युद्ध के परिणाम पर काम करने वाले फ़ोटोग्राफ़रों ने दुनिया भर के शरणार्थियों की कहानी तस्वीरों के ज़रिए बयां की.
इमेज कैप्शन, संयुक्त राष्ट्र संघ का कहना है, "रोहिंग्या समाज के लोग जो पश्चिम बर्मा या म्यांमार में रहते हैं, दुनिया के सबसे सताए गए अल्पसंख्यक हैं. फोटोग्राफ़र सैफुल हक़ ओमी कहते हैं, रोहिंग्या शरणार्थी जॉन के कहे शब्दों ने मेरे कदम पीछे धकेल दिए. "आप नाफ़ नदी पार कीजिए और वहीं नदी किनारे मेरा घर है. यहां से केवल दो मील दूर, लेकिन मेरे लिए यह लाखों मील दूर है. यह दूरी मैं कभी तय नहीं कर पाऊंगा. मेरी मां वहां हैं, मेरा घर वहां है. यह आपके जैसे किसी व्यक्ति के लिए नज़दीक है, जिसके पास पासपोर्ट है और जो कहीं भी जा सकता है जहां वह चाहे."
इमेज कैप्शन, फ़ोटोग्राफ़र साम फ़ेलेप्स कहते हैं, "मैं सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक के शहर बोसानगोवा में लगे कैंप में शामियाने के फर्श पर दुबककर बैठा था, जहां एक 70 वर्षीय महिला ने शरण ले रखी थी. वह अपने सामान के साथ रोते हुए बातें कर रही थी. इस सामान को हफ़्तों पहले बलाका विरोधी चरमपंथियों की कार्रवाई के दौरान उन्होंने किसी तरह बचा लिया था."
इमेज कैप्शन, अमरीकन फ़ोटोपत्रकार लीनसी अडारियो कहते हैं, "कैंप की ख़ामोशी को संगीत की लहर तोड़ रही है और 16 साल की युसरा के घर में कुछ प्रफुल्लित लड़कियां और महिलाएं हवा में अपनी हथेलियां उछालकर पूरे कमरे में थिरककर शादी का जश्न मना रही हैं. तक़रीबन एक साल तक तुर्की, लेबनन, जॉर्डन, इराक़ और सीरिया के भीतर विस्थापित शरणार्थियों को कवर करने के बाद आख़िर मैंने ख़ुशी के कुछ पल देखे. कुछ घंटे मैं सोचती रही कि उनकी ज़िंदगी उनके अपने घरों में कैसी हो सकती थी."
इमेज कैप्शन, फ़ोटोग्राफ़र फ्रेडरिक नोए कहते हैं, "कुछ हफ़्ते पहले मैं कैमरून से आए शरणार्थियों की तस्वीरें लेने गया था, जो अपने देश में हिंसा से त्रस्त होकर भागे थे. इन तस्वीरों में से शरणार्थियों की गंभीर हालत को दर्शाने के लिए मैंने यह तस्वीर चुनी. इसमें एक सेंट्रल अफ़्रीका का बच्चा चटाई पर सोया है, जो देखने में भूख से पीड़ित लगता है पर दुबला पतला होने के बावजूद सुंदर लगता है. इस तस्वीर को शब्दों में बयान करना मुश्किल है- सेंट्रल अफ़्रीका में संघर्ष के दौरान हिंसा, निर्वासन, जीने की इच्छा, उसके कमजोर शरीर में गहराई तक समाई हुई है."
इमेज कैप्शन, 'ढेरों' टैटू वाले ब्रिटिश फ़ोटोग्राफ़र सेबास्टियन रिक कहते हैं, "दक्षिणी सूडान के माबान काउंटी में एक कैंप में जब मैं रोज़मर्रा की ज़िंदगी की तस्वीरें ले रहा था, तो एक सात साल की लड़की मेरा पीछा कर रही थी. जब-तब एक छोटा सा गर्म हाथ मेरी कलाई को पकड़ लेता. मैंने उसकी ओर नीचे देखा, तो वह बड़ी लालसा से उड़ती हुई तितलियों वाले टैटू को देख रही थी. मेरे अनुवादक मोहम्मद ने मुझसे कहा, "वह कह रही है कि कैंप में बहुत गंदगी है इसलिए वह आपकी बांहों से तितलियां उड़ाना चाहती है और उन्हें अपने जेब में रखना चाहती है.ताकि उसके पंख गंदे न हों."
