नाउम्मीदी में भी उम्मीद
दशकों से विस्थापन का दर्द झेल रहे कश्मीरी पंडितों के लिए नाउम्मीदी भी एक उम्मीद हो गई है. बेघर होने का दर्द उनकी आंखों में साफ़ दिखता है और जिस सियासत ने उन्हें अपनी ज़मीन से दूर फेंका, उसी की ओर वो टकटकी लगाए हैं.




















दशकों से विस्थापन का दर्द झेल रहे कश्मीरी पंडितों के लिए नाउम्मीदी भी एक उम्मीद हो गई है. बेघर होने का दर्द उनकी आंखों में साफ़ दिखता है और जिस सियासत ने उन्हें अपनी ज़मीन से दूर फेंका, उसी की ओर वो टकटकी लगाए हैं.



















