लाइन ऑफ़ कंट्रोल का आख़िरी गांव

लोकसभा चुनाव हो रहे हैं पर भारत प्रशासित कश्मीर के उस गांव की तस्वीर कैसी है जो दो देशों के बीच नियंत्रण रेखा पर बसा है. भारत प्रशासित कश्मीर में यह गांव वह आख़िरी जगह है जहां तक गाड़ी जाती है.

क़तार के आख़िरी, कश्मीर, नियंत्रण रेखा, आख़िरी गांव
इमेज कैप्शन, 1947-48 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के दौरान कश्मीर भारत प्रशासित जम्मू और कश्मीर और पाक प्रशासित कश्मीर में बंट गया. इसके बाद यहां भारतीय सेना की आमदरफ़्त रुक गई. सड़क का इस्तेमाल बंद हो गया और उरी में सिलीकोट गांव भारत की ओर आख़िरी पोस्ट और लोन हट पाकिस्तान की आख़िरी पोस्ट बन गई. यहां से पुंछ 40 किलोमीटर दूर है.
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इमेज कैप्शन, फ़िलहाल यह सड़क भारत प्रशासित कश्मीर में उरी और पुंछ तक और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में बाघ मुज़फ़्फ़राबाद से ख़्वाजा बांदी तक चलती है. भारत की ओर से सिलीकोट आख़िरी गांव है जहां तक मोटर जा सकती है. भारत की तरफ़ सड़क की हालत बहुत खस्ता है.
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इमेज कैप्शन, 1990 के दशक में दोनों पक्षों की ओर से भारी गोलीबारी के कारण इस गांव को काफ़ी नुक़सान पहुंचा था और कई लोगों की जान गई थी. भारतीय सेना ने गांव की तारबंदी कर दी थी.
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इमेज कैप्शन, दोनों देशों के बीच सीज़फ़ायर समझौते के बाद भारत सरकार ने इस गांव में विकास कार्य शुरू किए, जिनमें नियंत्रण रेखा पर तारबंदी भी शामिल थी. कुछ तारबंदी का काम 2005 के भूकंप के बाद भी किया गया. गांव का एक गेट है जहां से पहचान पत्र दिखाकर अंदर जा सकते हैं.
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इमेज कैप्शन, सिलिकोट गांव के गेट से क़रीब दो सौ मीटर की दूरी पर 75 साल के ग़ुलाम नबी रहते हैं जो म्यूनिसिपैलिटी दफ़्तर में काम करते हैं. ग़ुलाम नबी कहते हैं, ''आज़ादी के बाद से इस सड़क की हालत में कोई बदलाव नहीं आया है. वह जैसी थी, वैसी ही है.''
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इमेज कैप्शन, 19 वर्षीय इरफ़ान अहमद नौंवी कक्षा के छात्र हैं. इरफ़ान के मुताबिक़ अगर कोई रात में बीमार हो जाता है तो पहले गेट को खुलवाना पड़ता है और फिर लाने-ले जाने का ज़रिया ढूंढना पड़ता है. इरफ़ान अहमद के दो भाई भी पाकिस्तानी गोलीबारी में घायल हो चुके हैं.
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इमेज कैप्शन, महिलाओं को सिलाई का काम सिखाने वाले ख़लील जू कहते हैं, "हमारी भलाई की बातें सभी करते हैं लेकिन किसी के पास हमारे सवालों का जवाब नहीं है."
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इमेज कैप्शन, साल 2001 में इरशाद अहमद की उम्र 17 साल थी, जब पाकिस्तानी सैनिकों की ओर से दागी गई गोली उनके पांव में लगी. इसके बाद उनके पांव को काटना पड़ा था. तब से इरशाद की ज़िंदगी अपने नकली पांव के सहारे चल रही है.
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इमेज कैप्शन, सेना ने स्थानीय महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए गांव में एक सेंटर खोला है, जहां उन्हें सिलाई का काम सिखाया जाता है.
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इमेज कैप्शन, इस ख़तरनाक इलाक़े में रहने वाले लोगों को बिजली की भारी किल्लत का सामना करना पड़ता है. इरफ़ान बताते हैं कि साल भर हर रोज़ मात्र दो-ढाई घंटे ही बिजली मिलती है. यहां लोग बढ़ती महंगाई से भी परेशान हैं.
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इमेज कैप्शन, सेना की तरफ़ से चलाए जा रहे सेंटर में सिलाई-कढ़ाई के अलावा कंप्यूटर पर काम करना भी सिखाया जाता है. हालांकि लोगों के पास रोज़गार नहीं है.