मैला ढोने वालों की दुर्दशा

भारत में सिर पर मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध है लेकिन इसके बावजूद इसका चलन जारी है. तस्वीरों में देखिए इस काम में लगे लोगों का हाल.

मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी रिपोर्ट में भारत सरकार से सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने को कहा है. उत्तर प्रदेश के कसेला गांव की गंगाश्री जैसी महिलाएं शौचालयों से मैला उठाती हैं जबकि उनके पुरुष सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफ़ाई करते हैं.
इमेज कैप्शन, मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी रिपोर्ट में भारत सरकार से सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने को कहा है. उत्तर प्रदेश के कसेला गांव की गंगाश्री जैसी महिलाएं शौचालयों से मैला उठाती हैं जबकि उनके पुरुष सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफ़ाई करते हैं.
कसेला गांव में मैला ढोने की प्रथा सदियों से चली आ रही है और इस काम में लगे लोगों को अब भी अछूत माना जाता है. इस तस्वीर में एक महिला मैला उठाने के लिए घर के पिछले दरवाजे से घुस रही है.
इमेज कैप्शन, कसेला गांव में मैला ढोने की प्रथा सदियों से चली आ रही है और इस काम में लगे लोगों को अब भी अछूत माना जाता है. इस तस्वीर में एक महिला मैला उठाने के लिए घर के पिछले दरवाजे से घुस रही है.
उत्तर प्रदेश के मैनपुरी ज़िले में रहने वाली मनीषा हर दिन 20 घरों में शौचालय साफ़ करती हैं. वह कहती हैं, "मैं शौचालय में जमा मैले को हटाने के लिए टिन की एक प्लेट और झाड़ू का इस्तेमाल करती हूं. मैं मैले को टोकरी में जमा करती हूं और फिर इसे फेंकने के लिए ले जाती हूं."
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यूपी के ही एटा ज़िले की मुन्नीदेवी का कहना है कि उन्हें इस काम के लिए कोई पैसा नहीं मिलता है. उन्होंने कहा, "कभी वे मुझे दो रोटी देते हैं और कभी एक. एक घर से तो मुझे दो-तीन दिन से कुछ भी नहीं मिला तो मैंने वहां जाना छोड़ दिया. जब वे मुझे कुछ भी नहीं देते हैं तो मैं वहां क्यों जाऊं? उन्होंने आकर मुझे धमकी दी कि अगर तुम नहीं आई तो हम तुम्हें अपनी ज़मीन पर नहीं रहने देंगे. तुम्हें अपने जानवरों के लिए चारा कहां से मिलेगा. तुम्हारी भैंसें के मालिक हम हैं. मुझे जाना पड़ा क्योंकि मेरे पास कोई चारा नहीं था."
इमेज कैप्शन, यूपी के ही एटा ज़िले की मुन्नीदेवी का कहना है कि उन्हें इस काम के लिए कोई पैसा नहीं मिलता है. उन्होंने कहा, "कभी वे मुझे दो रोटी देते हैं और कभी एक. एक घर से तो मुझे दो-तीन दिन से कुछ भी नहीं मिला तो मैंने वहां जाना छोड़ दिया. जब वे मुझे कुछ भी नहीं देते हैं तो मैं वहां क्यों जाऊं? उन्होंने आकर मुझे धमकी दी कि अगर तुम नहीं आई तो हम तुम्हें अपनी ज़मीन पर नहीं रहने देंगे. तुम्हें अपने जानवरों के लिए चारा कहां से मिलेगा. तुम्हारी भैंसें के मालिक हम हैं. मुझे जाना पड़ा क्योंकि मेरे पास कोई चारा नहीं था."
महाराष्ट्र के धूले ज़िले के अनिल कहते हैं, "पंचायत ने पानी की आपूर्ति करने वाले, चपरासी, बाबू, कूड़ा इकट्ठा करने वालों को काम पर रखा है और मेरा काम शौचालय साफ करना है. अगर आप नीची जाति के हैं तो आपको यह काम करना पड़ेगा. आपको सीधे तौर पर ऐसा नहीं कहा जाता है लेकिन आपको इसी काम के लिए रखा जाता है और यही काम करने की अपेक्षा की जाती है. अगर कहीं मैला पड़ा होगा तो वे आकर हमें ही उसे साफ करने के लिए कहेंगे."