इमेज कैप्शन, एंड्रयू मैककनेल ने 102 वर्षीय सीरियाई शरणार्थी सादा की फोटो खींची है. वे कहते हैं, "सादा एक ज़िंदादिल महिला है. उसने कम उम्र में ही अपने 10 बच्चों में से सात को खो दिया है, 13 साल पहले अपने पति को भी खो दिया और अब देश भी. जब उनके घर के पास बम विस्फोट शुरू हुए तो भी वे अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के काम निबटा रही थीं. वे कहती है, "मैं बाहर बैठी जैतून की छंटाई कर रही थीं और विमान मेरे ऊपर से गुज़र रहा था. घर वाले अंदर आने के लिए चिल्लाए पर मैंने उनसे पूछा, क्यों? विमान को मुझसे कोई मतलब नहीं है. मैं जैतून लेकर उनके साथ लड़ने नहीं जा रही हूं.''
इमेज कैप्शन, ब्रिटिश फ़ोटोपत्रकार जैसन टैनर कहते हैं, "मुझे लगता है अपने दो साल के अभियान का सबसे बेहतर हिस्सा मैंने तब गुज़ारा, जब मैंने संघर्ष में हुई यौन हिंसा की तस्वीरें लीं. किसी की पहचान छिपाते हुए 'गुमनाम' तस्वीरें लेना किसी फ़ोटोग्राफ़र के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. मारिया (बदला हुआ नाम) का दर्दनाक बयान और साक्षात्कार की परिस्थितियों ने मुझे फ़ोटोग्राफ़र की ज़िम्मेदारी और दायित्व का बोध करवाया जिन्होंने हमें विश्वास, जोखिम और बहादुरी दिखाई है."
इमेज कैप्शन, बुर्किना फ़ासो में संयुक्त राष्ट्र राजदूत के काम के सिलसिले में गए हेलेन कॉक्स कहते हैं, "मैं इस माहौल में फ़ोटोग्राफ़ी छोड़ने वाला था और एक शरणार्थी के झोपड़ी में मेहमाननवाज़ी का आनंद लेने जा रहा था तभी मुझे मेरे सामने धूल भरी आंधी में खड़ी ये छोटी सी लड़की दिखी. मुझे बाद में पता चला कि उसका नाम असाफ़ा था और वह छह साल की थी. वह अपने परिवार के साथ नज़दीक के मेनटाओ कैंप से डैम्बा कैंप आई है. वह स्कूल जाना चाहती है. वह कहती है, "मैं टीचर बनना चाहती हूं और दोबारा अपने घर माली जाना चाहती हूं."
इमेज कैप्शन, फ़ोटोग्राफ़र एवेलिन हॉकस्टीन का कहना है, "नाइमा के चाचा को इथोपिया में ओरोमो आंदोलन में शामिल होने के कारण मार दिया गया था. उनके माता-पिता राजनीतिक शरणार्थी के रूप में केन्या और वहां से कैलिफ़ोर्निया चले गए. आज नाइमा (अपने बेटे के साथ तस्वीर में) समाज सेवक के रूप में अटलांटा के आईआरसी( अंतरराष्ट्रीय बचाव समिति) में काम करती हैं. उन्होंने कहा, "मैं अपने ग्राहकों के बीच काम करने में आनंद लेती हूं. मैं उनमें अपने माता-पिता और ख़ुद को देखती हूं." नाइमा की योजना महिलाओं को स्वास्थ्य और शरणार्थी महिलाओं को सशक्त बनाने की है.
इमेज कैप्शन, फ़ोटोग्राफ़र फ़ील बेहान के मुताबिक़, "जो बात मेरे ध्यान में आई, वह थी महिला की उम्र. इसका नाम रसूल है और 75 साल की उम्र में उन्हें बर्मा के राखीन राज्य में जातीय हिंसा के कारण घर छोड़ने को मजबूर होना पड़ा. उसकी तस्वीर लेने के बाद मैंने मन ही मन सोचा, "इस उम्र में कोई कैसे ऐसी परिस्थितियों का सामना कर सकता है. कल्पना करें कि आपकी दादी ऐसी हालत में हों, तो शायद आप इस विस्थापन के दर्द को समझ पाएंगे."