एक स्कूल जानलेवा रास्ते पर

भारत प्रशासित कश्मीर के लद्दाख में एक स्कूल ऐसा है, जहां पहुंचने के लिए बच्चों को जानलेवा रास्ता तय करना होता है. क़तार के आख़िरी लोगों की तस्वीरें.

लेह, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, भारत प्रशासित कश्मीर के लद्दाख संसदीय क्षेत्र की जांसकर घाटी और आसपास के गांवों में रहने वाले बच्चों के लिए लेह के अपने स्कूल तक पहुंचना मौत को चुनौती देने जैसा है.
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इमेज कैप्शन, लेह के महाबोधि स्कूल तक पहुंचने के लिए बच्चों को 100 किलोमीटर से ज़्यादा दूर तक जाना होता है. और यह रास्ता बर्फ़ से ढकी घाटियों, ख़तरनाक पहाड़ी रास्तों और जमी हुई नदी के ऊपर से गुज़रकर जाता है.
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इमेज कैप्शन, इस सफ़र को 'चदर ट्रेक' भी कहते हैं. स्थानीय भाषा में चदर का मतलब है कंबल. ठंड में बर्फ़ बनी जांसकर नदी, पहाड़ों को कंबल की तरह ढक देती है.
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इमेज कैप्शन, स्कूल जाने वाले बच्चों के अलावा पर्यटक और एक से दूसरी ओर जाने वाले मज़दूर भी इस रास्ते का इस्तेमाल करते हैं. इस सफ़र के दौरान रात में किसी गुफ़ा में रुकना होता है. तड़के फिर सफ़र की शुरुआत होती है.
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इमेज कैप्शन, बर्फ से ढकी पहाड़ियों के घिरे महाबोधि स्कूल के नर्सरी क्लास में पढ़ने वाले साढ़े तीन साल के स्टैंज़िन टेंग्योंग की तरह सभी बच्चे बर्फ़ पर एक ख़तरनाक रास्ते के ज़रिए सफ़र तय करते हैं.
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इमेज कैप्शन, प्रिंसीपल बताती हैं, "ठंड का वक़्त सबसे मुश्किल होता है क्योंकि भारी बर्फ़बारी के कारण मुख्य सड़कें बंद होती हैं इसलिए जांसकर इलाक़े से जो बच्चे आते हैं वो देरी से आते हैं. लोगों को इंतज़ार करना पड़ता है कि नदी पर जमी बर्फ़ मोटी हो जाए ताकि उस पर चला जा सके."
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इमेज कैप्शन, स्कूल की क्लासों में दीवारों पर डिज़्नी के कार्टून के अलावा बच्चों के हाथों से बने पोस्टर सजाए गए हैं.
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इमेज कैप्शन, एक छात्रा के मुताबिक़ तीन साल पहले लिंगशेट से लेह के सफ़र के वक़्त बर्फ़ की परत मज़बूत नहीं थी, जिससे उनका भाई बर्फ़ीले पानी में कमर तक जा गिरा. उसका शरीर ठंड से ऐंठ गया.
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इमेज कैप्शन, बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने के लिए उनके माता-पिता को ख़ासी मशक्कत करनी पड़ती है.
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इमेज कैप्शन, 10वीं में पढ़ने वाली और छह भाई-बहनों में सबसे छोटी रिग्ज़िन यंग्टल बड़ी होकर बैंक मैनेजर बनना चाहती हैं, क्योंकि उन्हें गणित बहुत पसंद है. वो जांसकर नदी से लगे लिंगशेट गांव में रहती हैं.
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इमेज कैप्शन, स्कूल के बच्चे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी पूरे उत्साह से हिस्सा लेते हैं.
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इमेज कैप्शन, महाबोधि स्कूल में क़रीब 450 छात्र-छात्रा पढ़ाई कर रहे हैं, जो दूर दूर के इलाक़ों से यहां पहुंचते हैं.
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इमेज कैप्शन, प्रिंसिपल छेवांग डोल्मा कहती हैं कि "ये पहाड़, बर्फ़ तो बच्चों की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए है." उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई इसी स्कूल से की है.
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इमेज कैप्शन, शून्य से 35 डिग्री तक नीचे चले जाने वाले तापमान में बच्चे एक-दो दिन नहीं बल्कि पांच से छह दिन का थका देने वाला सफ़र ख़त्म करके आख़िर अपने स्कूल पहुंचते हैं. (सभी तस्वीरें- विनीत खरे)