाना अपने बच्चे को सिखाना चाहते हैं लेकिन कहतें है कि अब इसे सिखाने का कोई फायदा नहीं है और बच्चों की भी सीखने में कोई रूचि नहीं है.
सपेरें, बिसरख गांव
इमेज कैप्शन, सूरज नाथ ने अपने पिता से ही सांप को पकड़ने की कला सीखी थी. वो भी ये काम करते थे पर अब कहीं आस-पास सांप निकलने पर वे उनको पकड़ने चले जाते हैं.
अजहरी देवी, बिसरख गांव
इमेज कैप्शन, अजहरी देवी बताती है कि घर चलाने के लिए अब पैसे कम पड़ते हैं पहले की कमाई ज़्यादा हुआ करती थी.
सपेरें, बिसरख गांव
इमेज कैप्शन, ज्यादातर गाँव के बुज़ुर्ग़ अब घर पर ही रहते हैं. वे कहते हैं कि अब तो नागपंचमी को भी सांपों की पूजा करना मुश्किल हो गया है.
सपेरों का वाद्ययंत्र, बिसरख गांव
इमेज कैप्शन, सपेरों का वाद्ययंत्र तूमा भी होता था, अब ये भी अब प्रचलन में नहीं रहा.
सपेरे, बिसरख गांव
इमेज कैप्शन, किशोरी बाग कहते हैं कि सरकार ने सपेरों के पुनर्वास के लिए कोई काम नहीं किया. उनके हालात अब दिनों दिन ख़राब होते जा रहे हैं.
बिसरख गांव के बच्चे
इमेज कैप्शन, बच्चों के लिए बीन अब सिर्फ खेलने का साधन है और नई पीढ़ी में इसे बजाने का कोई रुझान नहीं है.
सपेरें, बिसरख गांव
इमेज कैप्शन, दिल्ली के निकट होने से उनपर प्रतिबंध का असर ज़्यादा हुआ है लेकिन गावों में आज भी लोग सांप का खेल दिखाते हैं. (सभी तस्वीरें और कैप्शनः फोटो पत्रकार अंकित पांडे)