पूर्वोत्तर भारत के रंग

भारत के अन्य हिस्सों की तरह पूर्वोत्तर भी विविधताओं से भरा है. यहां का जीवन ऐसी परंपराओं और रंगों से भरपूर है, जिन्हें आप बस निहारते ही रह जाएंगे.

पूर्वोत्तर भारत के जनजीवन में बिखरे रंगों को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिज़ाइन से स्नातक समीर बख्शी और विष्णुप्रिया नारायण ने क़रीब से देखा और उन्हें दस्तावेज़ों में संजोया है. खासकर वस्त्रों और लोकजीवन में छिपे डिजाइन उनकी रुचि का मुख्य केंद्र हैं. ये मजुली द्वीप पर होने वाली रासलीला में इस्तेमाल होने वाले मुखौटे हैं. बरसों से इन मुखौटों का इस्तेमाल हो रहा है.
इमेज कैप्शन, पूर्वोत्तर भारत के जनजीवन में बिखरे रंगों को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिज़ाइन से स्नातक समीर बख्शी और विष्णुप्रिया नारायण ने क़रीब से देखा और उन्हें दस्तावेज़ों में संजोया है. खासकर वस्त्रों और लोकजीवन में छिपे डिजाइन उनकी रुचि का मुख्य केंद्र हैं. ये मजुली द्वीप पर होने वाली रासलीला में इस्तेमाल होने वाले मुखौटे हैं. बरसों से इन मुखौटों का इस्तेमाल हो रहा है.
असम में ब्रह्मपुत्र नदी में मौजूद इस द्वीप का क्षेत्रफल 1250 वर्ग किलोमीटर है. यहां रहने वाले लोगों के खानपान से लेकर जनजीवन तक आपको कई रंग बिखरे दिखाई पड़ेंगे.
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माजुली नदी में स्थित भारत का सबसे बड़ा द्वीप है. यहां रहने वाले मिशिंग समुदाय के लोग बांसों से अपने घर बनाते हैं.
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असम में पारंपरिक घर बांस और घास-फूंस से बनाए जाते हैं. ये घर आमतौर पर बांस के मचान पर होते हैं, जिनके नीचे वाली जगह ज़रूरी चीज़ें रखने के लिए इस्तेमाल की जाती है. छत पर घास की कई परतें लगाई जाती हैं, ताकि बारिश का पानी घर के भीतर न आए.
इमेज कैप्शन, असम में पारंपरिक घर बांस और घास-फूंस से बनाए जाते हैं. ये घर आमतौर पर बांस के मचान पर होते हैं, जिनके नीचे वाली जगह ज़रूरी चीज़ें रखने के लिए इस्तेमाल की जाती है. छत पर घास की कई परतें लगाई जाती हैं, ताकि बारिश का पानी घर के भीतर न आए.
ये है चिन कुकी मिजो समुदाय के सदस्य दक्षिण मणिपुर, मिजोरम, काचार, उत्तरी काचार, मेघायल, त्रिपुरा और चटगांव से सटे पहाड़ी इलाक़ों में रहते हैं. ये लोग अपने घर के नीचे हिस्से में कपड़ों की बुनाई करते हैं. लोग यहां चीज़ें रखने के अलावा कई बार सोते भी हैं.
इमेज कैप्शन, ये है चिन कुकी मिजो समुदाय के सदस्य दक्षिण मणिपुर, मिजोरम, काचार, उत्तरी काचार, मेघायल, त्रिपुरा और चटगांव से सटे पहाड़ी इलाक़ों में रहते हैं. ये लोग अपने घर के नीचे हिस्से में कपड़ों की बुनाई करते हैं. लोग यहां चीज़ें रखने के अलावा कई बार सोते भी हैं.
बांसों के मचान पर बनने वाले घर आसाम में बहुत आम बात है. इन्हें बनाना भी एक कला है, जो भारत के दूसरे भागों में देखने को नहीं मिलती.
इमेज कैप्शन, बांसों के मचान पर बनने वाले घर आसाम में बहुत आम बात है. इन्हें बनाना भी एक कला है, जो भारत के दूसरे भागों में देखने को नहीं मिलती.