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राजूबाई कहती हैं, "शौचालयों की सफाई के लिए पंचायत हमें हमारे पैतृक गांव से यहां लाई है. मैं सारा मैला जमा करती हूं और उसे अन्य जगह फेंकती हूं. हम घर वापस जाना चाहती हूं. हमें यहां रहना पसंद नहीं है. इस काम से मेरा स्वास्थ्य ख़राब रहता है. मैं बहुत कम खाती हूं. यह बहुत गंदा काम है. लेकिन लोग कहते हैं कि पंचायत हमें यहां से जाने नहीं देगी और यही कारण है कि हमें पूरी पगार नहीं दी जा रही है."
इमेज कैप्शन, राजूबाई कहती हैं, "शौचालयों की सफाई के लिए पंचायत हमें हमारे पैतृक गांव से यहां लाई है. मैं सारा मैला जमा करती हूं और उसे अन्य जगह फेंकती हूं. हम घर वापस जाना चाहती हूं. हमें यहां रहना पसंद नहीं है. इस काम से मेरा स्वास्थ्य ख़राब रहता है. मैं बहुत कम खाती हूं. यह बहुत गंदा काम है. लेकिन लोग कहते हैं कि पंचायत हमें यहां से जाने नहीं देगी और यही कारण है कि हमें पूरी पगार नहीं दी जा रही है."
गैर सरकारी संगठन जन साहस द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रीय गरिमा अभियान के तहत मध्य प्रदेश में मैला ढोने वाले 1,100 लोगों को इससे मुक्त कराया गया है. देवास ज़िले की सेवंती कहती हैं, "वे कहते हैं कि मैं इस काम को छोड़ सकती हूं क्योंकि क़ानूनन इस पर प्रतिबंध है. पहले हमसे कहा गया था कि हमें यह करना ही करना है. ऐसा कोई नहीं था जो हमें बताता कि हमें यह करने की ज़रूरत नहीं है."
इमेज कैप्शन, गैर सरकारी संगठन जन साहस द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रीय गरिमा अभियान के तहत मध्य प्रदेश में मैला ढोने वाले 1,100 लोगों को इससे मुक्त कराया गया है. देवास ज़िले की सेवंती कहती हैं, "वे कहते हैं कि मैं इस काम को छोड़ सकती हूं क्योंकि क़ानूनन इस पर प्रतिबंध है. पहले हमसे कहा गया था कि हमें यह करना ही करना है. ऐसा कोई नहीं था जो हमें बताता कि हमें यह करने की ज़रूरत नहीं है."
रेखाबाई कहती हैं कि जब उन्होंने यह काम छोड़ा तो उन्हें धमकी दी गई. उन्होंने कहा, "उसने कहा कि अब अगर तुम मेरे खेत में आई तो मैं तुम्हारे दोनों पांव काट दूंगा."
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मध्य प्रदेश के उज्जैन ज़िले की साहिना कहती हैं, "खाना खाते समय स्कूल में मुझे अलग बिठा दिया जाता था. इससे आज़िज़ आकर मैंने अपना खाना फेंक दिया. इसके ख़िलाफ़ बोलने पर मेरे नंबर काट दिए गए. मैंने अपने शिक्षक से कहा कि अगर मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया गया तो मैं स्कूल नहीं आऊंगी." लेकिन साहिना के साथ दुर्व्यवहार होता रहा और उन्होंने स्कूल छोड़ दिया.
इमेज कैप्शन, मध्य प्रदेश के उज्जैन ज़िले की साहिना कहती हैं, "खाना खाते समय स्कूल में मुझे अलग बिठा दिया जाता था. इससे आज़िज़ आकर मैंने अपना खाना फेंक दिया. इसके ख़िलाफ़ बोलने पर मेरे नंबर काट दिए गए. मैंने अपने शिक्षक से कहा कि अगर मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया गया तो मैं स्कूल नहीं आऊंगी." लेकिन साहिना के साथ दुर्व्यवहार होता रहा और उन्होंने स्कूल छोड़ दिया.
