जो हैं बस पिसने को मजबूर

बस्तर के सैकड़ों आदिवासी आंध्र प्रदेश में भागकर आए हैं, क्योंकि वो सरकारी सुरक्षा बलों और नक्सलियों की गोलीबारी के बीच जी नहीं सकते थे. क़तार के आख़िरी लोगों की तस्वीरें देखें यहां.

छत्तीसगढ़, आदिवासी, आंध्र प्रदेश, बेदखल, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, छत्तीसगढ़ के सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा के सुदूर जंगली इलाक़ों से गाँव के गाँव वीरान होने लगे हैं. वहां के आदिवासी आन्ध्र प्रदेश के कई इलाक़ों जैसे पश्चिमी गोदावरी, वारंगल और खम्मम में बस्तियां बसा रहे हैं.
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इमेज कैप्शन, सरकार की तरफ से किए गए सर्वेक्षण के अनुसार छत्तीसगढ़ में चल रहे संघर्ष की वजह से पलायन कर आ बसने वाले आदिवासियों की कम से कम 250 बस्तियां सिर्फ खम्मम जिले में ही हैं.
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इमेज कैप्शन, घने सागौन के जंगलों में सैकड़ों किलोमीटर पार करते हुए वो इन इलाक़ों में आ तो गए हैं, पर ज़िंदगी अभी भी सवालों से जूझ रही है. उनके पास बुनियादी सहूलियतें तो हैं नहीं, भोजन भी मिलेगा इसका भी उन्हें यक़ीन नहीं है.
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इमेज कैप्शन, सलवा जुडूम के शुरू होने के बाद आदिवासियों का पलायन शुरू हुआ था. अब हालात और भी खराब हो चुके हैं क्योंकि छत्तीसगढ़ के कई इलाक़ों में उन्हें नक्सलियों और पुलिस दोनों से ख़तरा रहता है.
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इमेज कैप्शन, छत्तीसगढ़ से भागकर आए आदिवासियों ने जंगल साफ़ कर यहां श्रीरामापुरम में अपनी झोपड़ियां बना ली हैं. गांव में 50 के आसपास घर हैं और इनमें 250 के क़रीब लोग रहते हैं.
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इमेज कैप्शन, यहाँ के लोग नहाने-धोने के लिए कुछ दूर स्थित गोदावरी नदी से पानी लाते हैं जबकि शहर इस गांव से लगभग 20 किलोमीटर दूर है. बच्चों के लिए न तो स्कूल की व्यवस्था है और न स्वास्थ्य की.
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इमेज कैप्शन, बस्तर से विस्थापित लोगों के बीच काम कर रहे 'सितारा' नामक सामजिक संगठन के डॉक्टर हनीफ़ कहते हैं कि पिछले एक दशक से ही वो लोग स्थानीय प्रशासन पर दबाव डाल रहे हैं ताकि इन आदिवासियों को मूलभूत सुविधाएं मिल सकें.
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इमेज कैप्शन, राज्य सरकार चाहती है कि ये आदिवासी वापस छत्तीसगढ़ चले जाएं. मगर आदिवासियों का कहना है कि अब वो अपने घरों को छोड़कर बहुत दूर चले आए हैं. इतनी दूर कि अब इनका वापस लौटना नामुमकिन है.
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इमेज कैप्शन, ये ज़्यादातर बस्तर के आदिवासी हैं, जो छत्तीसगढ़ से जान बचाकर भागे हैं. जहां माओवाद और सुरक्षा बल और कुछ वक़्त पहले तक सलवा जुडूम की वजह से उनकी जान को ख़तरा पैदा हो गया था.
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इमेज कैप्शन, सुकमा जिले के ताड़मेटला इलाक़े से आए एक नौजवान ने बताया, "जीना मुश्किल हो गया था. पुलिस वाले और सलवा जुडूम के लोग आते थे, वो मारते थे. उनके जाने के बाद माओवादी आते थे, फिर वो मारते थे. दर और दहशत की ज़िन्दगी को हमने पीछे छोड़ दिया है."
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इमेज कैप्शन, आंध्र प्रदेश के वारंगल और पश्चिम गोदावरी ज़िले में भी इन्होंने अपने आशियाने बनाने शुरू कर दिए हैं.
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इमेज कैप्शन, आदिवासियों की इस बड़ी जमात में बहुत से ऐसे हैं, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में कभी अपना वोट नहीं डाला.
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इमेज कैप्शन, चुनावी प्रक्रिया में इन आदिवासियों की भागीदारी कभी नहीं रही है. इन्हें अब कोई मतलब नहीं है कि कौन सी पार्टी या कौन सा नेता कहां से चुनाव लड़ रहा है.
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इमेज कैप्शन, डॉक्टर हनीफ़ का कहना है कि सरकार को इनकी बुनियादी ज़रूरतों का ख़याल रखना चाहिए. इन्हें बोझ समझकर तिरस्कृत नहीं करना चाहिए, जो आज हो रहा है.
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इमेज कैप्शन, सरकारी अफ़सरों को लगता है कि अगर वो सहूलियतें देंगे तो और भी ज़्यादा लोग छत्तीसगढ़ से भागकर आंध्र प्रदेश चले आएंगे. फिर इस पलायन को रोक पाना मुश्किल हो जाएगा.
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इमेज कैप्शन, सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर हनीफ़ कहते हैं, "अब हमने अपनी संस्था से इन्हें स्वास्थ्य कार्ड दिए हैं. अब यही इनके लिए एक तरह के पहचानपत्र बन गए हैं." (सभी तस्वीरें- सलमान रावी)