ब्रह्मपुत्र नदी असम की जीवनरेखा मानी जाती है. यह भारत की सबसे विशाल नदियों में एक है जिसका उद्गम तिब्बत से होता है और अरुणाचल प्रदेश होते हुए यह असम तक पहुंचती है. असम में इसमें सहायक नदियां भी मिलती हैं. बांग्लादेश में पहुंचते-पहुंचते गंगा भी इसमें मिल जाती है और आखिर वे बंगाल की खाड़ी में गिर जाती हैं.
इमेज कैप्शन, ब्रह्मपुत्र नदी असम की जीवनरेखा मानी जाती है. यह भारत की सबसे विशाल नदियों में एक है जिसका उद्गम तिब्बत से होता है और अरुणाचल प्रदेश होते हुए यह असम तक पहुंचती है. असम में इसमें सहायक नदियां भी मिलती हैं. बांग्लादेश में पहुंचते-पहुंचते गंगा भी इसमें मिल जाती है और आखिर वे बंगाल की खाड़ी में गिर जाती हैं.
ये बच्ची बिहू उत्सव के मौक़े पर पहने जाने वाले वस्त्रों में सजी-धजी है. असम में बिहू उत्सव तीन बार मनाया जाता है - अप्रैल, जनवरी और अक्टूबर में. हर बिहू का कृषि से जुड़ा अलग महत्व होता है.
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राज्य का बिहू उत्सव सभी त्योहारों में सबसे अहम और रंगारंग होता है. खासकर अप्रैल में मनाया जाने वाले रंगोली बिहू के दौरान फसल की बुआई होती है. पारंपरिक गीत और नृत्य इस उत्सव का अहम हिस्सा होते हैं.
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अरुणाचल प्रदेश में रहने वाले शेरुकपेन समुदाय की एक युवती चेखोर उत्सव के लिए तैयार हुई है. ये कपड़े यहां के पारंपरिक हैं.
इमेज कैप्शन, अरुणाचल प्रदेश में रहने वाले शेरुकपेन समुदाय की एक युवती चेखोर उत्सव के लिए तैयार हुई है. ये कपड़े यहां के पारंपरिक हैं.
अरुणाचल प्रदेश के इस उत्सव के दौरान स्थानीय परंपराओं और रंगों को क़रीब से देखा जा सकता है.
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पूर्वोत्तर के राज्यों के रहन-सहन में आपको कई समानताएं मिलेंगी. अरुणाचल के वांचो समुदाय की इस बुज़ुर्ग महिला ने गले में जो हार पहना है, वह आपको नोक्टे और कोनयाक जैसी नागा जनजातियों में भी दिखेगा. वांचो महिलाएं ऐसे आभूषणों को बहुत महत्व देती हैं और रोज़मर्रा के जीवन में उन्हें पहनती हैं.
इमेज कैप्शन, पूर्वोत्तर के राज्यों के रहन-सहन में आपको कई समानताएं मिलेंगी. अरुणाचल के वांचो समुदाय की इस बुज़ुर्ग महिला ने गले में जो हार पहना है, वह आपको नोक्टे और कोनयाक जैसी नागा जनजातियों में भी दिखेगा. वांचो महिलाएं ऐसे आभूषणों को बहुत महत्व देती हैं और रोज़मर्रा के जीवन में उन्हें पहनती हैं.
ये हैं रींग समुदाय की महिलाएं, जिनके आभूषण सिक्कों और चांदी से बने होते हैं. इन्हें अपने आभूषणों में विभिन्न रंगों का इस्तेमाल करने के लिए जाना जाता है. इस समुदाय के लोग मिज़ोरम, मणिपुर और त्रिपुरा में रहते हैं.
इमेज कैप्शन, ये हैं रींग समुदाय की महिलाएं, जिनके आभूषण सिक्कों और चांदी से बने होते हैं. इन्हें अपने आभूषणों में विभिन्न रंगों का इस्तेमाल करने के लिए जाना जाता है. इस समुदाय के लोग मिज़ोरम, मणिपुर और त्रिपुरा में रहते हैं.