कालाहांडी-काठ की हांडी

ओडिशा का कालाहांडी आज़ाद भारत में शायद भूख का जीता-जागता निशान है. यहां के आदिवासी जब खाने को कुछ नहीं मिलता तो इमली का पानी पीकर सो जाते हैं. तस्वीरों में देखिए क़तार के आख़िरी.

कालाहांडी, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, ओडिशा के कालाहांडी में पिछले 200 साल से भुखमरी हर 10-15 साल बाद आती है. इस दौरान हर बार लोगों की मौत होती है. मगर सरकार यह मानने में हिचकती है कि मौतों की वजह भुखमरी ही है.
कालाहांडी, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, ज़िला मुख्यालय भवानीपटना से 120 किलोमीटर दूर बसा गोपीनाथपुरा पंचायत का गाँव पेर्गुनी पाड़ा अकाल, भूख, बीमारी और अभाव का लंबा सफ़र तय करके आज ख़ुद को वहीं खड़ा पाता है, जहाँ आज़ादी से पहले हुआ करता था.
कालाहांडी, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, रूपदेयी की पूरी ज़िंदगी इसी गाँव में बीत गई. गाँव की दूसरी महिलाओं की तरह जंगल से लकड़ी चुनने और मिट्टी काटने का काम करती हैं. रूपदेयी पूछती हैं, "कहाँ जाएँ बस में बैठकर? पास में पैसे नहीं हैं. बाज़ार भी जाएँ तो क्या लेकर जाएँ?"
कालाहांडी, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, 2007 में बामनीचंचरा, गोपीकांदर और पुटकीमोल जैसे कई गाँव भूख और बीमारी की चपेट में आ गए थे, इस दौरान कई लोगों की मौत हो गई थी.
कालाहांडी, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, गाँव के ही कलिंग मांझी कहते हैं कि हर परिवार को हर महीने 25 किलो चावल मिलता तो ज़रूर है, जिसमें किसी तरह गुज़ारा हो पाता है.
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इमेज कैप्शन, राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के तहत भी पर्याप्त काम नहीं है. इसलिए उन्हें दूसरे साधन तलाश करने पड़ रहे हैं. काम की तलाश इनमें से कई लोगों को ओडिशा के दूसरे हिस्सों के अलावा आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु ले जा रही है.
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इमेज कैप्शन, गाँव के लोग बताते हैं कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 2005 में यहाँ सड़क बनाने को मंज़ूरी मिली थी. वह सड़क अभी तक सिर्फ़ काग़ज़ों पर ही है
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इमेज कैप्शन, मोबाइल नेटवर्क 60 किलोमीटर दूर प्रखंड मुख्यालय तक है. प्रखंड का दफ़्तर पार करते ही मोबाइल नेटवर्क ख़त्म हो जाता है. यहां मोबाइल पर बात करने के लिए 60 किलोमीटर का सफ़र तय करके प्रखंड कार्यालय आना पड़ता है.
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इमेज कैप्शन, पेर्गुनी पाड़ा गाँव में रहने वाली ललिता ने कभी शहर नहीं देखा है. ललिता के सपनों में शहर है तो ज़रूर, मगर उसे पता नहीं सचमुच का शहर वह कभी देख पाएंगी या नहीं.
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इमेज कैप्शन, 1980 के दशक में जब ऐसी ख़बरें आने लगीं कि भूख की मारी औरतें अपनी गोद के बच्चे बेच रही हैं, तो उस वक़्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी यहाँ का हाल देखने पहुँचे थे.
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इमेज कैप्शन, गाँव के लोग कहते हैं कि उन्हें वोट डालने का मन तो नहीं करता, मगर मजबूरी है. वे कहते हैं, "वोट नहीं डालेंगे तो हमारा नाम मतदाता सूची से कट जाएगा. ऐसा नेता लोग बोलते हैं."
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इमेज कैप्शन, पेर्गुनी पाड़ा और बोड़-बोपला के रहने वालों के पास सिर्फ एक ही कार्ड है. और वो है मतदाता पहचान कार्ड. इसके अलावा किसी तरह का कार्ड इनके पास नहीं है. मसलन, राशन कार्ड, आधार कार्ड या फिर आदिवासी होने का कार्ड.
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इमेज कैप्शन, 2007 के बाद कालाहांडी के हालात सिर्फ़ इतने बदले हैं कि अब इस इलाक़े में सरकार सस्ती दर पर एक रुपए प्रति किलो चावल मुहैया करा रही है.
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इमेज कैप्शन, इलाक़े में सस्ती दर पर चावल की मौजूदगी एक राहत ज़रूर है, मगर लोगों के सामने हमेशा सवाल रहता है कि चावल के साथ आख़िर वो क्या मिलाकर खाएँ?
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इमेज कैप्शन, ललिता और गाँव के हमउम्र लड़के-लड़कियों ने तो कभी परदे या टीवी पर कोई फ़िल्म भी नहीं देखी है. टीवी दूर की बात है, जब बिजली ही नहीं है. इक्का-दुक्का रेडियो हैं, जिन पर वे कभी गाने और समाचार सुन लेते हैं.
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इमेज कैप्शन, 1999 और 2004 में यहाँ 'शाइनिंग इंडिया' का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार की जीत हुई थी और 2009 में 'सबके लिए विकास' की बात करने वाली कांग्रेस के उम्मीदवार ने जीत हासिल की थी. (सभी तस्वीरें - सलमान रावी)