राहुल भी इसी समुदाय से आते हैं. उनका कहना है कि ऊंची जाति के एक लड़के के कटोरे को छूने पर उनकी पिटाई की गई. उन्होंने कहा, "दुर्घटनावश ऐसा हो गया था. वह लड़का शिक्षक के पास गया और इस बारे में उन्हें बताया. शिक्षक ने मुझे बुलाया और मेरी पीठ पर पांच बार डंडे से प्रहार किया. हर बार पीटने पर वह कहते थे तुम्हें इसे छूने की इजाजत नहीं है. अगर तुमने दोबारा ऐसा किया तो मैं फिर तुम्हारी पिटाई करूंगा."
इमेज कैप्शन, राहुल भी इसी समुदाय से आते हैं. उनका कहना है कि ऊंची जाति के एक लड़के के कटोरे को छूने पर उनकी पिटाई की गई. उन्होंने कहा, "दुर्घटनावश ऐसा हो गया था. वह लड़का शिक्षक के पास गया और इस बारे में उन्हें बताया. शिक्षक ने मुझे बुलाया और मेरी पीठ पर पांच बार डंडे से प्रहार किया. हर बार पीटने पर वह कहते थे तुम्हें इसे छूने की इजाजत नहीं है. अगर तुमने दोबारा ऐसा किया तो मैं फिर तुम्हारी पिटाई करूंगा."
राष्ट्रीय गरिमा अभियान के संस्थापक और संयोजक आसिफ़ शेख कहते हैं, "सिर पर मैला ढोना किसी तरह का रोज़गार नहीं है बल्कि यह एक तरह की ग़ुलामी है. यह दलितों पर एक तरह का अत्याचार है और मानवाधिकारों का उल्लंघन है."
इमेज कैप्शन, राष्ट्रीय गरिमा अभियान के संस्थापक और संयोजक आसिफ़ शेख कहते हैं, "सिर पर मैला ढोना किसी तरह का रोज़गार नहीं है बल्कि यह एक तरह की ग़ुलामी है. यह दलितों पर एक तरह का अत्याचार है और मानवाधिकारों का उल्लंघन है."
मैला ढोने का काम कर चुकी सेनाज्बी को राष्ट्रीय गरिमा अभियान के कारण 2008 में इससे मुक्ति मिली. वह कहती हैं, "साल 2010 में मैं सुरक्षित सीट से पंचायत के लिए चुनी गई. मैंने अपने इलाक़े में समुचित नहरें और सड़कें बनवाई."
इमेज कैप्शन, मैला ढोने का काम कर चुकी सेनाज्बी को राष्ट्रीय गरिमा अभियान के कारण 2008 में इससे मुक्ति मिली. वह कहती हैं, "साल 2010 में मैं सुरक्षित सीट से पंचायत के लिए चुनी गई. मैंने अपने इलाक़े में समुचित नहरें और सड़कें बनवाई."
ममता कहती हैं, "मैला ढोने की प्रथा छोड़ने के दस साल बाद हमारे पास इस तालाब में सामूहिक रूप से मछली पालने का सरकारी ठेका है. हमारा एक संयुक्त बैंक खाता है जहां हम मछली बेचकर हुई कमाई को जमा कराते हैं. इन पैसों का इस्तेमाल हम मछली के बीज खरीदने और मजदूरी देने में करते हैं."
इमेज कैप्शन, ममता कहती हैं, "मैला ढोने की प्रथा छोड़ने के दस साल बाद हमारे पास इस तालाब में सामूहिक रूप से मछली पालने का सरकारी ठेका है. हमारा एक संयुक्त बैंक खाता है जहां हम मछली बेचकर हुई कमाई को जमा कराते हैं. इन पैसों का इस्तेमाल हम मछली के बीज खरीदने और मजदूरी देने में करते हैं."